ब्रह्माण्ड की परम सत्ता

ब्रह्माण्ड की परम सत्ता जहां प्रकृति के बन्धन से मुक्त है, उसे निर्गुण और जहां बन्धनयुक्त है, उसे सगुण कहते हैं। सगुण में भी दो विभाग हैं। एक है उनका रूप और दूसरा अ-रूप। मनुष्य में जो बुद्धि, बोधि तथा अहम् का भाव हैं, वे सब अ-रूप हैं। इन्हें देखा नहीं जा सकता। लेकिन मनुष्य को तो देखा जा सकता है। उसी तरह सगुण ब्रह्म की भी बुद्धि, बोधि आदि दृष्टि गम्य नहीं  हैं। इसी कारण हम उन्हें देख नहीं सकते हैं। janokti /adhyatm

दूसरा है रूपयुक्त। यथा , व्यक्ति अपने मन या चित्त को नहीं देख सकता है। परन्तु , किसी भी  की कल्पना करते समय उसके चित्त में उक्त वस्तु का रूप साकार हो उठता है – इतना स्पष्ट कि मन उसे देख लेता है। इसलिए मानव का चित्त भी कभी अ-रूप है और कभी रूपयुक्त। वैसे ही परमात्मा का चित्त भी रूपयुक्त है -यह दृश्यमान जगत जिसे हम संसार कहते हैं, उनके चित्त में उभरने वाली आकृति है। यह विश्व ही रूप का समुद्र है और जब यह विषय होगा तब मन सगुण ब्रह्म हो जाएगा।

समस्त ब्रह्मांड में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो भौतिक एवं अध्यात्म दोनों ही विधाओं का सर्जक, पोषक एवं व्यवहार कत्र्ता है। मनुष्य की देह के परे इंद्रियां, इंद्रियों के परे मन, मन के परे बुद्धि तथा बुद्धि के परे सूक्ष्म शरीर आत्मा है। ये सभी अंग प्रत्येक कार्य, व्यवहार एवं गुण-दोष के आधार पर एक दूसरे से भिन्न होने पर भी जुडे होते हैं। जहां शरीर तथा इन्द्रियां मन और बुद्धि के निर्देशानुसार भौतिक कार्यो में लगी रहती हैं, वहीं सूक्ष्म शरीर आत्मा आध्यात्मिक धर्मो का आचरण करती है। अध्यात्म की कल्पना उस कामधेनु के रूप में की जाती है, जिसका दूध वेद रूपी ज्ञान-विज्ञान है। स्वाध्याय से ज्ञान एवं विवेक की जागृति होती है और ऊर्जा की प्राप्ति होती है। चूंकि सामान्य जन इस ज्ञान रूपी दुग्ध को पचाने में असमर्थ होते हैं, इसीलिए शास्त्रों और पुराणों को स्मृतियों के रूप में सहज एवं सरल बनाकर ग्राह्य बनाया गया।

1 Comment

  • सारगर्भित आलेख |

    साकार (सगुण) और निराकार (निर्गुण) ब्रह्म को सरल शब्दों मैं समझने का सुदर प्रयास है ये आलेख |

    बहुत बहुत धन्यवाद … | इस तरह के अन्य आलेखों की सख्त आवश्यकता है इनदिनों |

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