35. यौन अपराध
35.1 यौन अपराध- खासकर बलात्कार- के मामले बंद अदालतों में चलाये जायेंगे।
35.2 इन अदालतों में ‘ज्यूरी’ का होना अनिवार्य होगा, जिसमें सामाजिक कार्यकर्त्ता, मनोविज्ञानी, पुलिस अधिकारी, वकील, डॉक्टर तथा पत्रकार के रूप में छह महिला और छह पुरूष सदस्य होंगे।
35.3 अदालत में पीड़िता स्त्री द्वारा एक बार अपराध में अपनी ‘असहमति’ या अपने समर्पण को किसी किस्म की ‘मजबूरी’ बताये जाने के बाद इसे ग़लत साबित करने के लिए बहस नही की जायेगी।
35.4 वास्तव में, अपनी पत्नी तथा ‘नगरवधू’ (25.3) के अलावे किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने या ऐसी कोशिश करने को ही इस देश में दण्डनीय अपराध माना जाएगा- नाबालिगों के मामले में यह ‘काल कोठरी’ में डाल दिए जाने लायक अपराध होगा। (‘काल कोठरी’, यानि अन्तिम साँस तक जहाँ सूर्य के दर्शन नही होंगे।)
35.5 स्त्री द्वारा अपनी सहमती या समर्पण की बात स्वीकार करने पर यह ‘बलात्कार’ नही, बल्कि ‘अनैतिक सम्बन्ध’ का मामला बन जाएगा; और स्त्री-पुरूष दोनों को चेतावनी, जुर्माने से लेकर कारावास तक की सजा दी जा सकेगी। (जाहिर है कि किसी ‘तीसरे पक्ष’ द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बाद ही ‘अनैतिक सम्बन्ध’ के मामले अदालतों तक आ पाएंगे।)
35.6 बलात्कार के प्रत्येक मामले में बलात्कारी को जेल की सजा तो मिलेगी ही; इसके अलावे, “स्त्री-हारमोन” का इंजेक्शन लगाकर उसका लिंग-परिवर्तन किया जाय या नही- इसके लिए जनमत सर्वेक्षण कराया जाएगा और उसी अनुरूप कारवाई की जायेगी।
