बिहार में 11.500 करोड़ रुपयों के वित्तीय अनियमितता की बात सीएजी की रपट में सामने आई है. ये हेराफेरी का मामला वर्ष 2002 से 2008 के बीच का हैं .पटना हाई कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार, उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी, स्वास्थ्य मंत्री नन्द किशोर यादव समेत 47 अन्य को मुख्य अभियुक्त बनाया गया है . आरोपपत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि वर्ष 2002 से 2008 तक सरकारी खजाने से 11,500 करोड़ रुपयों की निकासी का कोई हिसाब किताब नहीं है. पटना हाई कोर्ट के द्वारा मामले की सी0बी०आई० जांच के आदेश दे दिए गये हैं .
इस खज़ाना घोटाले में नीतीश शामिल हो या ना हों लेकिन जिम्मेदारी तो उन पर भी आती है क्योंकि जनता ने चारा चोरों से मुक्ति के लिए उन्हें चुना था ! जहाँ एक ओर नीतीश कुमार विश्वास यात्रा करके बिहार की जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं वहीँ दूसरी ओर अरबों रुपयों के नए घोटाले से उनकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है .वैसे इस घटना से फनफना कर मीडिया और विधानसभा में हंगामा करने वाले विपक्षी दलों के मुखिया लालू प्रसाद चाहे जो भी कहें लेकिन इस मामले में भी उनका दामन पाकसाफ नहीं है क्योंकि बात 2002 से 2008 की है . गौरतलब हैं कि ०२ से ०५ के बीच उनकी श्रीमती राबड़ी देवी सत्ता में थी ! एक महत्वपूर्ण सवाल विधानसभा की नौटंकी के बीच दबकर रह जाती है कि क्या नीतीश के खज़ाना चोर हो जाने से लालू के चारा खाने का पाप कम हो जाता है ?
बिहार में एक तरफ लोग भूखे मर रहे हैं, पेट की आग बुझाने के लिए लोग दुसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं, बिहार के सरकारी कर्मचारियों को पूरा वेतन तक नहीं दिया जा रहा है,वहीँ दूसरी और बड़े बड़े घोटाले सामने आ कर नितीश कुमार के उन तमाम दावों को झुठला रही है कि बिहार विकास की राह पर है.
बहरहाल इस पूरे मामले ने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया है .कल तक सुशासन बाबु के शासन काल को गुप्तकाल जैसा स्वर्णयुग की संज्ञा दी जा रही थी जो अचानक वापस जंगल राज की ओर लौटती लग रही है ! बेचारी आम जनता पेशोपेश में पड़ी है ! आखिर बिहारवासी करे भी तो क्या करें ? ” हर साख पे उल्लू बैठा है ” वाली कहावत बिहार के नेताओं पर सटीक बैठती है . बात केवल नीतीश की नहीं है , वर्तमान समय में अधिकांश जनप्रतिनिधि, वो चाहे विपक्ष के हों या सत्ता पक्ष के , वही हैं जो लालू राज में थे .
सत्ता की भूख और लालू-पासवान को जल्दी निपटने की सनक ने नीतीश को धृतराष्ट्र बना दिया . सालों तक जिस राजद -लोजपा के विधायकों , मंत्रियों , नेताओं को गलियाते रहे ,जिनके दामन के दागों को गिन-गिन कर बताते रहे , आज वो सब के सब उन्ही के वफादार सैनिक हैं . कल के (वैसे आज भी नही सुधरे हैं ) चोरों के भरोसे जनता को विकास का सब्जबाग दिखाया जा रहा है . केवल सेनापति के सहारे जंग जीत पाना कठिन है जब सैनिक अपने स्वार्थ में लडाई छोड़ सकता हो । वैसे चोर ह्रदय वालों के सम्बन्ध में एक बात कही गई है ; ‘ चोर चोरी से जाए तुम्बाफेरी से न जाए ‘.मुंह में तिनका लगाये घूम रहे इन भेड़ियों की एक लम्बी -चौडी सूची है , कितनो का नाम गिनाया जाए ? 05 में नवनिर्वाचित विधानसभा रद्द होते हीं 20से ज्यादा बंगले के पहरेदार तीर के शरणागत हो गए थे . तब से अब तलक राजद- लोजपा के सैकडों छोटे -बड़े नेता नीतीश की विकास गंगा में डुबकी लगा अपने पापों का बोझ कम कर चुके हैं . परन्तु जिसे गंगा समझने की भूल की जा रही है वो तो बरसाती नदी है . नीतीश , लालू-पासवान के भ्रष्ट -दागी लोगों को अपने खेमे में लाकर सत्ता में बने रहने की सोच रहे हैं । अफ़सोस होता है कि पढ़े-लिखे नीतीश यह बात क्यूँ भूल गये कि जनता ने इन्ही के विकास विरोधी कार्यों के ख़िलाफ़ उनको जनमत सौंपा था .
पिछली सरकार और इस सरकार में अंतर बस इतना भर है कि चोरों के सरदार बदल गये हैं . अब जनता किसे गद्दी पर बिठाए ? लालू और नीतीश के अलावा कोई विकल्प फिलहाल तो नहीं दिखता है ?


संपादक जी, आपके लेख का टाइटल महिला विरोधी है. ज्यादा धारदार बनाने की कोशिश में उल्टा ही हो गया है.
क्या मादा होना कोई दोष है या शर्म का विषय है?
सार्थक लेखन व ब्लोगिंग,दरअसल इस देश में जनता द्वारा निगरानी व्यवस्था यानि सामाजिक जाँच और उसके रिपोर्ट पर कार्यवाही को सख्ती से जबतक अमल में नहीं लाया जायेगा तबतक इन भ्रष्टाचारियों को कोई रोकने वाला नहीं है |
लेख का शीर्षक बदलने के लिए धन्यवाद.
चोर तो सभी है दूध का धोया कोई नहीं है, जनता केवल यह देखती है किसके शासन में क्या सुविधाएँ मिली है, यह सही है नितीश कुमार के शासन में आज बिहार में सड़के नज़र आने लगी है, इनकी सत्ता में लोंगों का डर कम हुआ है क्यों की लो एंड आर्डर दुरुस्त है असमाजिक तत्वों का बोल-बाला नहीं के बराबर है, राज्य में काम हो रहा है इसलिए बाज़ार में पैसा भी नज़र आ रहा है, लोगों का जीवन-स्तर ऊपर उठा है, जनता को यही चाहिए, सत्ता या सत्ताधारी जनता को पैसा नहीं देते है, वह अपना काम कर के ही अपना जीवन चलती है, इसलिए जिसके शासन में शांति मिलेगी जनता उसी को जिताती है वहां जाति और धर्म भी ख़त्म हो जाती है. बिहार की जनता पंद्रह साल का कुशासन देख चुकी है. अब पंद्रह साल सुशासन का भी तो मज़ा लेने दीजिये बिहार की जनता को, शायद पंद्रह साल में बिहार भी गुजरात बन जाये.