दर्शन|2011/12/07 12:13 am

संस्कारित जीवन

सुसंस्कारों को व्यवहार में लाना मानवता का पर्याय है , जिसे हम जिस स्तर पर जितनी अधिक मात्रा  में विकसित कर सकें तो उतने ही अनुपात में हम देवत्व की ओर बढ़ सकेंगे | जब हम इस दिशा में विकसित होंगे तभी हमारा राष्ट्र भी विकसित होगा | जो बातें अब से हजारों साल पहले चलन में थीं , लोगों के आचरण में थी , यह सब सामान्य बातें हुआ करती थीं , वे अब असाधारण व असामान्य हो गयी हैं | इसका कारण यह है की हम इनसे दूर होते चले गए | अब भी कुछ नहीं बिगड़ा , यदि हम अब भी जाग  जाएँ तो निश्चय ही हमारा भविष्य सुनहरा होगा | वातावरण का प्रभाव हमारे कदम गलत रास्ते पर चले जाते हैं | अच्छे लोगों के साथ रहने पर अच्छे विचारों का जन्म हमारे मष्तिष्क पर होगा और गलत लोगों के साथ रहने पर गलत विचारों का निर्माण होगा , जो हमारे आचरण को प्रभावित करेगा | अगर हमारा धैर्य और संयम सुदृढ़ है तो सफलता हमारे निकट होगी |हम अपनी संचित उर्जा रचनात्मक कार्यों में लगाएं , जिससे हम स्वयं के कल्याण के साथ-साथ परिवार और समाज का भी कल्याण कर सकें |

नकरात्मक विचार हमारी प्रगति को सदैव कमजोर करते रहते हैं | इनसे बचना ही हितकर होगा | धैर्य और संयम की जरुरत हमें अधिकतर नकारात्मक विचारों के ही परिणामस्वरूप  पड़ती है , जिनसे बचा जा सकता है | जब हम अच्छा सोचेंगे तो अच्छा करेंगे भी | खुशहाल जीवन के लिए सुसंस्कारित होना अति आवश्यक है | जब हम अपने जीवन में सही गलत का भेद समझने की सामर्थ्य अर्जित कर लेंगे , तभी हमें अपने वास्तविक जीवन का बोध होगा और जीवन को सही दिशा एवं गति मिलेगी | संस्कारों से हमारा जीवन परिष्कृत एवं परिमार्जित होता है | कठिन समय में संस्कारों की शक्ति ही काम आती है | निकटता , आत्मीयता , अपनत्व जैसे सदगुण संस्कारों से ही पोषित होते हैं , जिनकी आज समाज को जरुरत है | संस्कारों की प्रथम पाठशाला हमारा परिवार ही होता है | संस्कार विहीन जीवन का कोई अर्थ  नहीं | मानव जीवन के उज्जवल भविष्य की आधारशिला संस्कारों पर ही रखी है |

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