दर्शन|2009/10/17 6:45 pm

आइये खोजें मानव जीवन के रहस्य को {भाग -१}

internetजीवन एक दौड़ है . वह  बेतहाशा भाग रहा है बगैर यह जाने कि किस ओर जा रहा है ? कुछ पा लेने की ख्वाहिश मन की उत्कंठा को बढ़ा रही है . क्या पा लेना चाहता है वह ? क्या उसे मालुम है उसकी मंजिल कहाँ है ? शायद नहीं भी और हाँ भी . वह असमंजस की स्थिति में यूँ ही आगे चला जा रहा है . इस बिना ट्राफी वाली दौड़ में वह अकेला नहीं है . इस संसार के अरबों इंसान इसी मुफलिसी के शिकार है . जीवन मानव सभ्यता की सबसे बड़ी पहेली बनकर रह गयी है .आज मानव के पास भौतिक सुख-सुविधा की हर वस्तु मौजूद है . पर इंसान बेचैन क्यों है ? क्या यह बेचैनी जीवन को ना समझ पाने की वजह से है ? मानव इतिहास में जिन चंद लोगों को दुनिया में सर्वमान्यता मिली हुई है क्या उन्होंने  जिन्दगी के पहलुओं में छुपे रहस्यों को समझ लिया था ? आखिर क्या है जीवन का रहस्य ? एक समय संसार के सबसे प्राचीन धर्म {जीवन पद्धति } की रुढियों को चुनौती देने वाले  महात्मा बुद्ध का आगमन हुआ था . भोगविलास की सुविधा संपन्न राजकुमार को आखिर किस बात की कमी खटक रही थी ? वह कौन सा कंटक मन को चुभ रहा था जिसने उसे महल -अटारी त्याग कर भिक्षुक बन यत्र-तत्र विचरने पर मजबूर कर दिया ? क्या जीवन को समझने का लक्ष्य सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध की ओर ले गया ? बुद्ध को स्वीकार्यता मिलना क्या सिद्धार्थ होने की देन है ?गृहस्थाश्रम छोड़ कर संन्यास ग्रहण करने के अनेक उदाहरण बिखरे पड़े हैं . ऐसे में समाज द्वारा बुद्ध को अपनाने पर भी प्रश्न उठाया जा सकता है . मानव सभ्यता की तमाम उपलब्धियां एक छोटे कालखंड में अपने सार्थक हैं और समकालीन मानव समाज उसे हीं अंतिम  सत्य मानने की भूल  करता आया है . यह बात राजनैतिक ,सामाजिक ,आध्यात्मिक ,सांस्कृतिक सभी आयामों में हुबहू प्रयुक्त होता है .प्रथम  दृष्टि में बुद्ध को समझने पर ऐसा हीं मालुम होता है कि ज्ञान प्राप्ति हीं मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है .लेकिन क्या बुद्ध ने जो कुछ अनुभव किया वह मानव जीवन का अंतिम सत्य है ? बुद्ध स्वयं अपने शिष्यों को कहते हैं " मैंने जो कुछ कहा वह अंतिम सत्य नहीं है .आपकी ज्ञानेन्द्रियाँ जागृत है .खुद से सोचें ,समझें और अपने -अपने सत्य का संधान करें " .अब तक ज्ञात  मानव जीवन दर्शन अथवा विज्ञान  में  कोई अंतिम बात नहीं सिद्ध हो पाई है . चाहे आर्कमिडीज ,न्यूटन ,आइन्स्टीन ,सुकरात ,प्लेटो ,मनु, बुद्ध ,महावीर, ओशो ,या मुहम्मद सल्ल  को देखें सबके तो एक तथ्य सामान दिखाई पड़ता है कि सबके अनुयायियों की अभीप्सा आज भी जस की तस बनी हुई है . सच तो यह है कि सत्य किसी से सुनकर आत्मसात करने की चीज नहीं है . सत्य किसी खोज नहीं हो सकता . सत्य को दर्ह्स्य नहीं जा सकता . सत्य अनुभव से परे और अनुभूति से दूर है . ठीक उसी प्रकार जैसे किसी को तैरना सीखना है तो इसके लिए तैरना जरुरी है और तैरने के लिए नदी में उतरना जरुई है . नदी के किनारे बैठकर सोचने मात्र से तैरने की विद्या नहीं आ सकती है . सत्य को जानना भी इसी से मिलती जुलती प्रक्रिया है . हम किनारे बैठ कर तैरने के सिद्धांत और नियम बना सकते हैं पर वाकई में तैरने के लिए नदी में  गहरे पैठने की आवश्यकता होती है . किसी का अनुशरण करना और अनुयायी बन उसके हिस्से के सत्य को सबका सच मान लेने जैसा है .क्या सत्य का सच कभी मानव जान पायेगा ? प्रकृति में इतनी विविधता है कि समस्त ब्रह्माण्ड में नित नए – नए सिद्धांतों का आगमन होता रहता हैं . स्थिरता नाम की किसी चीज का अस्तित्व इस जगत में संभव नहीं दिखता . प्रत्येक हिस्सा चलायमान और क्षण भंगुर है .भौतिक जगत में मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य होते हुए  भी मनुष्य को सर्वाधिक अस्वीकार्य है .मानव स्वभाव में अपने अस्तित्व की समाप्ति को सहन कर पाना सहज नहीं होता . मृत्यु को झुठलाने का साधन भी मनुष्य ने इहलोक से परलोक की ओर आवागमन की कल्पना करके जुटा लिया है . { आगे जारी ………}

1 Comment

  • जीवन के रहस्यों की सुन्दर विवेचना की है आपने !

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