जितना विरोध इस समय पूरे देश में कांग्रेस का है उसे देख कर लगता है अब ये समाप्त होने को है पर फिर भी इसके कार्यकर्ता सीना चौड़ा करके जिस प्रकार से बाजारों में, अपने प्रदर्शनों में निकलते हैं तो मन में ये सवाल उठता है कि ये कितने बेशर्म हैं जो पिछले एक सौ पच्चीस वर्षों के कांग्रेस इतिहास और वर्तमान का अंधेर देख कर भी आम जनता के सामने बेहिचक निकल रहे हैं |
कारण ! एक तो वोटिंग मशीनों में घपला, दूसरा; उसके ऐसे वोटर जो परंपरागत हैं जिनके दादा ने उसीको वोट दिया पिता ने दिया लड़के ने दिया और अब पोता भी देगा इन वोटरों में जो बिलकुल दीनदुनिया से अनजान हैं कीड़े की जिंदगी जी रहे हैं जिनके लिए शराब और एकाध महीने का राशन ही जिंदगी है उन्हें तो कुछ कहा नहीं जा सकता; पर जो अच्छे पढ़े लिखे हैं और सारी परिस्थतियों से रूबरू हैं फिर भी कांग्रेस को ही सही समझ रहे हैं और उनके कार्यक्रमों में बेशर्मी शामिल हो रहे हैं, उन्हें क्या कहें ? और साथियों बड़ा दुःख तो नहीं;आश्चर्य होता है जब हम उनमे उन युवाओं को देखते हैं जो अपने को पढ़ा लिखा मानते हैं; आखिर उनकी क्या सोच है ? कांग्रेस में कौन सी अच्छाई है जिसे वो सही समझते हैं लेकिन क्या कहें ?
पर नहीं कुछ तो कह ही सकते हैं इसलिए कह रहा हूँ —
वो; वंशानुगत वोटर हैं, उन्हें देश और समाज से क्या मतलब,
बेशर्म होकर जीते हैं; उन्हें संस्क्रृति-संस्कार से क्या मतलब,
उनकी पीढियां गुजर गयीं ,चरित्रहीनों का गुणगान करते;
कितने ही हों प्रमाण प्रत्यक्ष, उन्हें प्रमाण से क्या मतलब ||
उनके दादा ने वोट दिया, स्वतंत्रता सेनानी बन गये,
उनके पिताजी ने वोट दिया, पार्टी के सेनानी बन गए,
स्वयं वोट देते हैं, कि खाने-पीने* को मुफ्त मिल जाती है;
उनके बच्चे वोट देंगे उन्हें ही ;क्योंकि कुसंस्कारी बन गए ||
इस देश का बुरा वक्त; कि बुरों के भाग (भाग्य) बढ़ गए ,
कलियुग(कांग्रेस) का असर;कि असुरों के भाग(हिस्से) चढ़ गए,
रोता है मनुष्य तब ही, जब फटती है बिवाई अपनी;
फिर भी नहीं समझे कुछ,तो; स्वयं और देश से धोखा कर गए ||
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