संसद मार्ग|2010/10/10 2:51 am

वजीर ए आला उमर अब्‍दुल्‍ला का सियासी भटकाव

कश्‍मीर के वर्तमान वजीर ए आला जनाब उमर अब्‍दुल्‍ला जम्‍मू कश्‍मीर विधान सभा में दिए गए अपने के ताजा बयान के बाद गहन विवाद में फंसते नजर आए। विफलताओं से घिरे, उमर अब्‍दुल्‍ला यकी़नन कश्‍मीर के वर्तमान स्‍टेट्स के बारे में अत्‍यंत विवादित टिप्‍पणी कर बैठे। उन्‍होने बयान दिया कि वह केंद्र सरकार की कठपुतली नहीं है, उमर अब्‍दुल्‍ला यह कहकर ही कदाचित रूके नहीं। उन्‍होने आगे यहां तक कह डाला कि जम्‍मू कश्‍मीर का भारत में मरजर (विलय) नहीं हुआ, वरन् एक्‍सैशन (जोडा़ जाना) हुआ। कश्‍मीर समस्‍या के निदान के लिए उमर अब्‍दुल्‍ला ने फरमाया कि भारत पाकिस्‍तान और कश्‍मीर तीनों को मिलकर बातचीत करनी होगी। विधान सभा में दिए गए इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी और नेशनल पैंथर पार्टी ने जबरदस्‍त हंगामा किया और कहा कि जिसे भारत के साथ परेशानी है तो वह पाकिस्‍तान जा सकता है। विधान सभा में दोनों विरोधी दलों ने उमर अब्‍दुल्‍ला हुकूमत को अलगाववादी सरकार क़रार दिया। उमर अब्‍दुल्‍ला के बयान के विरोध में भाजापा ने विधान सभा के बकाया सत्र का बहिष्‍कार करने का ऐलान कर दिया। कॉंग्रेस पार्टी जोकि उमर अब्‍दुल्‍ला सरकार में शामिल है, उसने उमर अब्‍दुल्‍ला का जोरदार बचाव शुरू कर दिया।
संवैधानिेक दृष्टि से देखा परखा जाए तो उमर अब्‍दुल्‍ला का बयान अत्‍यंत आपत्तिजनक करार दिया जाना चाहिए। सन् 1947 में जो भारत की आजा़दी हासिल करने के वक्‍़त जो हालात तशकील हुए उनमें जम्‍मू कश्‍मीर के महाराजा हरि सिंह ने अपने दिवान मेहरचंद महाजन की दुष्‍प्रेरणा के कारण भारत के साथ अपनी रियासत का संविलयन अंजाम देने में विलंब किया। इसी दुर्भाग्‍यपूर्ण विलंब का समुचित फायदा उठाते हुए पाकिस्‍तान फौज़ ने कबायली आक्रमण की आड़ कश्‍मीर पर धावा बोल दिया। जम्‍मू-कश्‍मीर पर पाकिस्‍तानी फौज़ के कब्‍जे की प्रबल आशंका से भयभीत महाराजा हरि सिंह को होश आया और उसी रात 27 अक्‍तूबर 1947 को बिना किसी शर्त के भारत के साथ अपनी रियासत जम्‍मू-कश्‍मीर के भारत के संपूर्ण विलय का ऐलान कर दिया और संविलयन पत्र पर बाकायदा अपने दस्‍तख़त कर दिए। इस ऐलान के तत्‍पश्‍चात कश्‍मीर में भारतीय फौज़ ने पाकिस्‍तानी आक्रमण के बरखिलाफ मोर्चा संभाल लिया और आक्रमणकारियों को परास्‍त करते हुए और पीछे ढकेलते हुए उडी़ तक जा पंहुची । इसी बीच तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति आइजनहॉवर और ब्रिटिश सरकार के जबरदस्‍त इंटरनेशनल दबाव में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पं0 नेहरू ने युद्ध विराम का एकतरफा ऐलान कर दिया। 1 जनवरी 1948 को पं0 नेहरू कश्‍मीर के मसअले को संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ले गए। परिणामस्‍वरूप कश्‍मीर घाटी का एक विशाल भू भाग पाकिस्‍तान के आधिपत्‍य में ही रह गया और इसे ही पाक अधिकृत कश्‍मीर कहा जाता है। भारतीय संविधान सभा ने पं0 नेहरू की पहल पर ही कश्‍मीर को आर्टिकल 370 के तहत विशेष राज्‍य का दर्जा प्रदान किया और एक विशिष्‍ट पहचान की कश्‍मीरी ख्‍वाहिश का सम्‍मान बरकरार रखा गया।
उपरोक्‍त तथ्‍यों को मद्देनज़र रखने के पश्‍चात भी यदि वजीर ए आला उमर अब्‍दुल्‍ला जम्‍मू- कश्‍मीर के संपूर्ण विलय (मरजर) से इंकार करके, उसे केवल एक्‍सैशन करार देने पर क्‍यों उतारू हैं । क्‍या उमर उसी ऐतिहासिक गलती का दोहराने पर आमादा हैं, जोकि उनके दादा शेख़ मौहम्‍मद अबदुल्‍ला ने बाकायदा अंजाम दी थी, जिसके नतीजे में उनके परममित्र तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 9 अगस्‍त 1953 को शेख़ अब्‍दुल्‍ला की सरकार को बर्खास्‍त करने और उन्‍हे जेल भेजने के लिए विवश हो गए थे, जहॉं उन्‍हे तकरीबन 11 वर्ष बिताना पडे़। शेख़ साहब भी कश्‍मीर को स्‍वीटजरलैंड की तर्ज पर आज़ाद बनाने का दु:स्‍वप्‍न देखने लगे थे और जम्‍मू-कश्‍मीर रियासत के भारत के संपूर्ण विलय को लेकर अपना अविश्‍वास और असमंजस प्रर्दिशत करने लगे थे। आज उनका पोता उमर अब्‍दुल्‍ला ऐसी बातें बयान कर रहा है, जोकि उसके पिता फारूख अब्‍दुल्‍ला ने कदाचित बयान नहीं की और उसके दादा शेख़ अबदुल्‍ला ने भी अपनी गलती को दुरूस्‍त करते हुए और जम्‍मू-कश्‍मीर के भारत के साथ विलय को संवैधानिक तौर पर मुकम्‍मल मानते हुए तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी की पहल पर दोबारा से 25 फरवरी 1974 में जम्‍मू- कश्‍मीर की सत्‍ता को संभाला। बहुत कामयाबी के साथ सत्‍ता में अपनी द्वितीय पारी निभाते हुए शेख़ अब्‍दुल्‍ला ने जम्‍मू- कश्‍मीर में अलगाववादी तत्‍वों को कदाचित सर नहीं उठाने दिया और अपने तकरीबन एक दशक के मुख्‍यमंत्री काल में कश्‍मीर को तरक्‍की की नई ऊचाइयों तक पंहुचाया। उनकी मृत्‍यु के पश्‍चात उनके डाक्‍टर बेटे फारूख अबदुल्‍ला ने इंग्‍लैड में अपनी मैडिकल प्रैक्टिस को अलविदा कहकर कश्‍मीर की सियासत में कदम रखा और 8 सितंबर 1982 में सत्‍तानशीन हुआ। सन् 1984 में फारूख अब्‍दुल्‍ला के विपक्ष के साथ अधिक मेलमिलाप ने उन पर इंदिरा गॉंधी की नाराजगी का कहर बरपा कर दिया । 2 जुलाई 1984 को फारूख अबदुल्‍ला की लोकप्रिय सरकार को बेवजह बर्खास्‍त कर दिया गया और उनके बहनोई गुल मौहम्‍मद शाह को कश्‍मीर का वजीर ए आला बना दिया गया। फारूख अब्‍दुला बेहद अपने कार्यकाल में वतन परस्‍त रहे और उनकी खता महज़ इतनी थी कि उन्‍होने कॉंग्रेस के दामन को छोडने का साहस किया जो इंदिरा जी को नागवार लगा। फारूख सरकार की बर्खास्‍तगी ने वस्‍तुत: आज के दौर में जारी जेहाद की पृष्‍ठभूमि का तैयार किया। कश्‍मीर के पृथकतावादियों को दिल्‍ली की हुकूमत के विरूद्ध बोलने और बगावत का वातावरण तैयार करने का बेहद वाजिब मौका हासिल हो गया। राजीव गॉंधी ने पुन: फारूख अब्‍दुल्‍ला से हाथ मिलाया और 7 मार्च 1986 को गुल शाह की सरकार को बर्खास्‍त करके पुन: 7 नवंबर 1986 को फारूख अब्‍दुला की कश्‍मीर में ताजपोशी हो गई।
मार्च सन् 1987 में कॉंग्रेस और नेशनल कॉंफ्रेंस ने मिलकर जम्‍मू कश्‍मीर विधान सभा का चुनाव लडा़। आम चुनाव मे जमकर धांधली हुई इससे कश्‍मीरी नौजवानों का यकीन लोकतांत्रिक तरीके से होने वाली तब्‍दीली से उठ गया और उनके उपर जम्‍मू कश्‍मीर लि‍बरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के बगावती तेवर का असर होने लगा। सन् 1987 में फारूख अब्‍दुल्‍ला मुख्‍यमंत्री तो बन गए, किंतु वह कश्‍मीरियों का विश्‍वास खो चुके थे। सन् 1989 के आग़ाज के साथ ही कश्‍मीर घाटी में सशस्‍त्र विद्रोह का कहर शुरू हो गया जो अभी तक जारी है। कश्‍मीर बगावत की अग्रणी भूमिका वर्ष 1993 के पश्‍चात जेकेएलएफ के जगह धर्मान्‍ध जेहादियों ने ले ली, जोकि कश्‍मीर का पाकिस्‍तान में विलय चाहते हैं। बगावत की पृष्‍ठभूमि भारतीय नेताओं की भयंकर ऐतिहासिक भूले विद्यमान रही, पं0 नेहरू और शेख अब्‍दुल्‍ला से लेकर फारूख अब्‍दुल्‍ला एवं राजीव गॉंधी तक इन गलतियों को अंजाम देने वालों में शुमार रहे। पाकिस्‍तानी हुक्‍मरानों ने कश्‍मीरी नौजवानों में व्‍याप्‍त असंतोष को सशस्‍त्र विद्रोह में परिवर्तित कर दिया। कश्‍मीर में अपनी प्रशासनिक नाक़ामी के चलते फारूख सरकार को 19 जनवरी 1990 को इस्‍तीफा देने पर विवश होना पडा़ और जगमोहन को जम्‍मू कश्‍मीर का गर्वनर नियुक्‍त किया गया। अपने पिता फारूख अब्‍दुल्‍ला के प्रशासनिक विफलता को उमर अब्‍दुल्‍ला ने बाकायदा दोहरा दिया है। कश्‍मीर के हालात पुन: बेकाबू हो चले हैं। अपनी विफलताओं पर लीपापोती करने के लिए ही उमर अब्‍दुल्‍ला, अब तो अलगावादी तत्‍वों की पसंदीदा भाषा बोलने लगे हैं। पृथकतावादी जम्‍मू कश्‍मीर के भारत में विलय को कदाचित अंतिम नहीं मानते। दिल्‍ली की हुकूमत से कश्‍मीरी पृथकतावादी सदैव नाराज़ रहे हैं। उमर अब्‍दुल्‍ला चाहे जितनी भी सियासी चाले क्‍यों न चले, किंतु वह तरक्‍की के लिए ख्‍वाहिशमंद कश्‍मीरी युवाओं का मन नहीं जीत सके। कश्‍मीरी युवा उमर को एशो ओ तफरीह करने वाला आरामपरस्‍त राजनेता मानते हैं। गम ओ गुस्‍से सराबोर कश्‍मीरी नौजवान उमर अब्‍दुल्‍ला को एक बेहद गैरसंजीदा वजीर ए आला करार देते हैं, जोकि उनकी समस्‍याओं के निदान के लिए प्रयासरत प्रतीत नहीं होता। नेशनल कॉंग्रेस के नेतृत्‍व को समझदारी के साथ उमर अबदुल्‍ला का बचाव करने के स्‍थान पर उसके बयान को बाकायदा कंडम करना चाहिए, क्‍योंकि कॉंग्रेसियों को कश्‍मीर में ही नहीं वरन् समूचे राष्‍ट्र में राजनीति करनी है। कॉग्रेस की कयादत में ही सन् 1991 में संसद ने एकमत होकर संपूर्ण कश्‍मीर को भारत का अभिन्‍न अंग करार दिया था।
प्रभात कुमार रॉय
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

3 Comments

  • दरअसल कांग्रेस को जवाहरलाल नेहरू के ज़माने से ही तिकड़म कर हथिया लेने के बाद ही भारत का सर्वांगीण अभिशाप शुरू हुआ जो आज तक जारी है . जब तक यह वंश सत्ता में रहेगा तब तक भारत अभिशप्त ही रहेगा .यह वंश और इसकी सत्ता भारतीय अभिशापों का उच्चतम पड़ाव है .देश और जनद्रोही इस वंशवादी सत्ता का सम्पूर्ण उन्मूलन किये बिना देश का कोई भविष्य संभव ही नहीं है .

  • कश्मीर की असल समस्या और अपनी नाकामी को ढंकने की खातिर अब्दुल्ला भी उसी राह चल पड़े हैं जिस पर उनके बड़े भाई राहुल चल रहे हैं |

  • सार्थक लेखन के लिये आभार एवं “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।
    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव भी जीते हैं, लेकिन इस मसाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये यह मानव जीवन अभिशाप बन जाता है। आज मैं यह सब झेल रहा हूँ। जब तक मुझ जैसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यही बडा कारण है। भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस षडयन्त्र का शिकार हो सकता है!
    अत: यदि आपके पास केवल दो मिनट का समय हो तो कृपया मुझ उम्र-कैदी का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आप के अनुभवों से मुझे कोई मार्ग या दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये।
    http://umraquaidi.blogspot.com/
    आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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