आज के युग में भारतीय मेधा के प्रथम प्रदर्शन ‘वेद’ विद्या के प्रसार प्रचार की बहुत ही आवश्यकता है । वेदों के विषयों में पाश्चात्य व प्रार्च्य कतिपय विद्वानों द्वारा इतने भ्रामक तथ्य फैला दिये गये हैं कि समाज में वेदों के सम्यक प्रचार की पुन: आवश्यकता प्रतीत होती है, ये वेद प्राचीनकाल से आज तक के आविष्कारों व खोजों की सूची हैं । यदि हम ठीक से इन्हे पढें तो ये देखेंगे कि विश्व का सर्वप्रथम आविष्कार कब और कहाँ हुआ था ।
वेदों में वैज्ञानिक तथ्यों की भरमार है । मेरे स्वयं के अध्ययन से मैने ये पाया कि वस्तुत: वेद हमारे आस पास की वस्तुओं में ही निमीलित वैज्ञानिक तथ्यों का ही अध्ययन है ।
वेदों के मन्त्र बडे ही सांकेतिक है जिनमें ऐसी ऐसी बातों का वर्णन है जिसे आज का विज्ञान अब ढूढ पाया है । इन्ही सूक्ष्म वैज्ञानिक तथ्यों का खुलासा करने हेतु ही वेदों में विज्ञान की यह श्रृंखला प्रारम्भ की जा रही है । आज सर्वप्रथम ऋग्वेद के प्रथम सूक्त के प्रथम मन्त्र का वर्णन करता हूँ , जिसमें विश्व की सर्वप्रथम और महानतम खोज हुई थी ।।
संकेत – ॐ अग्निमीले पुरोहितं…………………………………. रत्नधातमम् ।। (ऋग्वेद-1/1/1)
अर्थ – हम अग्निदेव की स्तुति करते हैं जो यज्ञ के पुरोहित, देवता, ऋत्विज, होता और याजकों को रत्नों से विभूषित करने वाले हैं ।।
विशेष – अग्नि विश्व की सर्वप्रथम खोज है , ये विश्व की सबसे महानतम खोज कही जा सकती है । इस मन्त्र में अग्नि की महत्ता का वर्णन है । ऋग्वेद का प्रथम मन्त्र किसी विशिष्ट देव को ही समर्पित किया जाना चाहिये । विशिष्ट में भी देवराज इन्द्र प्रधान हैं किन्तु फिर भी प्रथम मन्त्र उनको समर्पित नहीं किया गया । देवगुरू वृहस्पति तो इन्द्र के भी मार्गदर्शनकर्ता हैं पर प्रथम मन्त्र उनको भी समर्पित न होकर अग्नि को समर्पित किया गया इससे यह पता चलता है कि वैदिक काल में ही अग्नि की महत्ता का पता चल गया था । अग्नि याजकादि को समृद्धि प्रदान करने वाले हैं इससे भी अग्नि की महत्ता की ओर संकेत किया गया है । आगे के मन्त्रों में अग्नि की उत्पत्ति का भी वर्णन दिया गया है और अग्नि का विशेष महत्व भी बताया गया है । जो क्रमश: प्रस्तुत किया जायेगा ।


बहुत सुंदर समीक्षा.