मायावती का दूसरा चेहरा

देश के राजनीतिक क्षेत्र को लेकर पिछले कुछ सालों से गाहे-बगाहे एक बड़ी विख्यात कहावत सुनाई देती रही है कि- ‘भले ही राजनीति कभी जनसेवा से जुड़ी हुई थी, लेकिन अब वह तिजारत में बदल गई है.’ उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने 15 मार्च को अपनी पार्टी बसपा की पच्चीसवीं वर्षगांठ के मौके पर आम आदमी की मेहनत से कमाए गए पैसे का जिस तरह से अपव्यय किया, उससे यह कहावत एक बार फिर सही साबित हो गई है. 15 मार्च को बसपा के संस्थापक कांशीराम का जन्मदिन आता है, सो इसी दिन को मायावती ने अपने शक्ति प्रदर्शन वाले दिन के रूप में तब्दील कर दिया. सही मायनों में यह उत्तरप्रदेश के इतिहास में किसी भी राजनीतिक पार्टी की सबसे बड़ी रैली थी, सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन था. और सबसे पैसे का सबसे ज्यादा अपव्यय भी. 15 मार्च की इस महारैली से एक सप्ताह पहले ही मायावती के इशारे पर पूरे लखनऊ को पार्टी के रंग से पाट दिया गया था. तीस लाख की आबादी वाले नवाबो के इस शहर के प्रत्येक कोने, प्रत्येक चैराहे पर बसपा के झंडे, होर्डिंग लगे हुए थे. पार्किंग, साज-सज्जा, मेहमानों की आगवानी पर पार्टी सुप्रीमों ने पूरी दरियादिली से पैसे लुटाए. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को यहां तक आरोप है कि इस एक दिन की रैली की तैयारी में मायावती ने सरकारी खजाने से दो सौ करोड़ रूपए खर्च कर डाले. रैली की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें पूरे देश से बीस लाख से भी ज्यादा पार्टी कार्यकर्ता शामिल हुए थे. उनके रहने, खान-पान पर करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए गए.

इस रैली ने मायावत की दोगली नीतियों को भी सार्वजनिक कर दिया. हाल ही में जब उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ में कृपालु महाराज द्वारा आयोजित एक भंडारे में भगदड़ मचने से साठ से भी ज्यादा भक्तों की मौत हो गई थी, तब वह मायावती ही थी, जिन्होंने सरकारी खजाने में पैसे की कमी का रोना रोया था. तब मृतकों के परिवारजनों को आर्थिक सहायता मुहैया कराने के बजाए मायावती ने गैरजिम्मेदाराना बयान दिया था कि आर्थिक सहायता के लिए उनकी सरकार के पास पर्याप्त पैसा ही नहीं है. और अब, चंद दिनों बाद ही अपनी पार्टी के संस्थापक के जन्मदिन के मौके पर करोड़ों रूपए की फिजुलखर्ची करके मायावती ने साबित कर दिया है कि वह अपने वोटबैंक के खातिर भले ही दलित-पिछड़े का राग अलापती हों, लेकिन असल में उनका और उनकी पार्टी का इनसे कोई लेना-देना नहीं है. मायावती ने साफ कर दिया है कि दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह ही उनकी कथनी और करनी में भी जमीन-आसमान का अंतर है.

वैसे भी भारतीय राजनीति में सत्ता पर काबिज पार्टियों और नेताओं की फिजुलखर्ची के ढेरो किस्से है. कड़वी हकीकत यही है कि जब भी जो पार्टी सत्ता में रहती है तो उस पार्टी का आर्थिक स्वास्थ्य फलने-फूलने लगता है. पिछले आठ साल में राजनीतिक पार्टियों द्वारा दाखिल किए गए चंदों के ब्योरे का विश्लेषण करने पर यह बात सामने आई है. 2004 में सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस की संपत्ति में तेजी से इजाफा होना शुरू हो गया था. कांग्रेस के फंड मे सालाना 28.5 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई. 2005 में पार्टी ने बतौर चंदा 277 करोड़ रुपए बटोरे थे, जबकि दो साल पहले यह रकम केवल 69 करोड़ रुपए थी. विचार की राजनीति करने चाली सीपीएम भी रईसी के मामले में फिसड्डी नहीं है. पार्टी ने 2001 से 2006 तक चंदे के रूप में 152 करोड़ रुपए उगाहे. दूसरों से अलग होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी सत्ता में रहते जमकर वसूली की. भाजपा ने 2000 से 2003 के बीच 300 करोड़ रुपए बतौर चंदा एकत्रित किया, लेकिन सत्ता जाने के बाद 2008 तक 142 करोड़ रुपए ही चंदा के रूप मे एकत्र किए.

असलियत यह है कि पार्टी द्वारा घोषित किए गए पार्टी कोष की रकम एवं वास्तविकता में चुनाव में खर्च की जा रही रकम का कहीं कोई तारतम्य नहीं होता है. महाराष्ट्र में चंद महीनों पहले चुनावों में हुए खर्चो से पार्टियों की फिजुलखर्ची का अंदाजा लगाया जा सकता है. कांग्रेस का बजट 172 विधानसभा सीटों के लिए लगभग 700 करोड़ रुपए का था. इसका मतलब औसतन एक विधानसभा क्षेत्रा पर 4 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हुआ. भाजपा ने इस विधानसभा चुनाव के अपने 119 उम्मीदवारों के लिए 400 सौ करोड़ रुपए खर्च किए थे. इसका अर्थ यह हुआ कि भाजपा ने उसके उम्मीदवारों द्वारा लड़ने वाली प्रत्येक सीट पर 3 करोड़ से ज्यादा खर्च किए. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जिसकी मान्यता जरूर राष्ट्रीय पार्टी के रूप में है, परन्तु जिसका वजूद एवं प्रभाव महाराष्ट्र में ही सबसे ज्यादा है, अपना वजूद महाराष्ट्र में बनाए रखने के लिए उसने अपना चुनावी बजट 500 करोड़ रुपए रखा था. इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने अपने प्रत्येक उम्मीदवार पर चार करोड़ से ज्यादा खर्च किए. बसपा का बजट भी 160 करोड़ रुपए के आसपास था. अगर इस पर भरोसा करें तो महाराष्ट्र विधानसभा का यह चुनाव 288 विधानसभा सीटों के लिए कुल 2100 करोड़ रुपए का खेल हुआ.

जहां तक मायावती का सवाल है, तो वे सरकारी खजाने के दुरूपयोग को लेकर हमेशा ही सुर्खियों में रही है. दलित की बेटी के नाम पर अपने मतदाताओं को बेवकूफ बनाकर देश के सबसे बड़े प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाली मायावती अपने जन्मदिन के मौके पर उसे एक प्रादेशिक पर्व के रूप में बदल देने के लिए कुख्यात है. ‘बहनजी’ के जन्म दिन के मौके पर उनके कार्यकर्ता गुंडों में तब्दील हो जाते हैं और जबरिया हफ्रता वसूली करते हैं. चंदे के नाम पर ‘बहनजी’ के हर जन्मदिन पर करोड़ों रूपए उगाहे जाते हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में मायावती दलित की बेटी के नाम का सहारा लेकर मुलायम सिंह यादव को सत्ता से हटाने में कामयाब हुई थी. उत्तरप्रदेश के मतदाताओं को उम्मीद थी कि गरीब के घर जन्मी बेटी उनके दुख-दर्द को समझेगी, उनकी समस्याओं को दूर करेगी और प्रदेश में गुंडों का आतंक कम होगा. लेकिन अफसोस कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मायावती के मंत्रीमंडल में भी आपराधिक छवि वाले नेता उसी संख्या में मौजूद हैं, जिस संख्या में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में थे. प्रदेश के मतदाताओं की सुध लेने के बजाए मायावती ने अपने और अपने गुरू कांशीराम की मुर्तियां लगवाने में ज्यादा दिलचस्पी ली.

दुख इसलिए भी होता है, क्योंकि बसपा पार्टी की स्थापना ही गरीबों, पिछड़ों और दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लिए हुई थी. लेकिन जिस तरह से बाद में समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह देश के शीर्ष उद्योगपतियों की गोद में जा बैठे, उसी तरह मायावती को मुर्तियों का शोक लग गया. सो, अब दलित वर्ग का प्रतिनिधी होने का दंभ भरने वाली बहनजी अपनी एक दिन की रैली में दो सौ करोड़ रूपए खर्च कर रही है. उनके पास हादसे में मारे गए लोगों की आर्थिक सहायता के लिए पैसे नहीं है, लेकिन अपनी पार्टी के शक्ति प्रदर्शन में वह करोड़ों रूपए स्वाहा कर देती है.

पिछले लोकसभा चुनावों में जब तमाम कोशिशों के बावजूद मायावती प्रधनमंत्री बनने की दौड़ में बहुत पीछे रह गई थी, तो उन्होंने आरोप लगाया था कि देश की तमाम पार्टियों ने इस पद पर पहुंचने से उन्हें रोकने के लिए मिलकर साजिश रची. मायावती का आरोप था कि कोई भी राजनीतिक पार्टी दलित की बेटी को प्रधानमंत्री बनते नहीं देखना चाहती है. लेकिन अगर दलित की बेटी एक दिन के आयोजन पर दो सौ करोड़ खर्च करती है, तो फिर अच्छा ही है कि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाई. यह भी अच्छा ही होगा कि वे भविष्य में भी इस कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए.

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