दक्षिणावर्त|2010/02/19 12:46 am

किसका धर्म महान ?

हम लोग अक्सर देखते है कि पैगम्बरों और मसीहाओं द्वारा प्रचारित धर्मों में कितनी अधिक भिन्नता दिखाई पडती है !  जीवन-मृ्त्यु,लोक परलोक, समाज या सृ्ष्टि सम्बंधित उनकी विचारधाराओं में इतना अधिक मतभेद क्यूं हैं । जो अपने को ईश्वर का दूत कहते हैं ओर जिनकों इस बात का विश्वास है कि वो जो कुछ प्रचारित रहे हैं, वह प्रभु की प्रेरणा से हो रहा है—तो फिर उनमें विचारैक्य क्यूँ नहीं ? । एक ईश्वर का दूत ऎसी बातें कहकर दुनिया से विदा ले लेता है तो दूसरा दूत कुछ दूसरी ही बातों का प्रचार करके । सत्य अनेक नहीं हो सकते । वह तो सदैव एक ही रहेगा । विभिन्न रूपों में उसकी अनुभूति अवश्य होती है,ओर वह किसी न किसी रूप में हो ही रही है ।
तो हम देखते हैं कि न तो कोई वैज्ञानिक,न दार्शनिक ओर न ही कोई पैगम्बर,मसीहा इत्यादि ही जीवन के सत्य को उजागर कर पाता हैं ।  मेरी दृ्ष्टि में तो पैगम्बर,मसीहाओं नें तो भ्रमपूर्ण ज्ञान के प्रचार के साथ साथ ओर भी बहुत सारी गलतियाँ की हैं । सामाजिक अशान्ती को दूर करके मानवी समाज को सुखी एवं समृ्द्ध करने के लिए उन लोगों नें जिन उपदेशों का प्रचार किया,उनका क्या परिणाम निकला ?  अहिंसा का पालन करो,सत्य बोलो, सब पर दया करो—- इन उपदेशों नें सब धर्मों की भित्ति का काम किया है । मैं नहीं समझता कि दुनिया के किसी भी पैगम्बर नें  समाज को क्रूरता का पाठ पढाया होगा । एक इन्सान होकर दूसरे इन्सान से प्रेम करना,दूसरे के धर्म,परम्पराओं,धर्मग्रन्थों का सम्मान करना, दूसरे में कमियाँ ढूँढने की अपेक्षा अपनी कमियों को जानकर उन्हे दूर करने का प्रयास करना जैसी शिक्षाएँ प्राय: सब नें दी हैं । किन्तु कितने आश्चर्य की बात है कि उनके अनुयायियों की संख्या अत्यधिक होते हुए भी इस ग्रह का कोई भी भाग ऎसा नहीं है,जहाँ कि आज के समय में क्रूरता का नग्न प्रदर्शन न हो रहा हो —जहाँ पीडितों का करूण क्रन्दन न सुनाई देता हो—जहाँ का वातावरण मिथ्या भाषण से कुत्सित न बनाया जाता हो ।

जीसस क्राईस्ट ने कहा था कि “धनी व्यक्ति के लिए स्वर्ग प्रवेश उतना ही असंभव है,जितना कि सूईं के छेद में से ऊँट का निकल जाना” लेकिन उनके कितने अनुयायियों नें इस उपदेश को कार्यरूप में परिणित किया । आज शायद दुनिया की आधी से अधिक सम्पति इन्ही के अनुयायियों के पास होगी । औरों की बात जाने दीजिए, स्वयं पोपों और विशपों नें धन इकट्ठा करने के जो उदाहरण दुनिया के सामने रखे हैं, वह क्रिश्चियन धर्म से अभिज्ञ किन्तु मानवी स्वभाव से अनभिज्ञ कोई व्यक्ति जान ले तो शायद उसकी आँखें हैरत से फट पडें ।

इन धर्म पंथों के अनुयायियों में न तो वैज्ञानिकों जैसी विश्लेषणात्मक मनोवृ्ति ही देखने को मिलती है ओर न ही स्पष्ट चिन्तन धारा । यहाँ सिर्फ विश्वास की प्रधानता हैं । लेकिन ये अगाध विश्वास, अजेय आस्था सिर्फ अपने पैगम्बर,मसीहों ओर उनके द्वारा विरचित धर्म ग्रन्थों पर ही है—-न कि उनकी शिक्षाओं, उनके सिद्धान्तों पर ।
मुस्लिम धर्म के अनुयायी पैगम्बर मोहम्मद की बुद्धि पर कभी संशय नहीं कर सकते । यह विचार भी उनके लिए अपवित्र है कि पैगम्बर का मस्तिष्क भी गलतियाँ कर सकता था ओर उनके द्वारा प्रचारित उपदेशों का आधार भी गलत हो सकता है । ईसाई धर्म को मानने वाले कभी जीसस की शक्तियों पर अविश्वास नहीं कर सकते, उन्होने जो कुछ भी कहा उसे वे सत्य ही मानेंगें चाहे आप तर्क द्वारा जितना  भी समझाने का प्रयत्न कर लें । वे अपनी बुद्धि पर अविश्वास कर सकते हैं किन्तु अपने जीसस पर नहीं । उनकी नजर में जीसस ही सबसे महान हैं,अन्य कोई भी नहीं । इसी प्रकार दुनिया के अन्य धर्मावलम्बी भी अपने अपने भगवानों,महापुरूषों,पैगम्बरों,मसीहों पर अपरिमित आस्था रखते हैं । बौद्ध धर्म का अनुयायी गौतम बुद्ध के सामने किसी को कुछ नहीं समझता । सिक्ख गुरू नानक देव या गुरू गोबिन्द सिँह जी को जितना महान समझते हैं,यह किसी नानकपंथी या निहंग सिक्ख से मिलने पर अच्छी तरह मालूम हो सकता है । कहने का तात्पर्य ये है कि चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों उनकी स्वधर्म के प्रति तार्किकता समाप्त हो जाती है, वहाँ सिर्फ अजेय आस्था और विश्वास ही काम करता है । लेकिन ये विश्वास की प्रधानता भी उन लोगों के लिए ही है जो कि किसी न किसी रूप में स्वधर्म का पालन कर रहे हैं, उनके लिए नहीं जो कि धार्मिकता एवं सर्वज्ञाता होने का ढोंग करते हुए, धर्म की आड लेकर किन्ही मूर्खतापूर्ण स्वार्थ सिद्धि के प्रयासों में लगे हुए हैं ।

आज के युग में धर्म तभी सार्थक माना जा सकता है जब कि वह सांसारिक जीवन में हमारा मार्ग प्रशस्त करे । केवल मरने के बाद जन्नत का सुख मिलने मात्र की आशा से उसे कोई नहीं पूछने वाला । देखा जाए तो जीवन पर प्रभाव उसी वस्तु का हो सकता है जो पूरे जीवन का अंग हो,जो जीवन की प्रत्येक क्रिया को प्रभावित करे….न कि उस वस्तु का जो कि स्थान और समय विशेष के लिए अपनी सुविधा अनुसार धारण कर ली जाए । इसके अतिरिक्त जीवन का अंग भी वह तभी बन सकती है जब वह वास्तविकता की,वर्तमान परिस्थितियों की अपेक्षा रखे । ऎसा सिर्फ तभी संभव हो सकता है जब कि उसका संबंध वर्तमान जीवन अनुभवों से हो ।

धर्म का आधार कुछ ओर नहीं, मनुष्य जीवन का अनुभव ही है, न कि किसी महापुरूष/संत की परोक्ष वाणी या किसी पीर पैगम्बर के मन की गढी हुई कल्पनाएँ,उनकी आज्ञाएँ । धर्म कुछ ओर नहीं बल्कि विशुद्ध मनोविज्ञान का विषय है,जिसके लिए किसी अन्य बाह्यतत्व से किसी मार्गदर्शन की अपेक्षा रखना ही व्यर्थ है । इसमें अगर आपका कोई मार्गदर्शक हो सकता है, तो, वो है—– सिर्फ आपका अन्तर्मन ।

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