जीवन|2011/06/14 7:40 pm

क्या आकाश सच में ऊँचा है ?

कभी किसी खुले मैदान में बैठिये,फुर्सत के पलों में,और देखिये अपने इर्द गिर्द तो अजीब प्रश्न आते है मन में ,इतना ऊँचा आकाश जिसकी कोई थाह नहीं उसपे कभी ध्यान नहीं जाता आपका,वो आकाश जिसमे सूर्य सिर्फ सागर में लटकती एक छोटी सी गेंद लगता है,जो इस धरती से लेके न जाने कहा तक फैला है,क्यूँ आपके इस छोटे से मन को नहीं खीच पता आपनी और,सितारे तो फिर भी रात में मन खीच लेते है कभी कभार पर आकाश पे ध्यान नहीं जाता,शायद मनुष्य को मात्र अच्छा या बुरा भाता है,सुन्दर और कुरूप भाता है,संपूर्ण नहीं भाता,वो संपूर्ण को पहचान ही नहीं पता उसे उसके अस्तित्व का एहसास ही नहीं होता.
आकाश हमसे दूर है ये सत्य नहीं है,आपने ठीक सामने देखिये,वह भी है,आपने आज तक ध्यान नहीं दिया,जो खाली स्थान है वो उस आकाश का ही तो एक हिस्सा है,हर चीज़ दरअसल उसीमे रखी है फिर भी आप उसे देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते,मनुष्य का ये रोग है की जो चीज़ उसके काम की है वो उसे ही देखता है,तो ज़रा आकाश की आवश्यकता पे ध्यान दीजिये,यदि ये पारदर्शी न होता तो क्या आप कुछ भी देख पाते,जरा सोचिये अपने गुण की वजह से ही नजरंदाज़ किया जाता है ये,पर यदि अपने ये गुण ये त्याग दे तो अपना धर्म नहीं निभा पाएगा,बचपन से ही मई सुनता था की कितनी भी गर्मी पड़े सूर्य को दोष देना पाप है,क्यूंकि यदि ऐसा न हो तो फसल अच्छी नहीं होगी(मई एक किसान परिवार से हु),पर अब सोचता हु की उससे भी बड़ा निष्काम कर्म तो आकाश का है,ये कभी खुद के बारे में जानने नहीं देता हमें,क्योंकि इसके अज्ञात रहने पर ही पारदर्शिता बनी रहेगी,यदि ये कोई रूप धारण करले तो किसी को कुछ दिखे ही न,प्रकाश को फैलने के लिए मार्ग देता है ये,अज्ञात रहता है,और लोगो की सेवा करता है,फिर अचानक दिमाग में आया कही यही इश्वर तो नहीं,इतना सब करने के बाद भी लोगो की गाली खाता है ,सदैव हमारे साथ रहता है,एकदम बगल में सामने ऊपर नीचे हर जगह पर अज्ञात रहना इसकी विवशता है इसकी सेवा है,यदि ये धोखा करे तो जिन चीजों पे आप नाज़ करते है उसे देख भी कैसे पाएँगे.

हर किसी को अपने अन्दर समेटा हुआ है इसने फिर भी आप इर्ष्य करते है, कहते है आकाश ऊँचा है,अपने बगल में खड़ा नहीं देख पाते इसे,यदि इश्वर आपको पिता के रूप में नहीं पसंद तो उसे मित्र की तरह देखे उसने तो आपको कभी नहीं कहा उसे ऊँचा देखने को,वो तो आपके कदमो के पास भी रहने को तैयार है,इश्वर का धर्म अहंकार नहीं ,उसका धर्म तो सदैव आपके साथ रहके आपको देखने का माध्यम देना है.

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