Author: राजीव गुप्ता
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ जो व्यक्ति सब प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, उसके लिए किसका मोह, किसका शोक? इस सारे जगत में ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है। उसी को पाने के लिए, उसी को समझने के लिए हमें मनुष्य का यह जीवन मिला है। वेदों में आत्मा की एकता पर सबसे अधिक जोर दिया गया है ! जो व्यक्ति इस तत्व को समझ लेगा,भला वह किससे प्रेम नहीं करेगा? जो आदमी यह समझ जाएगा कि 'घट-घट में तोरा साँई रमत है' भला वह किस पर नाराज होगा? किसे मारेगा? किसे पीटेगा? किसे सताएगा? किसे गाली देगा? किसके साथ बुरा व्यवहार करेगा ! चिंतन-पश्चात वह समस्त संसार से अपना तादात्म्य स्थापित कर उसे अपना परिवार अर्थात अपना ही अंश मानेगा ! यही भारतीय चिंतन है ! सारा संसार अब पुनः एक परिवार हो जिसका मुखिया भारत हो, बस यही छोटी से ख्वाहिश है मेरी ! हम संसार में अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर सके , यही चिंतन है मेरा ! इसिलए अपने विचार लेकर आप सबके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ ! एम. बी. ए. , बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय की पढाई करने के उपरांत एक निजी कंपनी में कार्यरत हूँ ! देश-समाज के लिए कुछ करने की ललक है , बस उसी ललक को पूरा करने की कशिश मन में है.. ! आपके स्नेह , आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी...... !!
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