उस दिन नए थिंकर पढ़ाए जाने वाले थे, जर्मी बैंथम। पहले दिन तो विद्यार्थियों की उपस्थिति ठीक ही रहती है। उस दिन भी अच्छी भीड़ थी। बैंथम का प्रारंभिक परिचय पूरा होने के बाद, हमारे प्रोफेसर सबसे पहले विचारों की दुनिया को दिए गए उनके सबसे बहुमूल्य योगदान यूटीलिटेरियनिज्म पर पहुँच गए। बैंथम ने अपने सिद्धांत में कहा कि – मानव जीवन का मूल लक्ष्य सुख हासिल करना है और इसी आधार पर उन्होंने सरकारों का लक्ष्य – अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण – बताया, बैंथम ने अलग-अलग तरह के सुख और दुख बताए और ये भी बताया कि सुख को किस तरह मापा जा सकता है। वे अपने खास अंदाज में बोल रहे थे – जर्मी बैंथम ने उपयोगितावाद का विचार दिया… उन्होंने सुख को मापने की विधि बताई… अब बताइए भला, क्या सुख कोई बुखार है जिसे नापकर बताया जा सके कि भई आज तो 104 डिग्री सुख है? – और वे मुस्कुराए, लेकिन पूरी क्लास में ठहाकों की लहर चलने लगी थी। सही भी तो है, क्या वाकई सुख को मापा जा सकता है? बैंथम ने यह विचार 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में दिया था, लेकिन जिस समय हम उस पर हँस रहे थे तब तक पूरी दुनिया में उदारीकरण की आँधी पहुँच गई थी और चकाचौंध इतनी थी कि सच देखने के लिए आँखें खुल पाने का माहौल बन नहीं पा रहा था। ऐसे में सुख का एक ही मतलब था, समृद्धि….। फिर हम जैसे गरीब देशों के बाशिंदों की सुख की कल्पना समृद्धि से आगे पहुँच ही कैसे सकती थी? हम तो आज तक यही मानते आ रहे हैं कि पैसा हो तो सुख है…. तभी तो हमारी पूरी राष्ट्रीय चेतना आर्थिक विकास दर और जीडीपी पर अटकी पड़ी रहती है, देश में कहीं कोई दुर्घटना हो या फिर प्राकृतिक आपदा, हमारा ध्यान उससे उबरने से ज्यादा इस बात पर होता है कि इससे आर्थिक विकास दर कितनी गिरेगी? हाँलाकि हमारे पूर्वज कहते रहे कि सुख का संबंध पैसे से नहीं है, लेकिन जहाँ पेट भरना एक सवाल औऱ इलाज करवाना, कपड़े बनवाना और साफ हवादार घर एक सपना हो, वहाँ हम कैसे मान सकते हैं कि सुख और समृद्धि दोनों अलग-अलग हो सकते हैं? तो हमने और हमारे साथ शेष वंचित दुनिया ने भी यही माना कि जहाँ समृद्धि है, वहीं सुख है। हम तो आज भी यही मान रहे हैं, लेकिन जहाँ समृद्धि के स्तर के छू लिए जाने के बाद बढ़ती संपन्नता ने सुख के स्तर में बढ़ोतरी नहीं की तो फिर सवाल उठा कि – आखिर सुख क्या है? और कहाँ है? और इसे कैसे हासिल किया जा सकता है? हमारे लिए शायद ये अभी नया हो, लेकिन ये हकीकत है कि दुनिया में कुछ अर्थशास्त्री और कुछ देशों की सरकारें भी अब सुख के अर्थशास्त्र पर काम कर रही हैं। हाँ, ये उन देशों की बात हो रही है, जहाँ सुख ने समृद्धि से अलग हो जाने का रूझान दिखाया है।
यूँ समृद्धि और सुख के बीच के रिश्ते पर सबसे पहले सवाल 1974 में अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड इस्टरलिन ने अपने रिसर्च पेपर ‘डज इकनॉमिक ग्रोथ इम्प्रूव ह्युमन लॉट?’ में उठाया था। अर्थशास्त्र की दुनिया में इसे ‘इस्टरलिन पेराडॉक्स’ के नाम से जाना जाता है। इस्टरलिन ने इसके माध्यम से बताया कि जब एक बार इंसान की बुनियादी आवश्यकताएँ (जैसे खाना, घर और सामाजिक स्थिरता आदि) पूरी हो गई तो फिर उसके बाद उसकी तनख्वाह में बढ़ोतरी उसकी खुशी के स्तर में वृद्धि नहीं करती है। ब्रिटिश अर्थशास्त्री ने भी बाकायदा सर्वे कर इस बात की पुष्टि की थी।
अकादमिक स्तर पर इस्टरलिन के पेपर पर लगातार काम चलता रहा, लेकिन हकीकत में जहाँ इस विषय पर सोचा और काम किया जाना था वहाँ कोई हलचल नहीं थी। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में इस विषय पर राजनीतिक, आर्थिक ओर मनोवैज्ञानिक स्तर पर विचार मंथन शुरु हुआ। 1999 में टोनी ब्लेयर ने बेहतर गुणवत्तात्मक जीवन पर लिखा। इसमें उन्होंने कहा कि – ‘पैसा सब कुछ नहीं है। लेकिन पिछली सरकारें इस तथ्य को लगभग भूल गईं।’ लगभग इसी तरह की बात तत्कालीन कंजर्वेटिव नेता और फिलहाल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने कही – ‘हमें सिर्फ इस बात पर नहीं सोचना है कि लोगों के जेब में पैसा डालने में क्या अच्छा है, बल्कि इस बात पर ध्यान देना है कि लोगों को खुश करने के लिए क्या किया जाना चाहिए।’ डेविड कहते हैं कि जीवन पैसा कमाने से ज्यादा बड़ी चीज है। खुशी पर चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि अब ये राजनेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। गुगल ज़ाइंटगाइट्स यूरोप की 2006 में हुई कांफ्रेंस में भाषण देते हुए कैमरून ने कहा कि – ‘अब फोकस सिर्फ धन पर नहीं होना चाहिए। अब वो समय आ गया है, जब हम मानें कि जीवन पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है, और इसलिए हमें सिर्फ जीडीपी पर नहीं बल्कि जीडीडब्ल्यू (जनरल वेल-बीईंग) पर ध्यान देना होगा। और ये सिर्फ पैसे या फिर व्यापार से नहीं नापी जा सकती है। इसका संबंध हमारे आसपास के वातावरण, संस्कृति और इस सबसे उपर हमारे मजूबत रिश्तों से हैं।‘
उनके अनुसार आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति ने हमारे आसपास असंतोष ही बुना है। इसी बात की पुष्टि ब्रिटिश अर्थशास्त्री रिचर्ड लेयर्ड ने अपनी किताब हैप्पीनेसः लेसंस फ्राम ए न्यू साइंस में भी की। लेयर्ड बताते हैं कि इस उपभोक्ता अर्थव्यवस्था ने लोगों के सुख में वृद्धि करने की जगह उनके दुखों को ही बढ़ाया है। इसमें वे कहते हैं कि प्रतिस्पर्धा औऱ तुलना से काम करते लोगों में एक दूसरे से बेहतर करने की ऊर्जा से अर्थव्यवस्थाओं में तो सकारात्मक बदलाव आते हैं, लेकिन व्यक्तिगत जिंदगियों में नहीं, सबसे बेहतर और सबस से ज्यादा की इस प्रतिस्पर्धा में नागरिक अपना ज्यादा से ज्यादा समय काम में झोंक देते हैं, बिना इसकी परवाह किए कि क्या इससे उन्हें सुख हासिल होगा?
फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोज़ी ने तो बाकायदा एक ‘ग्रेट रिवोल्यूशन’ की घोषणा ही कर दी है। उन्होंने ये घोषणा वर्ल्ड बैंक के भूतपूर्व मुख्य अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज की अध्यक्षता में गठित समिति के डेढ़ साल के रिसर्च के बाद की। जोसेफ की समिति में विकास गुरु अमृत्य सेन, मनोवैज्ञानिक डेनियल कॉन्मन और अर्थशास्त्री तथा क्लायमेट चेंज पर काम कर रहे लॉर्ड निकोलस स्टर्न शामिल थे। समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में कहा कि – ‘नए राजनीतिक नेतृत्वों को यह देखना होगा कि हमारे समाज की दिशा क्या होनी चाहिए….’
समिति ने जोरदार तरीके से इस बात की वकालत की कि – हमारा ध्यान प्रोडक्शन-ओरिएंटेड मानकों की बजाए वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी के वेल-बीईंग पर होना चाहिए। सरकोज़ी कहते हैं कि – ‘वे सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपने सांख्यिकीय सिस्टम को उनकी रिपोर्ट के अनुसार बदलने के लिए लड़ेगें। एक महान क्रांति हमारा इंतजार कर रही है।’ सरकोज़ी ने पेरिस में सोरबोन यूनिवर्सिटी में 2009 सितंबर में दिए अपने भाषण में कहा कि – दुनिया पिछले साल के आर्थिक संकट के बारे में अनुमान लगा रही है, इसकी बजाए उसे खुशी और कल्याण की निरंतरता की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि फ्रांस सरकार अब खुशी के सूचकों को विकास के मापकों में शामिल करने की योजना बना रही है।
उनकी समिति की रिपोर्ट ये स्पष्ट करती है कि सांख्यिकी के रूखे-सूखे आँकड़े अब ज्यादा कारगर नहीं हैं। उनका कहना है कि साल भर में 2,000 घंटे काम करने की तुलना में 15,00 घंटे काम करने से किसी के भी जीवन स्तर में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। यही वजह है कि फ्रांस में अब सप्ताह में काम के घंटे मात्र 35 कर दिए गए हैं और इसके साथ ही कर्मचारियों को कई तरह के दूसरे सामाजिक लाभ भी दिए जा रहे हैं। फ्रांस में इस तरह के परिवर्तन होने से वह भूटान के बहुत करीब आ गया है।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि 2006 में बिजनेस वीक मैग्जी़न ने भूटान को एशिया का पहला और दुनिया का आठवाँ सबसे सुखी देश घोषित किया था। यहाँ विज्ञापनों, कुश्ती के चैनलों, प्लास्टिक बैग और ट्रेफिक लाइट पर प्रतिबंध है। भूटान आधुनिकता के साथ प्राचीन संस्कृति और परंपराओं के अनूठे संतुलन का पालन करता है। कुल मिलाकर यहाँ जीएनएच (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) के दर्शन के आधार पर नीतियाँ बनी और लागू की गई है। सरकोज़ी और कैमरून जैसे नेताओं ने अर्थशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के साथ मिलकर सुख के अर्थशास्त्र पर काम करना शुरू कर दिया है।
ये सच है कि योरप के समृद्ध देशों ने समृद्धि का एक स्तर हासिल कर लिया है और इसके बाद वे सुख के सवाल पर आए हैं, लेकिन ये क्या जरूरी है कि हम भी उतना ही चक्कर पूरा कर मूल सवाल पर आएँ? फिर हम तो परंपरा से यह सीखते आएँ हैं कि सुख का संबंध पैसे से नहीं है। कि पैसे से बड़ा जीवन हैं। ये सही है कि नीति के स्तर पर अभी अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख का स्तर पाने के लिए हमें पहले अपनी अर्थव्यवस्था पर गौर करना होगा, लेकिन यदि हम हैप्पीनेस को भी इस लक्ष्य में शामिल करें तो क्या बुराई है? हम क्यों नहीं जीडीपी के साथ-साथ जीडीएच, जीडीडब्ल्यू या फिर जीएनएच की दिशा में सोचें और कदम बढ़ाएँ, आखिर मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य सुख हासिल करना ही तो है।
डॉ. अमिता नीरव
