देवर्षि नारद खीझ-से गये थे, क्योंकि तीनों लोकों में राधा की स्तुति हो रही थी। वे स्वयं भी श्रीकृष्ण से कितना प्रेम करते हैं। इसी मानसिक संताप को मन में छिपाये वे श्रीकृष्ण के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण भयंकर सिरदर्द से कराह रहे हैं। देवर्षि के हृदय में टीस उठी। पूछा, ‘भगवन्! क्या इस वेदना का कोई उपचार नहीं? क्या मेरे हृदय के रक्त से यह शांत नहीं हो सकती?’ श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, ‘‘मुझे रक्त की आवश्यकता नहीं। यदि मेरा कोई भक्त अपना चरणोदक पिला दे, तो शायद लाभ हो सकता है।’’
नारद ने मन में सोचा-‘‘भक्त का चरणोदक भगवान् के श्रीमुख में!’’ आखिर रुक्मिणी के पास जाकर उन्होंने सार हाल कह सुनाया। रुक्मिणी भी बोली, ‘‘नहीं, नहीं! देवर्षि, मैं यह पाप नहीं कर सकती।’’ नारद ने लौटकर रुक्मिणी की असहमति श्रीकृष्ण के पास व्यक्त कर दी। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें राधा के पास भेजा। राधा ने जो सुना, तो तत्क्षण ही एक पात्र में जल लाकर उसमें अपने दोनों पैर डुबो दिये और नारद से बोलीं, ‘‘देवर्षि, इसे तत्काल श्रीकृष्ण के पास ले जाइए। मैं जानती हूं, इससे मुझे नरक मिलेगा, किन्तु अपने प्रियतम के सुख के लिए मैं अनन्त युगों तक यातना भोगने को प्रस्तुत हूं। तब देवर्षि समझ गये कि तीनों लोकों में राधा के प्रेम की स्तुति क्यों हो रही है।

