36. तीव्र एवं सस्ती न्यायिक प्रक्रिया
36.1 राष्ट्रपति महोदय के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले विधायिका प्रमुख (प्रधामंत्री), न्यायपालिका प्रमुख (सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और कार्यपालिका प्रमुख (मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्यपालिका प्रमुख का दर्जा दिया जाएगा) की सहमती अनिवार्य होगी; इसी प्रकार, इन तीनों प्रमुखों के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले राष्ट्रपति महोदय की अनुमति अनिवार्य होगी- बाकी इस देश में किसी के भी खिलाफ अभियोग लाने/मुकदमा शुरू करने से पहले किसी से भी किसी भी किस्म की अनुमति या सहमती लेने की जरुरत नही रहेगी।
36.2 किसी भी व्यक्ति को उसके जीवनकाल में अधिकतम तीन बार जमानत दी जा सकेगी।
36.3 ‘अग्रिम’ जमानत की प्रथा समाप्त की जायेगी।
36.4 न्यायाधीशों के पास ‘फर्जी’ मुकदमों तथा (मुकदमों को लटकाने के उद्देश्य से उठाये जाने वाले) ‘गौण’ मुद्दों को खारिज करने का ‘विवेकाधिकार’ होगा।
36.5 किसी भी मुक़दमे में सिर्फ़ यह देखा जायेगा कि ‘अभियुक्त दोषी है या नही’, अन्यान्य मुद्दों पर अदालत का समय नष्ट नही किया जाएगा।
36.6 जिला न्यायालय के समान प्रखण्ड स्तर पर प्रखण्ड न्यायालय स्थापित किए जायेंगे- दोनों का स्तर बराबर होगा और दोनों ही उच्च न्यायालय के अधीन होंगे।
36.7 विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और सेना के अन्दरूनी मामलों की सुनवाई के लिए अलग से ‘राजकीय अदालत’ का गठन किया जाएगा, जिसमे इन चारों के लिए अलग-अलग प्रकोष्ठ होंगे।
36.8 सभी अदालतें 90 दिनों के अन्दर किसी एक मामले को निपटायेगी; जिन मामलों में ऐसा सम्भव नही होगा, उन्हें अन्तरिम फैसले, सुझाव या सिफारिश के साथ 91 वें दिन उच्चतर अदालत में स्थानान्तरित कर दिया जायेगा।
36.9 कोई भी उच्चतर अदालत- सर्वोच्च न्यायालय भी- अपने अधीनस्थ अदालतों में चल रहे मामलों में 90 दिनों तक दखल नही दे सकेगी।
36.10 दो साल से अधिक पुराने मामलों को निपटाने के लिए 5-5 न्यायाधीशों की ‘न्यायिक पंचायतों’ का गठन किया जाएगा, जिसमे मामले के ‘सभी पक्षों’ से ‘सीधी बातचीत’ के बाद ‘सामान्य विवेक’ से निर्णय लिए जायेंगे। (न्यायिक पंचायतों के लिए अवकाशप्राप्त न्यायाधीशों की भी मदद ली जायेगी। )
36.11 कुछ गम्भीर किस्म के मामलों- जैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, मादक द्रव्य व्यापार, पर्यावरण इत्यादि के लिए कोर्ट-मार्शल- सरीखी एक संक्षिप्त अदालती प्रक्रिया विकसित की जायेगी।
36.12 सम्मनों की अवहेलना, (मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए) बयान से मुकरना और फरारी को दण्डनीय अपराध बनाया जाएगा।
36.13 जनता (मुवक्किल) से फीस न लेने वाले और इस आशय का शपथपत्र दाखिल करने वाले वकीलों को सरकारी वेतन दिया जाएगा- वकीलों के इस वेतनमान में ‘ग्रेड’ का निर्धारण लड़े गए और जीते गए मुकदमों की संख्या के आधार पर किया जाएगा। (वकील जब चाहे, सरकारी वेतन छोड़कर फीस लेना शुरू कर सकेंगे।)

