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संकेत - अग्ने यं ……………………………………………………….. इद्देवेषु गच्छति ।। (ऋग्वेद – 1/1/4)
भावार्थ - हे अग्निदेव । आप जिस हिंसा रहित यज्ञ को चारों ओर से आवृत किये रहते हैं , वही यज्ञ देवताओं तक पहुँचता है ।।
विशेष - पिछले कई सौ वर्षों में वैदिक यज्ञों पर कुछ विक्षिप्त मस्तिष्क वाले देशी-विदेशी विद्वानों के द्वारा हिंसा का मिथ्या आरोप लगता रहा है । आश्चर्य यह होता है कि ये विद्वान पूरे ग्रन्थ का सम्यक अध्ययन करने के बाद भी ग्रन्थारम्भ में ही दत्त उपर्युक्त मन्त्र को अनदेखा करते रहे । ये सत्य है कि ग्रन्थ में कई द्वयार्थी शब्द मध्य में प्रयुक्त हुए हैं जिनका अज्ञानता वश हिंसा अर्थ कर लिया जाता है । यथा – मेध, आलभन, बलि, माँस इत्यादि किन्तु इनका दूसरा हिंसा जनित अर्थ करने की किसी भी आवश्यकता का निवारण उपर्युक्त मन्त्र ग्रन्थारम्भ में ही कर देता है । इस मन्त्र में स्पष्ट लिखा गया है कि जिस हिंसा रहित यज्ञ को आप चारो ओर आवृत किये रहते हैं वही देवों तक पहुँचता है । यज्ञों का आयोजन देवों को प्रसन्न करने हेतु किया जाता है, यज्ञभाग का देवों तक पहुँचने का माध्यम अग्नि देव हैं, और अग्निदेव को ही लक्षित करके यह मन्त्र हिंसा का निवारण करता है । इस तरह से ग्रन्थ के आरम्भ में ही हिंसा का विरोध किया गया है । भला कौन ऐसा यज्ञ करना चाहेगा जो देवों तक उसकी विनय को पहुँचाये ही न ।

