नितेश झा
गाँधीवाद पर बहुत चर्चाएँ होती है लोग खुद कों गाँधीवादी कहते है या उन्हें बनाया जाता है लेकिन मुझे लगता है कि लोग ठीक से गाँधी या गाँधीवाद कों नही समझते है. हो सकता है कि मैं इस लायक नही हूँ कि इन तथ्यों पर चर्चा कर सकूँ. लेकिन मेरे अंदर जो दुविधा है जो प्रश्न चल रहा है उसे मैं सबके सामने रखना चाहता हूँ. मैंने जितना गाँधी या गाँधीवाद कों समझा बस वही कह रहा हूँ हो सकता है कि मैं गलत होऊ लेकिन मेरे विचार में जो गाँधीवाद कि तस्वीर उभरती है. मैं उनमें से कुछ बिंदुओं कों यहाँ उल्लेखित करने का साहस कर रहा हूँ जो कि मुझे लगता है कि गाँधीवाद के मूल तत्त्व है………………….
(१). गाँधीवाद में शुद्ध साध्य ही नही वरण शुद्ध साधन पर भी बल दिया है जो कि निःस्वार्थ है.
(२). गांधीवाद पूर्णरूप से सत्याग्रह पर आधारित है और सत्याग्रह न्याय नही मांगता क्योकि न्याय में जैसे कों तैसा का प्रावधान है. और सत्याग्रह तो हिंसा के सामने अहिंसा, क्रोध के सामने अक्रोध कों, झूठ के सामने सत्य कों स्थापित करने पर बल देता है. वो भी मन कि पूर्ण शुद्धता के साथ अगर मन में थोड़ा भी क्रोध, हिंसा, झूठ, और स्वार्थ कि भावना आई तो वो सत्याग्रह नही रह जायेगा. वो महज एक दिखावा होगा पूर्ण सत्याग्रह नही होगा. ऐसा ही गाँधी जी ने कहा है.
(३). गाँधीजी ने जिस राज्य कि कल्पना कि है वह रामराज्य है लेकिन गाँधी जी का गांधीवाद उस रामराज्य से भी शुद्ध राज्य कि कल्पना करता है.
(४). गांधीवाद बहुमत पर आधारित चीजो कों नही स्वीकार करता है. गाँधी दर्शन तो सर्वमत पर आधारित
है. जहां सभी लोग समान हो, सभी कों समान अवसर मिले और जहाँ द्वेष, इर्ष्या और हिंसा के लिए जगह ना हो.
(५). गांधीवाद किसी भी व्यक्ति से घृणा नही करता चाहे वोह कितना भी बुरा ही क्यों ना हो. चाहे वो कितना भी बड़ा पापी ही क्यों ना हो. गाँधीवाद तो इसे एक मनुष्य कि विकृति मनता है और उसका लक्ष्य उसे प्रेम से सुधारना है ना कि नफरत करना.
(६). गांधीवाद आत्मा की शुद्धि पर बल देता है. सभी बुरइयो से परे है गाँधीवाद.
और भी कई तथ्य है गांधीवाद में लेकिन सबका सार एक ही है कि “शुद्धता” वो भी पूर्णतया आत्मा से हृदय से. गाँधीवाद किसी भी तत्त्व का सबसे शुद्धतम रूप है. इसमें किसी भी तरह कि मिलावट कि कोई गुंजाईश नही है. अगर ऐसा होता है तो हम उसे विश्वास के साथ गांधीवाद नही कह सकते है. गांधीवाद गंगा नही वरण गौमुख है क्योकि गंगा का शुद्धतम रूप वही है. गांधीवाद मानव विकास कि पराकस्ठा है जिसे गाँधी जी भी पूर्ण रूप से प्राप्त नही कर सके बल्कि उसकी प्राप्ति के लिए अपने अंतिम क्षण तक संघर्ष किया. तो आप ही बताये कि हम ऐसे में किसी कों गाँधी या गाँधीवादी कैसे कह सकते है? किसी चीज़ में विश्वास रखने का मतलब ये नही है की जो आपको अच्छा लगे आप उसके साथ हो ले या जिसे आप आसानी से पा सके उसे अपनए बाकि जिसे पाना कठिन है उसे नकार दे. अगर आप गांधीवादी है तो पूर्ण रूप से आप कों गांधीदर्शन कों अपनाना पड़ेगा. अगर आप ऐसा नही कर सकते तो आप गांधीवादी कैसे हो सकते है? आपकों गांधीवाद के तत्त्व कों नही वरण उसके मर्म कों समझना पड़ेगा तभी कही जा कर आप गांधीवाद कों पा सकते है. मैं तो विश्वास के साथ ये कह सकता हूँ कि अगर ठीक ढंग से लोग गाँधी कों समझे तो वो हमारे भगवान होगे. क्योकि लोग उसे ही भगवान मानते है जिसे वो नही पा सकते. या जो उनके लिए कल्पना हो या सबसे बड़ा आदर्श हो. और जिस गति से हम नीचे गिर रहे है उसमे लोग अगर गांधीवाद नही गाँधी जी का भी अगर आंशिक अनुशरण कर ले तो वो महान व्यक्ति कहलायेगा. मेरी नज़र में गांधीवाद गाँधी जी से भी ऊपर है. और ऐसे में हम किसी की तुलना गाँधी जी से नही कर सकते तो बिना सोचे समझे किसी कों गांधीवादी कैसे कह सकते है?

