राष्ट्रीय|2010/02/28 1:39 pm

आधुनिक चाणक्य: नानाजी देशमुख

प्रसिद्द समाजसेवी और संघ के आजीवन प्रचारक श्री नानाजी देशमुख आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं . उनके कर्मों की ज्योति सदैव हमारा पथ प्रदर्शित करती रहेगी . उनके जीवन चरित की संछिप्त चर्चा कर रहे हैं “अजय कुमार जी” और उनका यह लेख जीत भार्गव ने उपलब्ध कराया है .:-

नानाजी देशमुख की तीव्र बुद्धि तथा विलक्षण संगठन कौशल ने 1950 से 1977 तक भारतीय राजनीति पर अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने विभिन्न विचार और स्वभाव वाले नेताओं को एक साथ लाकर कांग्रेस का सदा सत्ता में बने रहने का घमण्ड तोड़ दिया। उनका जन्म ग्राम कडोली (जिला परभणी, महाराष्ट्र) में 11 अक्तूबर, 1916 को हुआ था। निर्धनता के कारण किताबों आदि के लिए वे सब्जी बेचकर पैसे जुटाते थे। वे लोकमान्य तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे। संघ संस्थापक डा0 हेडगेवार ने ही उन्हें संघ से जोड़ा। 1940 में महाराष्ट्र के सैकड़ों युवक प्रचारक बने। इनमें नानाजी भी थे।
उन्हें उत्तर प्रदेश में पहले आगरा और फिर गोरखपुर भेजा गया। उन दिनों संघ की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। नानाजी एक धर्मशाला में रहते थे। वहाँ हर तीसरे दिन कमरा बदलना पड़ता था। अन्ततः एक कांग्रेसी नेता ने उन्हें इस शर्त पर स्थायी कमरा दिलवाया कि वे उसका खाना बना दिया करेंगे। नानाजी के परिश्रम से तीन साल में गोरखपुर के आसपास 250 शाखाएँ खुल गयीं। विद्यालयों की पढ़ाई तथा संस्कारहीन वातावरण देखकर उन्होंने गोरखपुर में 1950 में पहला सरस्वती शिशु मन्दिर स्थापित किया। आज तो ऐसे विद्यालयों की संख्या देश में 50,000 से भी अधिक है।
1947 में रक्षाबन्धन के शुभ अवसर पर लखनऊ में ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ की स्थापना हुई, तो इसके प्रबन्धक नानाजी ही बने। वहाँ से मासिक राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक पांचजन्य तथा दैनिक स्वदेश अखबार निकाले गये। 1948 में गान्धी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लग गया। इससे प्रकाशन संकट में पड़ गया। ऐसे में नानाजी ने छद्म नामों से कई पत्र निकाले। 1952 में जनसंघ की स्थापना होने पर उत्तर प्रदेश में उसका कार्य नानाजी को सौंपा गया। 1957 तक प्रदेश के सभी जिलों में जनसंघ का काम पहुँच गया।
1967 में उत्तर प्रदेश में चैधरी चरणसिंह के नेतृत्व में पहली संविद सरकार बनी। इसमें नानाजी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। विनोबा के भूदान यज्ञ तथा 1974 में इन्दिरा गान्धी के कुशासन के विरुद्ध लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आन्दोलन में नानाजी खूब सक्रिय रहे। पटना में जब पुलिस ने जयप्रकाश जी पर लाठियाँ बरसायीं, तो नानाजी ने उन्हें अपनी बाँह पर झेल लिया। इससे उनकी बाँह टूट गयी; पर जयप्रकाश जी बच गये।
1975 में इन्दिरा गान्धी ने देश में आपातकाल लगाकर सभी विपक्षी नेताओं को जेल में ठूंँस दिया; पर नानाजी हाथ नहीं आये। आपातकाल के विरुद्ध बनी ‘लोक संघर्ष समिति’ के वे मन्त्री थे। उस समय हुए देशव्यापी सत्याग्रह में एक लाख से भी अधिक लोगों ने गिरफ्तारी दी। यद्यपि बाद में नानाजी भी पकड़े गये। 1977 के चुनाव में इन्दिरा गान्धी हार गयीं और दिल्ली में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। नानाजी ने सत्ता की बजाय संगठन को महत्व देते हुए अपने बदले ब्रजलाल वर्मा को मन्त्री बनवाया। इस पर उन्हें जनता पार्टी का महामन्त्री बनाया गया।
उस समय नानाजी सत्ता या दल में बड़े से बड़ा पद ले सकते थे; पर उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़कर ‘दीनदयाल शोध संस्थान’ के माध्यम से पहले गोंडा और फिर चित्रकूट में ग्राम विकास का कार्य प्रारम्भ किया। अपने राज्यसभा के सांसद काल में मिली सांसद निधि का उपयोग उन्होंने इन प्रकल्पों के लिए ही किया। कर्मयोगी नानाजी ने 27 फरवरी, 2010 को अपनी कर्मभूमि चित्रकूट में अंतिम सांस ली। उन्होंने देहदान का संकल्प पत्र बहुत पहले ही भर दिया था। अतः देहांत के बाद उनका शरीर आयुर्विज्ञान संस्थान को दे दिया गया।

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