संसद मार्ग|2010/04/16 5:38 am

कांग्रेस और बसपा राजनीति के बदरंग चेहरे

दिनांक 14 अप्रैल को उ0 प्र0 के अबेडकर नगर मे कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने जहां बसपा को दलित विरोधी बताया वही मायावती जी ने काग्रेस पर आरोप लगाया कि काग्रेस ने अम्‍बेडकर की हमेसा उपेक्षा की। दोनो पर्टियां अपने अपने तरीके से अम्‍बेडकर जी का तो गुणगान कर रही है लेकिन उनके अनुसार वे ही सच्‍ची दलित  हितैषी है और दूसरी राजनैतिक पार्टी का दलितों के उत्‍थान से कुछ लेना देना नही है। जबकि सच्‍चाई यह है कि इन दोनो पार्टियों का दलित उत्‍थान से कुछ लेना देना नही है। इनका उददेश्‍य तो अम्‍बेडकर के नाम पर राजनीति कर सत्‍ता हथियाना है। यदि ये दोनों पार्टियां वास्‍तव मे दलित हितैसी है तो उनमे विरोध किस बात का। यदि हमे और तुम्‍हे एक साथ एक ही उददेश्‍य के लिये कार्य करना है तो विरोध किस बात का। इस सम्‍बंध मे मै एक कहानी सुनाना चाहता हूँ . हुआ यह कि एक बच्‍चा दलदल मे गिर गया और कमर तक धंस गया। बच्‍चा बचाओं बचाओं की आवाज दे रहा था अचानक एक व्‍यक्ति की नजर उस बच्‍चे  पर पडी बच्‍चे को देखकर वह व्‍यकित तत्‍काल उसके पास आया और बच्‍चे को उपर खीचने लगा लेकिन बच्‍चा कीचड मे इतना धंस गया था कि एक अकेले व्‍यक्ति के बस मे नही था कि वह बच्‍चे को बचा सके। अचानक उसकी आवाज एक और व्‍यक्ति जो उधर से गुजर रहा था के कानो मे पडी। उसने देखा कि दलदल मे धंस रहा बच्‍चा उसके गांव का है और चीख पुकार कर रहा है। वह व्‍यक्ति भी दौडकर उस बच्‍चे के पास गया। अचानक हम क्‍या देखते है कि दोनो आपस मे लडने लगे एक व्‍यक्ति कह रहा था कि वह उस बच्‍चे को बचायेगा क्‍योकि वह उसके गांव का है जबकि दूसरा कह रहा था कि वह उस बच्‍चे को बचायेगा क्‍योंकि वह उसका पडोसी हैं जबकि दोनो को मालूम है कि वह अकेले उस बच्‍चे को नही बचा सकते है। फिर विरोध क्‍यों। दोनो ने उस बच्‍चे की एक एक बांह पकड ली कुछ समय बाद हम क्‍या देखते है कि कमीज का आधा हिस्‍सा एक व्‍यक्ति के हाथ मे और आधा दूसरे व्‍यक्ति के हाथ मे था और बच्‍चा दलदल मे धंस चुका था। हमने बिचार करना शुरू किया कि आखिर ऐसा क्‍यों हुआ। काफी बिचार विमर्श के बाद मैं इस नतीजे पर पहुचा वास्‍तव मे दोनों का उददेश्‍य उस बच्‍चे को बचाना नही था बल्कि उसके कमीज को प्राप्‍त करना था इसलिये दोनों बांह पकडने का दिखावा कर रहे थे ज‍बकि दोनो ने उस बच्‍चे की कमीज पकड रखी थी। परिणाम स्‍परूप कमीज बीच से फटकर दोनों के हाथ मे आ गयी और बच्‍चा कीचड मे डूब गया।  ठीक इसी प्रकार कांग्रेस और बसपा दोनो दलित रूपी बच्‍चा जो शदियों से गरीबी के दलदल मे डूब रहा है को बचाने का केवल दिखावा कर रहे हैं वास्‍तव मे उन्‍हे सत्‍ता रूपी कमीज की दरकार है। लेकिन प्रकृति के नियम भी अजीब है सत्‍ता रूपी कमीज का कितना हिस्‍सा किसके हिस्‍से मे आयेगा वह समय ही बतायेगा। वास्‍तव मे इस विवाद मे दलितों को कुछ नही मिलना है। दोनो नेता एक दूसरे पर दलितों के उपेक्षा का आरोप लगाते है लेकिन वे दलितों के उत्‍थान के लिये वास्‍तव मे क्‍या कर रहे है पता नही है यदि वे सत्‍ता मे रहते हुए कुछ नही कर पा रहे है तो अगर सत्‍ता से वाहर हो जांय तो क्‍या करेगें। एक कह रहा है कि वह केन्‍द्र से पैसा दे रहे है लेकिन राज्‍य सरकार उसका सही उपयोग नही कर रही है इसलिये दलितो का सही प्रकार उत्‍थान नही हो पा रहा है तो दूसरा कह रहा है कि राज्‍य सरकार को केन्‍द्र से अपेक्षित धन नही मिल पा रहा है इसलिये दलितों का वह विकास नही कर पा रही है। एक केन्‍द्र की सत्‍ता प्राप्‍त करना चाह रहा है तो दूसरा राज्‍य मे। क्‍या जरूरी की केन्‍द्र मे सत्‍ता प्राप्‍त करने के बाद बसपा के पास राज्‍य की सत्‍ता रह जाय या कांग्रेस को राज्‍य की प्राप्‍त होने के बाद केन्‍द्र की सत्‍ता प्राप्‍त ही रहे। वास्‍तव मे विकास के लिये सत्‍ता की जारूत है लेकिन केवल सत्‍ता के माध्‍यम से ही सहायता की जा सकती सही नही है। मेरा तो मानना है कि यदि वास्‍तव मे दोनों पार्टियां दलितों का उत्‍थान करना चाहती है तो दोनों कम से कम इस मुददे पर एक दूसरें का विरोध बन्‍द करें और दोनो मिलकर प्रयास करे। गरीब दलितों ने उन्‍हे सत्‍ता देकर अपने भविष्‍य को इनके हाथों मे सौप दिया है यदि दोनो ऐसे ही लडते रहे तो इस लडाई मे अन्‍तत: किसी को कुछ हासिल नही होगा।

कांग्रेस और बसपा राजनीति के बदरंग चेहरेदिनांक 14 अप्रैल को उ0 प्र0 के अबेडकर नगर मे कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने जहां बसपा को दलित विरोधी बताया वही मायावती जी ने काग्रेस पर आरोप लगाया कि काग्रेस ने अम्‍बेडकर की हमेसा उपेक्षा की। दोनो पर्टियां अपने अपने तरीके से अम्‍बेडकर जी का तो गुणगान कर रही है लेकिन उनके अनुसार वे ही सच्‍ची दलित  हितैषी है और दूसरी राजनैतिक पार्टी का दलितों के उत्‍थान से कुछ लेना देना नही है। जबकि सच्‍चाई यह है कि इन दोनो पार्टियों का दलित उत्‍थान से कुछ लेना देना नही है। इनका उददेश्‍य तो अम्‍बेडकर के नाम पर राजनीति कर सत्‍ता हथियाना है। यदि ये दोनों पार्टियां वास्‍तव मे दलित हितैसी है तो उनमे विरोध किस बात का। यदि हमे और तुम्‍हे एक साथ एक ही उददेश्‍य के लिये कार्य करना है तो विरोध किस बात का। इस सम्‍बंध मे मै एक कहानी सुनाना चाहता हूँ . हुआ यह कि एक बच्‍चा दलदल मे गिर गया और कमर तक धंस गया। बच्‍चा बचाओं बचाओं की आवाज दे रहा था अचानक एक व्‍यक्ति की नजर उस बच्‍चे  पर पडी बच्‍चे को देखकर वह व्‍यकित तत्‍काल उसके पास आया और बच्‍चे को उपर खीचने लगा लेकिन बच्‍चा कीचड मे इतना धंस गया था कि एक अकेले व्‍यक्ति के बस मे नही था कि वह बच्‍चे को बचा सके। अचानक उसकी आवाज एक और व्‍यक्ति जो उधर से गुजर रहा था के कानो मे पडी। उसने देखा कि दलदल मे धंस रहा बच्‍चा उसके गांव का है और चीख पुकार कर रहा है। वह व्‍यक्ति भी दौडकर उस बच्‍चे के पास गया। अचानक हम क्‍या देखते है कि दोनो आपस मे लडने लगे एक व्‍यक्ति कह रहा था कि वह उस बच्‍चे को बचायेगा क्‍योकि वह उसके गांव का है जबकि दूसरा कह रहा था कि वह उस बच्‍चे को बचायेगा क्‍योंकि वह उसका पडोसी हैं जबकि दोनो को मालूम है कि वह अकेले उस बच्‍चे को नही बचा सकते है। फिर विरोध क्‍यों। दोनो ने उस बच्‍चे की एक एक बांह पकड ली कुछ समय बाद हम क्‍या देखते है कि कमीज का आधा हिस्‍सा एक व्‍यक्ति के हाथ मे और आधा दूसरे व्‍यक्ति के हाथ मे था और बच्‍चा दलदल मे धंस चुका था। हमने बिचार करना शुरू किया कि आखिर ऐसा क्‍यों हुआ। काफी बिचार विमर्श के बाद मैं इस नतीजे पर पहुचा वास्‍तव मे दोनों का उददेश्‍य उस बच्‍चे को बचाना नही था बल्कि उसके कमीज को प्राप्‍त करना था इसलिये दोनों बांह पकडने का दिखावा कर रहे थे ज‍बकि दोनो ने उस बच्‍चे की कमीज पकड रखी थी। परिणाम स्‍परूप कमीज बीच से फटकर दोनों के हाथ मे आ गयी और बच्‍चा कीचड मे डूब गया।  ठीक इसी प्रकार कांग्रेस और बसपा दोनो दलित रूपी बच्‍चा जो शदियों से गरीबी के दलदल मे डूब रहा है को बचाने का केवल दिखावा कर रहे हैं वास्‍तव मे उन्‍हे सत्‍ता रूपी कमीज की दरकार है। लेकिन प्रकृति के नियम भी अजीब है सत्‍ता रूपी कमीज का कितना हिस्‍सा किसके हिस्‍से मे आयेगा वह समय ही बतायेगा। वास्‍तव मे इस विवाद मे दलितों को कुछ नही मिलना है। दोनो नेता एक दूसरे पर दलितों के उपेक्षा का आरोप लगाते है लेकिन वे दलितों के उत्‍थान के लिये वास्‍तव मे क्‍या कर रहे है पता नही है यदि वे सत्‍ता मे रहते हुए कुछ नही कर पा रहे है तो अगर सत्‍ता से वाहर हो जांय तो क्‍या करेगें। एक कह रहा है कि वह केन्‍द्र से पैसा दे रहे है लेकिन राज्‍य सरकार उसका सही उपयोग नही कर रही है इसलिये दलितो का सही प्रकार उत्‍थान नही हो पा रहा है तो दूसरा कह रहा है कि राज्‍य सरकार को केन्‍द्र से अपेक्षित धन नही मिल पा रहा है इसलिये दलितों का वह विकास नही कर पा रही है। एक केन्‍द्र की सत्‍ता प्राप्‍त करना चाह रहा है तो दूसरा राज्‍य मे। क्‍या जरूरी की केन्‍द्र मे सत्‍ता प्राप्‍त करने के बाद बसपा के पास राज्‍य की सत्‍ता रह जाय या कांग्रेस को राज्‍य की प्राप्‍त होने के बाद केन्‍द्र की सत्‍ता प्राप्‍त ही रहे। वास्‍तव मे विकास के लिये सत्‍ता की जारूत है लेकिन केवल सत्‍ता के माध्‍यम से ही सहायता की जा सकती सही नही है। मेरा तो मानना है कि यदि वास्‍तव मे दोनों पार्टियां दलितों का उत्‍थान करना चाहती है तो दोनों कम से कम इस मुददे पर एक दूसरें का विरोध बन्‍द करें और दोनो मिलकर प्रयास करे। गरीब दलितों ने उन्‍हे सत्‍ता देकर अपने भविष्‍य को इनके हाथों मे सौप दिया है यदि दोनो ऐसे ही लडते रहे तो इस लडाई मे अन्‍तत: किसी को कुछ हासिल नही होगा।

: by आर एस सिंह पटेल

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