एक आग का दरिया है और डूब के जाना हैं पर साहिबान, डूबना तो दूर पास फटकना भी एक मुश्किल काम बन गया है। राजनीति के हालात तो कम से कम ऐसे ही जान पड़ते है। सुचिता और मूल्यों की राजनीति ही तो वो दरिया है जिससे जनसंघ रूपी राजनैतिक कमल का उदय हुआ। ‘‘पार्टी विद ए डिफरेंस’’ वाली भाषा सचमुच कई मायनो में डिफरेन्ट बन गई है। जानबूझ कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने से इतना डिफरेंस तो पैदा हो ही जाता है।
राष्ट्रीय राजनीति में पुनः पैर जमाने की जुगाड़ में लगी भाजपा की कथनी करनी का फर्क साफ नजर आने लगा है। झारखंड में शिबु सरकार को समर्थन देना एक ऐतिहासिक भूल थी जो सदैव ”सत्ता की भूखी’’ होने का एहसास कराती रहेगी।
जमीनी कार्यकर्ताओं की पार्टी आज भाई-भतीजावाद का शिकार है। पार्टी के नेता एसी में बैठे-2 ठंडे पड़ चुके ह। जिनसे राजनीति रूपी आग का दरिया पार करना असंभव है। और जो युवा क्षमतावान कार्यकर्ता इस काबिल है तो उन्हें शीर्ष पदों, दायित्वों पर भेजने के बजाए नेता आयात किए जा रहे है, कांग्रेस की तर्ज पर अनुकंपा की सेवा यहां भी शुरू कर दी गई हैं।
राज्यों में पार्टी की स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। आने वाले दिनों में कई जगहों पर भाजपा को ”उड़ीसा-संकट‘‘ या पटनायक वाले धोखे का स्वाद चखना पड़ सकता है। पर सवाल है क्या ये हालात बीजेपी की घटती लोकप्रियता के संकेत है? नहीं बल्कि खुद बीजेपी ही इन सबकी जिम्मेदार है।
बात बिहार की करे तो, जब राजग नामक गठबंधन का जन्म हुआ या तब भाजपा की परिस्थिति हर तरह से सशक्त थी। फिर भी बगैर किसी राजनैतिक मजबूरी के पार्टी ने गठबंधन में जदयू की स्थिति अपने से बीस बनाए रखा। चुनाव पूर्व सीटों के बंटवारे में अपनी परंपरागत सीटों से समझौता ही आज भाजपा को भारी पड़ रहा है। सरकार में 45प्रतिशत का साझीदार होते हुए भी पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के न केवल बुरे हालात है बल्कि जनता विकास कार्यों को केवल नीतिश के खाते जोड़ रही है।
राज्य में राहुल ब्रिगेड भी कसमसा रहा है। एक ओर जदयू पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगा चुका है दूसरी ओर अब कांग्रेस भी इसी तैयारी में है। और इस सब की जिम्मेदार भाजपा का शीर्ष नेतृत्व है जो 2004 से ही अदूरदर्शी फैसले करता आ रहा है।
बहरहाल पार्टी सत्ता में आए न आए “पार्टी विद डिफरेंस” बना रहना आवश्यक है। मुरझाते कमल को खिलाना है तो बगैर किसी गठबंधन की बैशाखी के विधानसभा क्या निकाय चुनाव सब लड़ना होगा। और पार्टी में नेताओं का आयात भाई-भतीजावाद अनुकंपा सेवा आदि को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक रोकथाम के उपाय करके होंगे।
शायद पार्टी को जनसंघ की पुरानी कार्य प्रणाली को अपनाने की जरूरत है तथी भगवा कांग्रेस का टैग सिर से हटेगा।

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