संसद मार्ग|2010/01/25 12:10 am

26 जनवरी एक रस्म बनकर रह गयी है ….

गणतंत्र दिवस की आप सब को हार्दिक बधाई ,दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के 60 वीं वर्षगाँठ मनाएँगे।सारा देश राष्ट्रभक्ति के रंग में सराबोर है ,चाहे वो इन्टरनेट से लेकर टीवी और अख़बारों तक हर जगह देश प्रेम की लहर छाई हुई है . इस महान आयोजन के पीछे सच्ची भावना केवल भारत की धरमनिर्पेक्षता और लोकतंत्र मनाने की नहीं बल्कि यह प्रत्येक भारतीय को हमारी समृद्ध संस्कृति ,भाषाओँ ,बोलियों, परम्पराओं , रीति-रिवाजों ,धर्मों पर गर्व करना सिखाती है जिससे भारत एक अनोखा बहु-सांस्कृतिक देश बना । जरा सोचें ,कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए है ! अपना शासन ,अपना क़ानून ,अपने उपनियम ! कहते वक़्त बात जुबान खोखली मालूम पड़ती है ।भारत का सविंधान भारत के प्रत्येक नागरिक को अनेक अधिकार देता हे ,किन्तु वर्तमान मे लोकतंत्र में दृष्टि डाले तो हैरत होती होती है ! सामान्यजन के लिए उनके द्वारा और उनका कहा जाने वाला सविंधान आज उन्हें क्या दे रहा है ? सवाल यह भी उठता हे की क्या सविंधान के लागू होने के इतने वर्षो बाद भी हमारे देश से अलगाववाद कम हो गया ? क्या इस सविंधान से शासकों की तानाशाही व निरंकुशता कम हो गई ?क्या इस सविंधान ने आम व्यक्ति को इतनी क्षमता प्रदान किया है कि वो सरकार से उसके काम का ब्योरो मांग सके ? क्या गणतंत्र ने हमारी कानून व्यवस्था को सुधार दिया है ? रुचिका , आरुषी,मट्टू ,शशिनाथ झा जैसे न जाने कितने लोगों के साथ नाइंसाफी का मामले है जो केवल सरकारी फाइलों और मीडिया के टेपों में बंद होकर गये हैं . आज कहने को हम लोकतान्त्रिक समाज में रह रहें हैं परन्तु वास्तव में आम आदमी की भूमिका नहीं के बराबर है . आदमी इतना बेबस और लाचार सा महसूस करता है कि वह चाहे या न चाहे नीतियाँ तय हो जाती है . कानून की चर्चा करना तो बेकार ही है ! चिंतनीय बात यह है कि आज हम ऐसे गणतंत्र में हैं जो कुछ लोगो के हाथों का खिलोना बनकर रह गया हैं . ऐसे लोगों में राजनेता , नौकरशाह , उद्योगपति , माफिया आदि सभी शामिल हैं और आपस में बराबर की हिस्सेदारी रखते हैं .

बहरहाल , सविंधान जितना बुरा हो वह अच्छा साबित हो सकता हे यदि उसका पालन करने वालें लोग अच्छे हो ,स्वंत्रता के इतने वर्षो के बाद भी आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिलें है . कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गये है परन्तु ,वास्तविकता इनसे कोसों दूर है. वास्तविकता के जमीं पर उतरें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं. इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय होता है. आप ख़ुद देखें आज बच्चों को समुचित शिक्षा भी नहीं मिल पाती है. महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है ,आज भारत खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है।इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है
भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं. …………………….
इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय में भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है ? ……………….. और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है ? आज हर किसी के मन में ये बात चुभती कि देशभक्ति का वो जज्बा कहाँ गायब हो गया जब महत्मा गाँधी ,सुभाष चन्द्र बोस ,चन्द्रशेखर आअज़द और भगत सिंह सरीखे नेताओं की आवाज़ पर देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने के लोग घरों से निकल पड़ते .क्या हमारा देशप्रेम एक दिन में सिमट कर रह गया हे या यों कहिये की एक रस्म बनकर रह गया है ?

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