
आखिर में जनता को क्या हुआ फायदा ?
जनता की गाढी कमाई को क्यों किया बर्बाद ?
आखिर में फिर नए राज्यों की मांग क्यों ?
नए राज्यों के निर्माण से आखिर किसको हुआ फायदा ?
तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की मांग ने और भी कई राज्यों के नेताओं को एक बडा मुददा दे दिया है। जिधर देखो उधर हीं अलग राज्य की मांग का नारा। आखिर में और कितने अलग राज्य बनेंगे ? इन दिनों तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिये लगातार धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। सबसे बडा सवाल ये है कि आखिर ये लोग अलग राज्य बनाना क्यों चाहते हैं । क्या ये लोग स्थानीय जनता को ज्यादा फायदा पहुँचाने के लिये नए राज्य की मांग कर रहे हैं या फिर अपनी भलाई के लिये ऐसा चाहते हैं। क्योंकि जब से झारखंड अलग राज्य बना तो आप सब लोग देख रहे हैं कि झारखंड की क्या स्थिति है। इतने कम समय में झारखंड में कई मुख्यमंत्री बने लेकिन नतीजा वही कम समय में फिर कोई दूसरा मुख्यमंत्री। पूरे देश में झारखंड कोयला उगलने के लिये जाना जाता था। जितनी तेजी से यहाँ कोयला निकलता है उसी तेजी से राजनीति में झारखंड ने मुख्यमंत्री को उगला है। अब तो झारखंड को लोग कोयला पैदा करने के लिये कम जानते हैं और ज्यादा घोटाला करने वाला राज्य एवं मधु कोड़ा के नाम से ज्यादा जानते हैं। बाहर के राज्यों में झारखंड के बारे में लोगों की यही राय है कि मधु कोड़ा वाले राज्य की बात कर रहे हैं क्या ?
अब जब झारखंड में नई सरकार बनी तो इस बार फिर से जनता के सामने एक नया विकल्प तैयार है कि गुरूजी की पारी जरूर कुछ अच्छा करेगी । लेकिन क्या आज हम कह सकते हैं कि जो भी होगा वो अच्छा हीं होगा। इस बात को कहने के लिये न सिर्फ हमें सोचना होगा बल्कि कहने के पहले सौ बार सोचना पडेगा कि कहीं फिर से पुरानी कहानी हीं न दुहराई जाय।
जिस विश्वास से जनता ने किसी एक पार्टी को अपना मत ना देकर सबकी झोली में थोड़ा हीं सही लेकिन किसी को निराश भी नहीं किया। ठीक उसी तरह से इन जनप्रतिनिधियों को भी जनता का कम से कम उस तरह से तो खयाल रखना हीं चाहिये जैसा जनता ने इनके साथ किया है। अपने कर्तव्यों पर ये खरा ना भी उतरे तो कोई बात नहीं कम से कम एक कोशिश तो कर हीं सकते हैं। अभी के हालात तो यही कहते हैं कि हर किसी की नजर मुख्यमंत्री की हीं कुर्सी पर टिकी हुई है।
बात चाहे जो भी हो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर शिबू हीं हो लेकिन इस बार तो कोई ऐसा काम होना चाहिये जिससे कि झारखंड की छवि ऐसी हो जाय कि लोग गर्व से कहे कि हाँ झारखंड भी कोई राज्य है और यहाँ सिर्फ घोटाला हीं नहीं होता है बल्कि काम भी होता है। इस राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जो कोई भी बैठेगा या बैठा है उसे कई सारी चुनौतियों का सामना करना पडेगा। इस राज्य की सबसे बडी समस्या है उग्रवाद उसके बाद सामने आती है गरीबी और अशिक्षा । जबकि इस राज्य के कोयले से देश के कई राज्य उन्नत हो रहे हैं लेकिन इस राज्य के लोग आज भी रोटी कपडा और मकान के लिये तरस रहे हैं। ऐसी भी बात नहीं है कि यहाँ के नेता जैसा पहले थे आज भी वैसे हैं .। यहाँ के जनप्रतिनिधि चुनाव के पहले गरीब होते हैं और जैसे हीं किसी पद पर जाते हैं पता नहीं, कहाँ से धन की वर्षा कर लेते हैं अपने लिये ,और ये कहलाने लगते हैं धनपति । इसके बाद तो इनके शौक हो जाते हैं लग्जरी गाडीयों में घूमना वातानुकूलित कमरों में रहना।
अब आप याद करिये 74 के छात्र आंदोलन की क्या उस समय के जो छात्र पढने वाले थे वे पढ पाए बिल्कुल नहीं । क्योंकि उस समय तो सिर्फ एक हीं नारा था छात्र आंदोलन । क्या आपको लगता है कि उस वक्त के आंदोलन ने छात्रों के लिये कुछ विशेष किया। उस वक्त के आंदोलन ने बिहार के कुछ गिने-चुने नेताओं को राजनीति करने के लिये एक जमीन मुहैया करा दी थी छात्र आंदोलन के रूप में। ठीक उसी तरह से आज तेलंगाना में स्थिति हो गई है रानेताओं ने अब छात्र को आगे बढा कर राजनीति करनी शुरू कर दी है। चाहे इससे देश का भला हो या ना हो उनकी राजनीति तो खूब चल निकली है। छात्र तो हिमालय पर्वत के समान होते हैं और उन्हें बहुत ज्यादा अंजाम की परवाह नहीं होती है तभी तो वे अपने – आप को भी आग के हवाले करने से नहीं चूकते हैं। ये बात हम नहीं कह रहे हैं कि 74 के छात्र आंदोलन ने इस राज्य को क्या दिया बल्कि ये बात उस समय सैनिक स्कूल के छात्र रहे और वर्तमान में नेवी के ऑफिसर से बातचीत के बाद सामने आया उनका कहना है कि अगर मैं उस समय सैनिक स्कूल में नहीं पढता रहता तो आज मैं भी कोई छोटा-मोटा नेता होता या फिर कोई बडा नेता होता। आखिर में ये क्या हो गया है हमारे नौजवानों को जो कि वे अपनी उर्जा को इस तरह के आंदोलनों में झोंक दे रहे हैं जबकि इसी उर्जा को ये अगर देश के हित में लगाए तो देश के साथ-साथ खुद इनका भी भला हो सकता है। सिर्फ नये राज्यों के निर्माण से कुछ नहीं हो सकता है बल्कि अच्छे काम करने से और सही दिशा में कदम बढाने से सही नतीजा निकल सकता है। क्या हमने इसी दिनों के लिये आजादी पाई थी ? क्या देष की आजादी में अपने आप को कुर्बान करनेवाले रणबांकुरों ने इसी दिन के लिये अपने- आप को कुर्बान किया था देश के लिये ? क्या शहीदों की आत्मा को कभी शांति मिल पाएगी अपने हीं देश में अपनी हीं हुकूमत से लडाई लडने के लिये ? ये सारे सवाल उन सभी के लिये है जो चाहते हैं कि इस तरह के आंदोलन से हमें सत्ता मिल जाएगी। क्योंकि सत्ता भी आपकी हीं है और राष्ट्र भी आपका हीं है। तो भला लडाई किस बात की। आज बिहार अपने नए नाम के साथ जाना जाने लगा है उसके पीछे एक हीं कारण है कि कुछ नया और अच्छा करने की सोच और जज्बा। हमें और आप सबों को इस नये बिहार से सीख लेनी चाहिये कि अगर सही इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी हासिल किया जा सकता है बशर्ते कि वो सही दिशा की ओर ले जाता हो।
(लेखक भागलपुर के जाने-माने पत्रकार और ” आप की आवाज ” समाचार चैनल के संपादक है .)


राज्यों के पुनर्गठन का प्रश्न प्रभावशाली शासन से जुड़ा है, जो आकार में बड़े राज्यों में दुष्कर हो जाता है. जब कोई राज्य क्षेत्रफल और जनसंख्या में बहुत बड़ा होता है तो निगरानी का कम लचर हो जाता है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उत्तर प्रदेश से ज्यादा आबादी भारत को छोड़ सिर्फ चार देशों की है, महाराष्ट्र की आबादी फिलीपिंस से अधिक है जो आबादी की दृष्टि से विश्व में 11वां सबसे बड़ा देश है, बिहार की आबादी जर्मनी से अधिक है, पश्चिम बंगाल की आबादी इथोपिया से अधिक है . क्या हमारे पास ऐसा तंत्र है जो इतनी अधिक जनसंख्या वाले राज्य को सम्यक रूप से शासित कर सके ? अतः राज्यों के पुनर्गठन के प्रश्न को व्यापक नजरिये से देखने की जरुरत है.
राज्यों के पुनर्गठन का प्रश्न प्रभावशाली शासन से जुड़ा है, जो आकार में बड़े राज्यों में दुष्कर हो जाता है. जब कोई राज्य क्षेत्रफल और जनसंख्या में बहुत बड़ा होता है तो निगरानी का काम लचर हो जाता है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उत्तर प्रदेश से ज्यादा आबादी भारत को छोड़ सिर्फ चार देशों की है, महाराष्ट्र की आबादी फिलीपिंस से अधिक है जो आबादी की दृष्टि से विश्व में 11वां सबसे बड़ा देश है, बिहार की आबादी जर्मनी से अधिक है, पश्चिम बंगाल की आबादी इथोपिया से अधिक है . क्या हमारे पास ऐसा तंत्र है जो इतनी अधिक जनसंख्या वाले राज्य को सम्यक रूप से शासित कर सके ? अतः राज्यों के पुनर्गठन के प्रश्न को व्यापक नजरिये से देखने की जरुरत है.