संसद मार्ग|2010/01/06 7:59 pm

कब गाँधी पर जूते-चप्पल ,अंडे और टमाटर फेंके गये ?

 

दिल्ली से पटना की मेरी यात्रा महज इस ख्याल से कि एक शादी में शामिल होना था। साथ ही उन यादों को तरोताजा करने का अवसर, जिसे मैने ८ साल पहले गुजारा था, मेडिकल की तैयारी के लिए। लेकिन यह यात्रा मेरे कुछ अनसुलझे सवालों का जवाब भी दे गई, जैसे भारतीय राजनीति में विकास बाधक मुस्लिम तुष्टिकरण आज सांतवे आसमान पर क्यों है? भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार की शुरूआत कब और कहां से हुई? ९ तारीख को शादी थी और ७ तारीख को मैने गरीब रथ में अपना आरक्षण करवा रखा था। ऐसे तो यात्राएं सबकी सुखद होती है पर अचानक होने वाली अनचाही घटनाओं से मन उदास भी हो जाता है। लेकिन छोड़िए इन सब बातों को। जब बात यात्रा की हो रही है तो भिन्न-भिन्न माध्यमों से सफर करने का अलग ही कुछ मजा होता है। वहीं कुछ यात्राए ऐसी भी होती है जो बोरियत सा महसूस करा देती हैं। मैं कोई साधारण डिब्बे में सफर की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि हवाई जहाज और रेलगाड़ी के एसी प्रथम और द्वितीय श्रेणी में यात्रा के संबंध के बारे में बता रहा हूं। 

मैंने हवाई जहाज और एसी टू टायर में जब सफर किया तो पाया की इस यात्रा में अमीरी व बड़ापन तो झलकता है लेकिन वो प्रसन्नता और आनन्द नहीं मिल पाता जो शयनयान कक्ष "रेलवे'' का है। क्योंकि हवाईजहाज में सफर चंद घंटो में खत्म हो जाता है और एसी में यात्रा करने वाले लोग इतने बड़े बनने की जुगाड़ में लगे रहते हैं कि एक दूसरे से मानो मुंह फूला कर बैठे चुपचाप दिखाई देते हैं। वही स्लीपर क्लास के सफर में कितने अनजाने लोग जो न सिर्फ क्षेत्रीय भिन्नता के होते बल्कि भाषाओं में भी काफी अन्तर होता है लेकिन जैसे-जैसे ही सफर का कारवां बढ़ता जाता है तमाम क्षेत्रीय, भाषाई और जातीय बंधन टूटकर हम सब भारतीय है इसका आभास होने लगता है। फिर तो चाय की चुस्किया और व्यंजनों का आदान प्रदान भी शुरू हो जाता है। कई बार तो व्यंजनों में मिलावट से किसी-किसी को बड़ा नुकसान भी पहुंच जाता है लेकिन भगवान का शुक्र है कि मुझे इस नौबत का सामना नहीं करना पड़ा है। 

हां तो हम बात कर रहे थे पटना के सफर की, गरीब रथ का एसी था टायर में प्रवेश से पहले मुझे लग रहा था कि यह सफर भी बोरियत भरा होगा और लोग खुद को और से बड़ा अमीर मानकर चुप रहना पसंद करते होंगे। लेकिन इसमें प्रवेश करते ही मेरी सारी गलतफहमी दूर हो गई। क्योंकि यात्रा करने वाले ज्यादातर लोग स्लीपर क्लास में सफर करने वाले थे, दो-चार लोगों को छोड़ कर। मैं थोड़ा या कहे ज्यादा बड़बोला और मजाकिया किस्म का इंसान हूं। इसलिए सफर में थोड़ा हंसी मजाक और बातचीत न हो मुझे मजा नहीं आता। जब बातचीत का सिलसिला हो और राजनीति पे चर्चा न हो तो और भी सफर फीका-फीका सा लगने लगता है। 

बात चल रही थी पटना के राजनीति और ८ सालों में बदले उसके छवि को लेकर और आपको पता ही होगा कि बात जब चलती है तो कहाँ से कहाँ तक पहुच जाती है। जी हाँ! बात तो चली थी पटना से लेकिन कुछ यूपी के भी लोग थे इसलिए बाबरी मस्जिद पर भी चर्चा उठ ही गई। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट जो १७ सालों बाद सामने आई थी। एक महिला ने कहा कि कार सेवकों के साथ बहुत ज्यादती की गई थी, उन्हें बेरहमी से न सिर्फ पीटा गया बल्कि कईयों को जान भी गवानी पड़ी। इतना ही नहीं देश में कई सारे मंदिर है, जिनके ढ़ांचे आज भी विवादों के घेरे में आते हैं। इसी बीच एक वृद्ध सज्जन भी चर्चा में शामिल हो गए उम्र से ८०-८५ वर्ष के। उन्होंने बताया की सारी गलती महात्मा गांधी की थी। न इस अखंड भारत का विभाजन होता और हुआ भी था तो पूर्ण न होने के कारण जो समस्याएं हम झेल रहे है इसके पीछे भी जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी की जुगलबंदी रही है। 

मैंने पूछा आपने इसके बारे पढ़ा है क्या? तो वे बोले मैं भी एक स्वतंत्रता सेनानी था। इसलिए इन सारी घटनाओं को मैंने करीब से देखा और समझा है। नाथू राम गोडसे ने जो किया गलत नहीं किया बसर्ते उन्हें यह बहुत पहले करना चाहिए था। उन्होंने गांधी जी की दो-चार कारनामों के किस्से भी हमें सुनाए की एक बार गांधी जी पर चप्पलों-जुतों, टमाटर अंडे आदि की बरसात भी हुई थी और उन्हें पब्लिक की मार से बचाया गया था नही तो उसी वक्त उनकी लीला समाप्त हो जाती।

वाकया था सोहराबर्दीय को बचाने के लिए महात्मा गांधी का आमरण-अनशन। उन्होंनें सोहराबर्दीय के बारे में बताया कि सोहराबर्दीय आजादी से पूर्व अविभाजित बंगाल का मुख्यमंत्री हुआ करता था। जिसने पूरे कलकत्ता-हावड़ा शहर में डाइनामाईट लगा रखा था। उसका मकसद था भारत की आजादी (१५ अगस्त) का दिवस बेगुनाहों के खून से रंगकर उनके लाशों पर झंडा फहराने का। एक तरफ आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू झण्डा फहराए वहीं दूसरी तरफ कलकत्ता-हावड़ा के शहर डाइनामाईट के शोर से गूंज उठे। क्योंकि वो जिन्ना का समर्थक था। उसे यह सब देख रास नहीं आ रहा था। लेकिन उसके मनसूबो को पानी फेर दिया बंगाल के एक डॉक्टर मुखर्जी ने। जिन्होंने होटल के कैण्टीन में पर्दे के उस पार उनके काले कारनामों को सुना। मुखर्जी ने जब यह सुना तो उनके पैरो तले जमीन खिसक गया। वे बिना वक्त गवाए अपने घर पहुंचे अपने पत्नि के नाम एक खत में सारे वाक्यें को लिखकर वहा छोड़ दिया और बाहर चले गये जिनके पीछे सोहराबर्दीय के आत्मघाती दस्ते ने उन्हें जान से मार डाला। सुबह उनकी पत्नी को जब यह खत मिला तो उसने फौरन यह संदेश जवाहर लाल नेहरू तक पहुंचाया। जिसके बाद सोहराबर्दीय को गिरफ्तार कर उसके बिछाए गए सारे डाइनामाईट जब्त कर लिए गए। 

यहां तक तो ठीक था लेकिन जब जेल में बंद सोहराबर्दीय को छुड़ाने के लिए महात्मा गांधी ने नया सिगुफा छोड़ा और आमरण-अनशन पर बैठ गए। अंततः सोहराबर्दी को जवाहर लाल नेहरू ने गुरू-चेले की परम्परा निभाते हुए छोड़ दिया। फिर क्या था बंगाल के लोगों का सब्र का बांध टूट पड़ा उन्होंने गांधी पर पथराव, जूते-चप्पलों, अंडो और टमाटरों से उनका स्वागत करने लगे तो हालात बिगड़ता देख उन्हें वहां से बचाकर हटा लिया गया। गांधी की कारिस्तानी एक बार फिर तब देखी गई जब विभाजित  पाकिस्तान में दंगो के बाद ६५ करोड़ भारत द्वारा दिए जाने वाले रकम देने व न देने पर विचार चल रहा था तब गांधी ने ही एक बार फिर आमरण अनषन पर बैठकर सरकार को यह रकम देने पर विवश कर दिया था। पता नहीं गांधी का यह एक तरफ़ा प्रेम शायद ही किसी को समझ आए।

इलाहबाद के उस बूढ़े सज्जन ने कहा कि इतना ही नहीं गांधी और नेहरू (गुरू-शिष्य} के और भी कई सारे कारनामें तुम्हें जाननें हो तो किसी भी पुराणी pustakalay में जाकर 1 अगस्त से ३१ अगस्त १९४७ के तमाम अखबार को पढ़ो तो और भी सारे दबे राज तुम जान सकते हो।

जैसे राजनीति में भ्रष्टाचार की शुरुआत सी.बी.गुप्ता जो उत्तर प्रदेष के मुख्यमंत्री थे। उनके और जवाहर लाल नेहरू के साठ गांठ से इसका प्रारम्भ हुआ। फिर देर रात होने के कारण वह सोने को चले गये। उनके पास ठंड से बचने के लिए मात्र एक शॉल थी, तो मैंने उन्हें अपना कम्बल दे दिया और अंततः मध्य रात्री लगभग १२ बजे के वक्त वह सज्जन इलाहबाद स्टेशन पर उतर गये। 

इतना जानने के बाद मुझे एक बात जरूर समझ में आई है कि कांग्रेस की सत्ता और नेहरू परिवार में गांधी उपनाम के समनवय के कारण ही मुस्लिम तुष्टीकरण आज सातवें आसमान पर है। जिसके कारण ही अफजल जैसे खूंखार अपराधी (देषद्रोही- सोहराबर्दीय की भांति) को फांसी की जगह विशेष आतिथ्य जैसा सम्मान और २६/११ मुम्बई नरसंहार के कसाब के पीछे जनता की गाढ़ी कमाई उनपर लुटाया जा रहा है। जब इतिहास में इन दोनों गुरू-चेलों ने जनता का मजाक बनाया था तो भला आज इनके वंश में जिसमें दोनों के अंश मौजूद हों वो भला ऐसा कर भी रहे हो तो इसमें नया क्या है? इन्हें तो बस सत्ता चाहिए, वे मुस्लिम प्रधानमंत्री बनाने की बात तो करते है लेकिन इस बात का जिक्र कभी नहीं करते कि भारत की गुणात्मक बढ़ती जनसंख्या से समस्याएं (भूख, भ्रष्टाचार, प्रदुषण, पर्यावरण असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग, कांक्रीट की जंगलों का निर्माण, जंगलों एवं जीवों का सफाया, नस्लभेद, क्षेत्रवाद, आरक्षण की राजनीति, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, उग्रवाद, अमीर-गरीब में बढ़ता खाई, मंहगाई आदि।) जो पनप रही है, इसे रोकने के लिए मुस्लिम एवं हिन्दू समाज साथ मिलकर काम करें और जनसंख्या नियंत्रण पर धार्मिक भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र हित में आगे आये।

लेकिन दुख की बात है कि आज सच्चे स्वतंत्रता सेनानियों के जगह देष के हर चाक-चौराहो, मिनारों, पार्को उद्यानों से लेकर दफ्तरों, विशालकाय इमारतो, सरकारी मंजीलों, मार्गो के नाम ज्यादातर इन्हीं गुरू-शिष्यों और इनके वंशजो ने हथिया रखा है। और जिस तरह से देश के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के नामों को दबाने की साजिश चल रही है इससे तो एक कहावत जरूर कृतार्थ होती दिखाई दे रही है कि रामचंद्र कह गये सिया से ऐसा कलयुग आएगा " हंस चुगेगा दाना तुनका कौआ मोती खाएगा''।

photo : from google 

7 Comments

  • बहुत ही शानदार…..आश्चर्य की टिप्पणी करने वाला मैं पहला व्यक्ति हूं…..

  • आप जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं इसीलिए आपको ऐसे लेख शोभा नहीं देते. आपने इस लेख को बिलकुल इंडिया टीवी की तरह शुरू किया एक धमाकेदार शीर्षक जिसका न तो कोई ऐतिहासिक प्रमाण और न ही आपके द्वारा किया गया शोध सिवाय उस वृद्ध व्यक्ति के जो आपको सफर में मिला था. ऐसे शीर्षक देकर आप पाठकों को अपनी ओर तो खीच लेंगे जैसा इंडिया टीवी करता है परन्तु यह पत्रकारिता के लिए सही नहीं है. ऐसे विषयों पर लेख लिखने से पहले बहुत शोध की आवश्कता होती है. आपके साक्ष्य हैं रेल की यात्रा के दौरान एक व्यक्ति. आप ऐसे साक्ष्यों को लेकर हर सफर में अनेकों लेख लिख सकतें हैं.

    जनोक्ति का जो आदर्श वाक्य है उसे बनाये रखें. लेखकों कुछ भी लिख सकते हैं(कुछ भी का मतलब कुछ नहीं भी) पर आप जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं इसका ख्याल रखें. नहीं तो आप भी एक विचारधारा को प्रचारित करने का माध्यम बन जायेंगे. जनोक्ति सभी विचारधारों का मंच होना चाहिए जैसा की विभिन्न फूलों से सजा एक गुलदस्ता.

  • सुरेश चिपलूनकर

    “…कांग्रेस की सत्ता और नेहरू परिवार में गांधी उपनाम के समनवय के कारण ही मुस्लिम तुष्टीकरण आज सातवें आसमान पर है। जिसके कारण ही अफजल जैसे खूंखार अपराधी (देषद्रोही- सोहराबर्दीय की भांति) को फांसी की जगह विशेष आतिथ्य जैसा सम्मान और २६/११ मुम्बई नरसंहार के कसाब के पीछे जनता की गाढ़ी कमाई उनपर लुटाया जा रहा है। जब इतिहास में इन दोनों गुरू-चेलों ने जनता का मजाक बनाया था तो भला आज इनके वंश में जिसमें दोनों के अंश मौजूद हों वो भला ऐसा कर भी रहे हो तो इसमें नया क्या है?…”

    101% सहमत हूं…

  • अरे स्वर्ण सुमन जी १ अगस्त से ३१ अगस्त १९४७ का कोई समाचार पढ़े की ‘ पादुका पुराण ‘ से ही संतुष्ट हैं .अनर्गल कहने के पहले थोडा पढ़ भी लीजिये तो अनर्गल लिखने से बच जायेंगे .

  • सही कहा है आपने, गांधी दास (गाँधी परिवार के दास) कुछ अच्छा करने की नहीं सोचते वो तो बस अपनी मुस्लिम तुस्टीकरण, भ्रस्टाचार, वंशवाद …. की परम्परा को ही निभाने में व्यस्त हैं |

  • १३ जनवरी १९४८ को पटेल की पहल पर कबिनेट ने पाक को ५५ करोड़ की देन दारी रोक लेने का निर्णय लिया क्योंकि पाक ने हमारे कश्मीर के बड़े भू भाग पर हमला कर कब्ज़ा कर लिया था. मगर गाँधी के हठ और आमरण अनशन की धाम्की के कारन
    कबिनेट को अपना फैसला बदलना पड़ा – गाँधी के इस पाक प्रेम से आहात गोडसे ने उसी दिन गाँधी ‘-वध ‘का निर्णय लिया. ५५ करोड़ बहुत बड़ी रकम थी ,उस वक्त भारत का कुल रक्षा बज़ट ९३ करोड़ था ! जिससे पाक की कंगाल अर्थ स्थिति में नई जान पड़ गई. गाँधी के इस कुकृत्य की सजा आज भी हम भुक्त रहे हैं. कश्मीर भी गवाया और ‘बनाना’ स्टेट का कलंक लगा सो अलग.
    पाक से उजड़ कर आए लाखों हिन्दुओं के रिसते ज़ख्मों पर गाँधी के इस कृत्य ने नमक का काम किया . गोडसे नहीं तो उसे कोई और मार देता !……..उतिष्ठकौन्तेय

  • Dear All,
    Thanks for read this mesage………………………..

    Aaj hame ek or “Bade GHOTALE” ki BUUUUUUUU Aa Rahi hai…….

    “kerosin or LPG” gas per sabsidi khatam karke ……….

    Govt. BPL pariwalo ko CASH paisa Degi…………..

    Ab sochne wali Bat ye hai ki kitne BPL pariwar aise hai jinka Bank me A/C hai…………..

    to socho unka paisa kaha jayega……………

    Direct netao ki jholi me…….

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