संतुलित जीवन

योग सूत्र के अनुसार अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष के कारण जीव को  दुःख प्राप्त होता है | उपनिषदों के अनुसार के कण-कण में सत् चित् आनंदस्वरूप परमात्मा ही सर्वत्र हैं तो दुःख कैसा ? जीव को भी मूल रूप से आनंदस्वरूप बताया गया है | इसका प्रमाण है कि जीव कि सारी  क्रियाएँ दुःख को दूर करने और सुख कि प्राप्ति के लिए होती है |बालक  जब तक इच्छा, तृष्णा, द्वेष आदि से रूबरू नही होता तब तक वह चाहे गरीबी हो या अमीरी , महल हो या जंगल अपने आप में खेलते रहता है | तो क्या मनुष्य जीवन भर बालक ही बना रहे पुरुषार्थ ना करे | इसका उत्तर भगवान  श्री कृष्ण गीता में देते हैं कि मनुष्य कर्म किये बगैर नहीं रह सकता परन्तु यदि वह बिना विचार किये या विश्राम किये कर्म करता है तो हानि , दुःख , थकान एवं अस्वस्थ होना अवश्यंभावी है और यदि वह देश , काल , सामर्थ्य ,सत् – असत् , हानि -लाभ का पूर्व विचार कर कर्म करता है तो उसका परिणाम सुख रूप में  प्राप्त होता है | अर्थात कर्म में संतुलन की आवश्यकता है |

आहार , विहार , सोना , जागना कर्म या व्यवहार में उपयुक्तता और संतुलन बनाकर जीवन जीने वाले को ही दुःख से मुक्ति मिलती है और वह सुखी जीवन व्यतीत करता है | उदाहरण के लिए भोजन जीने के लिये आवश्यक है , परन्तु अत्यधिक भोजन विष है और संतुलित भोजन औषध है | इसी प्रकार यदि मनुष्य बहुत  देर तक जागता रहता है या बहुत देर तक सोता  है तो उसके शरीर में बनने वाले रसायनों का संतुलन बिगड जायेगा और वह तनाव एवं विक्षिप्तता से ग्रस्त हो जायेगा | अतः स्वस्थ रहने के लिए निद्रा एवं जागरण में संतुलन आवश्यक है | कर्म के पश्च्यात विश्राम एवं हास-परिहास , खेल एवं मनोरंजन आवश्यक है | पुरुष यदि प्रेम भावना में आकर पुत्र , स्त्री , रिश्तेदार एवं मित्र को अत्यधिक उपकृत करता है या उपकृत नहीं करता है तो इनसे सम्बन्ध बिगड जाते हैं | सबसे अच्छे सम्बन्ध बने रहने के लिए सबसे संतुलित व्यवहार आवश्यक है | इसी प्रकार धर्म और अर्थोपार्जन में भी संतुलन आवश्यक है | केवल अर्थोपार्जन से तनाव  रोग एवं हानि आदि का भय जीवन को नर्क बना देते हैं | अतः हर क्षेत्र में संतुलन आवश्यक है |

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