अंबेडकरवाद का चोगा ओढे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहन मायावती राजधानी लखनफ के आसपास लगी मूर्तियों का अनावरण करने में लगी है। अंबेडकर सिंद्धांत के मायने आज बसपा से कोसों दूर दिखाई दे रहे हैं। प्रदेश में मूर्तियों की बात करें तो इन मूर्तियों में अम्बेडकर ने बाजी मारी है । कारण समाज के एक बड़े तबके ने उनके राजनीतिक फलसफे को माना और अपनाया। चेहरे पर गोल चश्मा, बाएं हाथ में संविधान की किताब और दाएं हाथ की तर्जनी का इशारा देश की संसद की ओर। हिंदुस्तान की सबसे बड़ी आबादी वाला प्रदेश उ.प्र. में सत्ता का केंद्र भी दलित है और कमान भी दलित नेता मायावती के हाथ। विशुद्ध अंबेडकरवाद राजनीति विरासत का चोंगा ओढ़े मुख्यमंत्री मायावती ने अपने राजनीतिक गुरू काशीराम और अंबेडकर के साथ अपनी भी मूर्ति खड़ कर दी। इतना ही नहीं हाथी भी सूंड उठाए प्रदेश की जनता की सहनशीलता की परीक्षा ले रहा है; अपनी आत्ममुग्धा में वे इस कदर चूर हैं कि उन्हें न तो प्रदेश के दलित गरीबों की कोई चिंता है और न ही विकास योजनाओं की। जो कुछ हो रहा है सब मूर्तियों के आसपास हो रहा है।ऐसा नहीं कि बहन जी ही अपनी मूर्तियां लगवाकर आत्मामुग्ध हैं। इससे पहले भी कई नेता अपने हठधर्मिता के चलते आत्मामुग्ध हुए लेकिन उनका हश्र क्या हुआ? तीस साल तक निर्बाध रूप से काबिज रहने वाली सीपीएम अपने काम से इतनी आत्मुग्ध हुई कि वह सिंगूर और नंदीग्राम के लोगों का गुस्सा नहीं भाप पाई। पिछले लोकसभा चुनाव मंे जनता से लेफ्ट को राइट कर दिया। आरएसएस हिन्दुत्व की परिभाषा रटने में चूर बीजेपी इतनी आत्ममुग्ध हुई कि उसका सत्ता में लौटना एक सपना बनकर ही रह गया। कुछ ऐसा ही बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ हुआ। दिल्ली की कुर्सी का ख्वाब देख सत्ताई दंभ की आत्मुग्धता से इतनी आत्मसात हुई कि खाटी दलित अंबेडकरवादी नेताओं को भी उन्होंने चुनाव में दर किनार कर दिया। जिसका परिणाम किसी से छिपा नहीं है। दिल्ली पहुंचने की हसरत धरी रह गई और कोशिश परवान नहीं चढ़ पाई।
कुछ दिन पूर्व अपने कार्यालय के पास चाय की दुकान पर चाय पकाती एक महिला से जब पूछा कि अम्मा पता है? प्रदेश में मायावती की सरकार है। उसका कुछ लाभ क्यों नहीं उठाती? बुजुर्ग महिला का कहना था कि भैया उन्हें अपनी मूर्ति लगवाने से फुर्सत कहां; गरीबों की रोटी और हमारे विकास से उसे कोई मतलब नहीं। गरीब को सुबह उठते ही अपनी रोटी की चिंता होती है ना कि मायावती की मूर्ति देखने की। बुजुर्ग महिला का कहना शीशे की तरह साफ था कि जीने का जुगाड़ नहीं मूर्तियों पर चलने को चिन्ता क्यों करें। कहने का मतलब यह कि अंबेडकर के पदचिन्हों पर चलने वाली बसपा के प्रति एक बुजुर्ग महिला की सोच ऐसी है तो सोचिए पढ़ा-लिखा तबका क्या सोचता होगा? अंबेडकर हमेशा गरीबों के हितैशी रहे।
आज प्रदेश में लोगों को दस-दस घंटे बिजली नहीं मिलती, गांव में किसान सूखे टयूबवैल के पास बैठा रो रहा है। बुंदेलखं डमें सूखे से किसान दो जून की रोटी नहीं जुटा पाता और बदले में उसे दस रुपये के चेक के टुकड़े फेंके जाते हैं। छाती ठोक कर बाहुबलियों को चुनाव लड़वाया जाता है। जातीय हिंसा का खौफ सर पर मंडरा रहा है। प्रदेश से उद्योग धंधों का दूसरे राज्यों में पलायन हो रहा है। यह जितना आश्चर्यजनक है उतना आघातकारी भी। प्रदेश सीधा मतलब है कि प्रदेश में उद्योगों के विकास के लिए जबानी जमाखर्च के अतिरिक्त और कुछ नहीं किया जा रहा; राज्य सरकार उद्योगों के विकास के मामले में चाहे जैसा दावा क्यों न करंे, लेकिन यथार्थ यह है कि वर्तमान में उसकी उपलब्धियों के खाते में कुछ भी नजर नहीं आता। इस पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस समय उसकी एकमात्र प्राथमिकता पार्काें और स्मारकांे का निर्माण व उसमें मूर्ति स्थापना है।
आज सत्ता की मलाई वे लोग खा रहे हैं जो दलित की एबीसी तक नहीं जानते। जिन लोगों ने दलित राज का सपना देखा था सपना पूरा होने के बाद वे दूध से मक्खी की तरह निकालकर फंेक दिए गए; जिस सर्वसमाज के नारे के साथ प्रदेश की सत्ता पर माननीय बहन जी काबिज हुई। आज वही सर्वसमाज उनके एजेडे से गायब हो गया है । उन्होंने दलित समाज के बीच जिस तरहसे अपने आप को जोड़ा है वह उनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा होता है। बीती 16 मार्च की रैली में उन्होंने यह जताने की कोशिश की भी की उनके एजेंडे में न तो प्रदेश का विकास और और न ही सर्वजन है, उन्हें तो सिर्फ दलितों और पिछड़ों की राजनीति करनी है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है, अगर ऐसा करना है तो उन्हें अपने इन शुभचिंतकांे का ख्याल भी रखना पड़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं है।
पुलिसिया आंकड़ें बताते हैं कि बीते तीन वर्ष सर्वाधिक अत्याचार दलितों पर ही हुए हैं। गरीब दलित और गरीब होता जा रहा है, अमीर दलित अधिक अमीर। के पास सर छुपाने के लिए छप्पर नहीं लेकिन दलित की रहनुमा लाखों रुपये से बनली रुपये की माला पहनकर मंच से उन्हीं दलितों का अभिवादन स्वीकार कर रही हैं। पब्लिक को वर्ष 2012 के चुनाव का इंतजार है ज बवह मूर्तिकारों की ही तरह वोटों की शिल्पकारी करेगी। वैसे मायावती वोटरों की इस शिल्पकारी का नमूना लोकसभा चुनाव में देख चुकी हैं।
पिछड़ों की हिमतायत करने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने वित्तीय वर्ष 2008-09 में 1300 करोड़ रुपये ग्रामीण विकास, प्राइमरी हैल्थ सेंटर और प्राइमरी व सैकेंड्री स्कूल के लिए आवंटित किए। लेकिन 2000 करोड़ रुपये का बजट उन्होंने अपनी विशाल मूर्तियों के लिए पहले से अलग कर लिया। इस मूर्तियों के रख-रखाव में सालाना 250 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। सोलह सौ करोड़ की लागत से मुंबई में बांद्रा-वर्ली सी लिंक तैयार हो गया। समुद्र पर बने इस पुल सो मुंबई से मुंबई के लाखों लोगों को यातायात की सुविधा मुहैया हई। लेकिन मायावती की मूर्तियां क्या उनके और लोगों के बीच की दूरी पाट पाएंगी। बाबा साहेब अंबेडकर और काशीराम ने दलितों को सत्ता की कंजी हासिल करने की प्रेरणा दी। सत्ता का रास्ता बेजान मूर्तियों के जरिए होगा। इसकी तरफदारी उन्होंने कभी नहीं की । उन इंसानों की मूर्तियों की उम्र जरूर लंबी होती है जो अपने जीवनकाल में लोगों के दिलों पर राज करते हैं। किसी भी देश का राजनीतिक इतिहास और उसमें दर्ज नायकों की जिंदगी से रुबरु कराने में मूर्तियों का विशेष स्थान है। इतिहास के नायकों को अब उनकी मूर्तियों के जरिए ही याद रखा जाता है। लेकिन उन इतिहास के नायकों ने देश और समाज के लिए जो किया उसे भूला जा सकता है?
बिहार की स्थिति प्रदेश से ज्यादा बदत्तर थी। वर्ष 2004-05 में राज्य की जीडीपी दर 5.15 प्रतिशत थी। नीतिश के राज में जीडीपी दर बढ़ी और आज बिहार की जीडीपी दर 11.44 प्रतिशत है। यानि गुजरात के बाद देश में बिहार की जीडीपी सर्वाच्च है। कुछ ऐसा ही हाल दूसरे अन्य नए राज्यों उत्तराखंड 9.31 प्रतिशत, झारखंड 8.45 प्रतिशत है। इन राज्यों की यह जीडीपी वहां के मुख्यमंत्रियों की दूरगामी सोच और प्रदेश के विकास के प्रति लिए गए संकल्प का परिणाम है। न कि जगह-जगह मूर्तियां लगवाने का।

