Author: नरेन्द्र निर्मल
नरेन्द्र निर्मल , जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं . निर्मल मूलतः बोकारो (झारखण्ड) के निवासी है और वर्त्तमान में दिल्ली में पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. गत पांच वर्षो से विभिन्न सामाजिक और काव्य मंचो पर उपस्थित रहे. निर्मल जी कवि और समाजसेवक के रूप में भी जाने जाते हैं. “वाई एम् सी ए ” से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद ‘ जन आवाज’ निर्माण संवाद ‘ जिन्दा लोग’ आदि पत्रिकाओं के साथ -साथ जयप्रकाश अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान से भी जुड़े रहे हैं .
बहुत ही शानदार…..आश्चर्य की टिप्पणी करने वाला मैं पहला व्यक्ति हूं…..
आप जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं इसीलिए आपको ऐसे लेख शोभा नहीं देते. आपने इस लेख को बिलकुल इंडिया टीवी की तरह शुरू किया एक धमाकेदार शीर्षक जिसका न तो कोई ऐतिहासिक प्रमाण और न ही आपके द्वारा किया गया शोध सिवाय उस वृद्ध व्यक्ति के जो आपको सफर में मिला था. ऐसे शीर्षक देकर आप पाठकों को अपनी ओर तो खीच लेंगे जैसा इंडिया टीवी करता है परन्तु यह पत्रकारिता के लिए सही नहीं है. ऐसे विषयों पर लेख लिखने से पहले बहुत शोध की आवश्कता होती है. आपके साक्ष्य हैं रेल की यात्रा के दौरान एक व्यक्ति. आप ऐसे साक्ष्यों को लेकर हर सफर में अनेकों लेख लिख सकतें हैं.
जनोक्ति का जो आदर्श वाक्य है उसे बनाये रखें. लेखकों कुछ भी लिख सकते हैं(कुछ भी का मतलब कुछ नहीं भी) पर आप जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं इसका ख्याल रखें. नहीं तो आप भी एक विचारधारा को प्रचारित करने का माध्यम बन जायेंगे. जनोक्ति सभी विचारधारों का मंच होना चाहिए जैसा की विभिन्न फूलों से सजा एक गुलदस्ता.
“…कांग्रेस की सत्ता और नेहरू परिवार में गांधी उपनाम के समनवय के कारण ही मुस्लिम तुष्टीकरण आज सातवें आसमान पर है। जिसके कारण ही अफजल जैसे खूंखार अपराधी (देषद्रोही- सोहराबर्दीय की भांति) को फांसी की जगह विशेष आतिथ्य जैसा सम्मान और २६/११ मुम्बई नरसंहार के कसाब के पीछे जनता की गाढ़ी कमाई उनपर लुटाया जा रहा है। जब इतिहास में इन दोनों गुरू-चेलों ने जनता का मजाक बनाया था तो भला आज इनके वंश में जिसमें दोनों के अंश मौजूद हों वो भला ऐसा कर भी रहे हो तो इसमें नया क्या है?…”
101% सहमत हूं…
अरे स्वर्ण सुमन जी १ अगस्त से ३१ अगस्त १९४७ का कोई समाचार पढ़े की ‘ पादुका पुराण ‘ से ही संतुष्ट हैं .अनर्गल कहने के पहले थोडा पढ़ भी लीजिये तो अनर्गल लिखने से बच जायेंगे .
सही कहा है आपने, गांधी दास (गाँधी परिवार के दास) कुछ अच्छा करने की नहीं सोचते वो तो बस अपनी मुस्लिम तुस्टीकरण, भ्रस्टाचार, वंशवाद …. की परम्परा को ही निभाने में व्यस्त हैं |
१३ जनवरी १९४८ को पटेल की पहल पर कबिनेट ने पाक को ५५ करोड़ की देन दारी रोक लेने का निर्णय लिया क्योंकि पाक ने हमारे कश्मीर के बड़े भू भाग पर हमला कर कब्ज़ा कर लिया था. मगर गाँधी के हठ और आमरण अनशन की धाम्की के कारन
कबिनेट को अपना फैसला बदलना पड़ा – गाँधी के इस पाक प्रेम से आहात गोडसे ने उसी दिन गाँधी ‘-वध ‘का निर्णय लिया. ५५ करोड़ बहुत बड़ी रकम थी ,उस वक्त भारत का कुल रक्षा बज़ट ९३ करोड़ था ! जिससे पाक की कंगाल अर्थ स्थिति में नई जान पड़ गई. गाँधी के इस कुकृत्य की सजा आज भी हम भुक्त रहे हैं. कश्मीर भी गवाया और ‘बनाना’ स्टेट का कलंक लगा सो अलग.
पाक से उजड़ कर आए लाखों हिन्दुओं के रिसते ज़ख्मों पर गाँधी के इस कृत्य ने नमक का काम किया . गोडसे नहीं तो उसे कोई और मार देता !……..उतिष्ठकौन्तेय
Dear All,
Thanks for read this mesage………………………..
Aaj hame ek or “Bade GHOTALE” ki BUUUUUUUU Aa Rahi hai…….
“kerosin or LPG” gas per sabsidi khatam karke ……….
Govt. BPL pariwalo ko CASH paisa Degi…………..
Ab sochne wali Bat ye hai ki kitne BPL pariwar aise hai jinka Bank me A/C hai…………..
to socho unka paisa kaha jayega……………
Direct netao ki jholi me…….