भारतीयों में कभी भी एकता हो ही नहीं सकती !!!
क्यों ?
क्योंकि – “मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना”
अर्थात – प्रत्येक व्यक्ति – यदि वो जीवित है तो – उस की खोपड़ी में बुद्धि अर्थात विचार शक्ति – अन्य जीवित व्यक्ति से अलग होगी |
अर्थात – जीवित व्यक्ति ही विचार क्षमता युक्त होता है |
अर्थात – विचार क्षमता हीन व्यक्ति मृत अथवा मृतक समान है |
भारतीय दर्शन में एक ही सत्य को अपने अपने – भिन्न भिन्न – अनेक दृष्टिकोणों से देख कर – तदनुसार अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता है |
“एकः सत्यम विप्रं बहुधा वदन्ति” अर्थात – एक ही सत्य को विद्वान् लोग अनेक प्रकार से कहते हैं |
यह स्वतंत्रता – विचार विमर्श एवं शाश्त्रार्थ से आरंभ हो कर वाद-विवाद – परस्पर युद्ध एवं विनाश तक जा सकती है |
इसके विपरीत – भारतीय से इतर विदेशी दर्शन – जिनमें व्यतिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है – एवं एक व्यक्ति के विचार ही मान्य होने की बाध्यता होती है – उनमें अद्भुत एकता होती है |
अर्थात – एकता के लिए अनुयायी जनों में बुद्धि – विचार क्षमता – न होना अनिवार्य है |
“संघे शक्ति कलियुगे”
कतिपय एकत्रित – परन्तु – विचार क्षमता शून्य – जोम्बी – व्यक्तिओं का संगठन – एक विशाल – परन्तु – “मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना” कोटि के क्षिन्न भिन्न जन समूह पर पूर्ण आधिपत्य स्थापित करने में सदैव सक्षम होता है |
एक जन समूह – किसी अन्य जन समूह पर किस कारण आधिपत्य स्थापित करता है – यह सर्व विदित है – ज़र (धन) – जोरू (स्त्री) – जमीन (भूमि) के लिए |
आक्रान्ताओं द्वारा ज़र (धन) – जोरू (स्त्री) – जमीन (भूमि) से वंचित होने पर – “मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना” कोटि के – विशाल – परन्तु – क्षिन्न भिन्न जन समूह की नियति – अपने आक्रान्ताओं के विरुद्ध सोशल नेट वर्किंग साइट्स पर दुखड़ा रोना – अर्थात “अरण्य रोदन” है |
“अरण्य रोदन” एवं “जंगल में मोर नाचा – किसने देखा” – दोनों ही व्यर्थ का परिश्रम है – अर्थात – “Exercise in Futility” !!!

