बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आखिरकार गुजरात को 5 करोड़ रुपए लौटा ही दिए। बहुत ही अजीब सी घटना है। जैसे, स्कूल के एक बच्चे ने किसी दिन चार दोस्तों के बीच मजाक में इस बात का जिक्र कर दिया हो कि उसने अपने फलां दोस्त को अपनी टिफिन में से एक परांठा खिलाया था और परांठा खाने वाले बच्चे को बात इतनी बुरी लगी हो कि अगले दिन वह मां से जबरन परांठा बनवा कर लाया हो और पूरे स्कूल के सामने अपने दोस्त के सामने परांठा फेंक कर हेठी से कहा हो, ‘ले! उस दिन खाई थी, आज वापस कर दी।’
नीतीश कुमार ने कुछ ऐसी ही बचकानी हरकत की है कोसी आपदा फंड से पैसे लौटा कर। मैंने जब से खबर सुनी, सोच ही रहा था कि इसका विश्लेषण कैसे करना चाहिए? पहले मुझे लगा, यह उभरते हुए बिहार का आत्मसम्मान है। कुछ ऐसा ही आत्मसम्मान लाल बहादुर शास्त्री ने भी तो अमेरिका को दिखाया था, जब उन्होंने वहां जानवरों को खिलाए जाने वाले पीएल-80 किस्म की गेहूं का आयात बंद कर हरित क्रांति का नारा दिया था। लेकिन क्या वास्तव में गुजरात सरकार का विज्ञापन बिहार का अपमान करने की मंशा से दिया गया था? नीतीश के पैसा लौटाने की घोषणा के अगले दिन पटना के गांधी मैदान में भाषण देते हुए नरेंद्र मोदी ने जो कहा, कम से कम उससे तो ऐसा लगता नहीं। मोदी ने बिहार को लातूर भूकंप के समय मदद देने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि वह गुजरात में रहने वाले लाखों बिहारियों के प्रतिनिधि के तौर पर उनका कुशल क्षेम देने उनके घर आए हैं और उन्होंने गुजरात के विकास में बिहारियों के योगदान के लिए भी बिहार को धन्यवाद दिया। फिर यह मानने का कोई कारण नहीं है कि नीतीश की प्रतिक्रिया उभरते बिहार के आत्मसम्मान पर लगे चोट का जवाब है। तो यह क्या है?
सरकारी विज्ञापन देने की प्रक्रिया हम सब को पता है। वह मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या रेल मंत्री तय नहीं करते। अभी हाल में क्या हमने भारत सरकार के एक विज्ञापन में पाकिस्तानी सेनाधिकारी की तस्वीर नहीं देखी थी? क्या हाल ही में रेल मंत्रालय के एक विज्ञापन में दिल्ली को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं दिखाया गया था? मीडिया में कुछ हो-हंगामे के अलावा विपक्ष तक ने उन विज्ञापनों को तूल नहीं देकर समझदारी का ही परिचय दिया। लेकिन नीतीश में यह समझदारी नहीं है। क्या सच में नीतीश में समझदारी नहीं है? पिछले चार साल का जद (यू)- भाजपा गठबंधन का शासनकाल दरअसल नीतीश का वन मैन शो ही है। नतीश की कार्यप्रणाली कुछ-कुछ कांग्रेस के गांधी परिवार सी है। शासन की सारी शक्ति नीतीश से निकलती है और वहीं समाप्त होती है। इन चार सालों ने नीतीश को नेता से प्रशासक बना दिया है। अंग्रेजी में बात ज्यादा साफ होगी- नीतीश अब लीड नहीं करते, एडमिनिस्टर करते हैं। उनका अहंकार संगठन और शासन दोनों से बड़ा हो गया है और इसलिए उन्हें ऐसी कोई बात बर्दाश्त नहीं, जो उनके अहंकार को चुनौती देती हो।
बिहार में पिछले चार साल के शासनकाल में मुस्लिम तुष्टीकरण का जो नंगा खेल खेला जा रहा है, वह अद्भुत है। क्योंकि भाजपा सरकार का हिस्सा है, इसलिए मुस्लिमपरस्ती के ऐसे दसियों मसले हैं, जो न मीडिया में आ रहे हैं और न ही लोगों की जानकारी में। लेकिन नीतीश कुमार का लक्ष्य बहुत साफ है। उन्हें न तो बिहार के आत्मसम्मान की चिंता है, न बिहारियों की अपेक्षाओं की। उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए। किसी भी कीमत पर। क्योंकि तभी वह भाजपा को दुलत्ती मार कर अपने बूते सरकार में आ सकते हैं।
यह स्थिति बहुत करीब भी है। क्योंकि मुसलमान, महादलित (नीतीश की नई परिभाषा में) और कुर्मी एवं कोइरी उनके साथ हैं। यादव, ओबीसी की कई जातियां और मुसलमानों का एक वर्ग लालू के साथ है। अगड़ी जातियां कुछ तो जद (यू) के बागी नेताओं के साथ टूटेंगी और बाकी कांग्रेस के हलका सा भी मजबूत होते ही, उसकी झोली में जा गिरेंगी। भारतीय जनता पार्टी अपनी भ्रमित राजनीति और सुशील मोदी जैसे स्वार्थी तथा पदलोलुप नेताओं के कारण मटियामेट होने ही जा रही है। ऐसे में नीतीश के सामने वह विज्ञापन एक धारदार हथियार के तौर पर हाथ आया, जिसे भुनाने के लिए उन्होंने तुरंत वार कर दिया।
कुल मिलाकर इस घटना से तीन बातें बहुत साफ तौर पर सामने आई हैं। एक, नीतीश की प्रतिक्रिया केवल एक शातिर और अहंकारी राजनेता की राजनीतिक चाल है। दूसरी, नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का मजबूत उम्मीदवार बना कर पेश किया है। और तीसरी बात यह, कि भारतीय राजनीति में मुसलमानों को खुश करने के लिए कोई दल या नेता किसी भी स्तर तक जा सकता है।
