15. प्रखण्ड स्तर पर नागरिक स्वशासन
15.1
हर दूसरे महीने प्रखण्ड न्यायाधीशों की अध्यक्षता में सप्ताह भर का ‘प्रखण्ड जनसंसद’ का अधिवेशन बुलाया जायेगा, जिसमें प्रखण्ड के जागरुक आम नागरिक, सभी सरकारी अधिकारी तथा सभी पंचायतों के पंच भाग लेंगे. (प्रखण्ड स्तर पर न्यायालय स्थापित करने का जिक्र न्याय व्यवस्था के अन्तर्गत है.)
15.2 चूँकि महानगरों तथा नगरों को क्रमशः जिला तथा प्रखण्ड के समतुल्य माना गया है, (क्रमांक 14.4), अतः नगरों में एक ‘नगर जनसंसद’ तथा महानगरों में कुल नौ ‘उपमहानगर जनसंसद’ होंगे. (जाहिर है, यहाँ जागरुक नागरिक, सभी सरकारी अधिकारी, सभी सभासद एवं पार्षद भाग लेंगे.)
15.3 इन जनसंसदों में अधिकारी तथा जनप्रतिनिधिगण अपने पिछले कार्यों तथा खर्चों के ब्यौरे पेश करेंगे और अगले कार्यों तथा खर्चों के लिये इस संसद द्वारा पारित प्रस्तावों से दिशा-निर्देश प्राप्त करेंगे.
15.4 नागरिकों द्वारा उठाये गये सवालों/शिकायतों का जवाब भी यहाँ सम्बन्धित अधिकारी/प्रतिनिधि देंगे और इस दौरान किसी भी सूचना को गोपनीयता के नाम पर नहीं छुपाया जायेगा.
15.5 अधिवेशन के अध्यक्ष, यानि प्रखण्ड न्यायाधीशों को इतना (विवेक) अधिकार प्राप्त होगा कि जनसंसद के अधिवेशन को गम्भीरता से न लेने वाले तथा आम जनता की जरुरतों को पूरा करने में लापरवाह अधिकारी/प्रतिनिधि को वे छह महीनों तक के लिये निलम्बित कर सकेंगे.
15.6 कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि प्रखण्ड/नगर/महानगर के सर्वांगीण विकास के लिये स्थानीय नागरिक स्वयं योजनाएँ बनायेंगे, कार्यपालिका/ग्राम पंचायत/नगर परिषद/महानगर परिषद के माध्यम से उन्हें लागू करवायेंगे और यह सब कुछ न्यायपालिका के संरक्षण में होगा.
15.7 राष्ट्रीय सरकार सभी प्रखण्डों को बराबर-बराबर विकास धनराशि मुहैया करायेगी, जबकि राज्य सरकारें जनसंसदों द्वारा पारित विकास योजनाओं के आधार पर धन मुहैया करवायेगी. (इन प्रस्तावों को स्थानीय विधायक राज्य सरकार के समक्ष पेश करेंगे.)
जनसंसद के किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को स्थानीय सांसद राष्ट्रीय संसद में भी प्रस्तुत कर सकेंगे.

