भाषा की गुलामी तोड़नी हीं होगी

Hindi

लार्ड मैकाले ने गुलाम भारत में शिक्षा की उर्वर भूमि पर एक विषैला बीज बोया , भारत दैहिक तौर पर आज़ाद हुआ लेकिन मानसिक रूप से नहीं और वह विषैला बीज धीरे-धीरे विष-वृक्ष बनता गया . आज विदेशी भाषा और शिक्षा प्रणाली ने भारत को खोखला कर दिया और हमारे ऊपर पाश्चात्य पोषित इंडिया पूरी तरह से हावी है .लार्ड मैकाले जानता था ,जब तक संस्कृति और भाषा के स्तर पर गुलाम नहीं बनाया जाएगा, भारतवर्ष को हमेशा के लिए या पूरी तरह, गुलाम बनाना संभव नहीं होगा। लार्ड मैकाले  की सूक्ष्म निगाह ने देख लिया था कि हिंदुस्तानियों को अँग्रेज़ी भाषा के माध्यम से ही सही और व्यापक अर्थों में गुलाम बनाया जा सकता है . आज कहने को हम आज़ाद हैं लेकिन क्या हम सच में स्वतंत्र हैं ? अरे , आज भाषा बची भी है तो भाषाकारों के पास वास्तविक भारतीय दृष्टि नहीं रह गयी है .
भारत की समृद्ध सांस्कृतिक मूल्यों को भारतवासियों के मन से निकाल बाहर करने की साजिश में मैकाले करीब -करीब कामयाब होता दिखता है पर वही 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी' . जिस रोज मैकाले का सपना पूरा और भारतेंदु का सपना ध्वस्त हो जाएगा, उस दिन देश पूरे तौर पर केवल 'इंडिया' रह जाएगा.

मैकाले को तो केवल सूत्रधार माना जाए तो उचित होगा . असली काम तो तत्कालीन भारतीय प्रतिनिधित्व ने किया था . अंग्रेज़ी जानने वालों के बीच सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लॉलीपॉप बांटने की लार्ड मैकाले की दूरगामी साजिश के समय अंग्रेज़ी परस्त काँग्रेसी नेता पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एकजुट हो गए कि अंग्रेज़ी को शासन की भाषा से हटाना नहीं है . वरना वर्चस्व जाता रहेगा और देश को ब्रिटिश शैली में शासित करने की योजनाएँ भी सफल नहीं हो पाएँगी . अंग्रेज़ीपरस्त काँग्रेसी नेताओं की कारगुजारियों ने अंग्रेज़ी को परतंत्रता के 200 वर्षों से कई गुना अधिक महत्व तथाकथित स्वाधीनता के केवल 60 वर्षों में दिला दिया  .
कांग्रेसियों की इस हकीकत के बरक्स गांधी जी का सपना था कि अगर भारतवर्ष भाषा में एक नहीं हो सका, तो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम को आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा. भारत की प्रादेशिक भाषाओं के प्रति गांधी जी का रुख उदासीनता का नहीं था. वह स्वयं गुजराती भाषी थे, किसी अंग्रेज़ीपरस्त काँग्रेसी से अंग्रेज़ी भाषा के ज्ञान में कमजोर नहीं थे, लेकिन अंग्रेज़ों के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम छेड़ने के बाद अपने अनुभवों से यह ज्ञान प्राप्त किया कि अगर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम को पूरे देश में एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है, तो केवल हिंदी भाषा में.

भारतवर्ष के अलावा पूरे विश्व में एक भी ऐसा राष्ट्र नहीं है, जहाँ विदेशी भाषा शासन की भाषा हो और न ही कोई ऐसा देश जिसका अंग्रेजी नाम अलग हो जैसे भारत का अंग्रजी नाम इंडिया .हज़ारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा वाला भारतवर्ष आज भी भाषा में गुलाम है. यह कितनी बड़ी विडंबना है कि भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा के सवालों को अंग्रजी और क्षेत्रीय भाषाओँ के मकड़जाल में उलझा दिया गया है . अंग्रजी की खिलाफत का सवाल कहाँ उठता है जब इस देश में तमिलनाडु से लेकर महाराष्ट्र और असाम तक हिंदी बोलने पर मारा पीता जाता हो . महाराष्ट्र विधान सभा में हिंदी में सपथ लेने पर एक विधायक को पीटने की हालिया घटना से बढ़ते विस्फोटक हालात की एक झलक मिल जाती है . राष्ट्रभाषा के सवाल पर राष्ट्रव्यापी बहस के कपाट जैसे सदा-सदा के लिए बंद कर दिए हैं। कहीं से भी कोई आशा की किरण फूटती दिखाई नहीं पड़ती.

सारी प्रादेशिक भाषाएँ भी अपने-अपने क्षेत्रों में बहुत तेज़ी से पिछड़ती जा रही हैं . प्रादेशिक भाषा के ठेकेदार अंग्रेजी के बजाय अपनी हीं मातृभाषा हिंदी को दुश्मन मान रहे हैं और दूसरी तरफ अंग्रजी अपना जाल बुनती चली जा रही है . इनको अपनी गलती का अहसास उस दिन होगा  जब यह प्रादेशिक भाषाओं की संस्कृतियों के लिए भी ख़तरनाक हैं ऐसा उजागर हो जायेगा . प्रादेशिक भाषाओं की भी वास्तविक शत्रु अंग्रेज़ी ही है, लेकिन देश के अंग्रेज़ीपरस्तों ने कुछ ऐसा वातावरण निर्मित करने में सफलता प्राप्त कर ली है जैसे भारतवर्ष की समस्त प्रादेशिक भाषाओं को केवल और केवल हिंदी से ख़तरा हो. भाषा के मामले में भारतवर्ष एक मात्र अपवाद है . भारतवर्ष भी एक स्वाधीन राष्ट्र तभी बन पाएगा जब अंग्रेज़ीपरस्त मानसिकता से मुक्ति मिलेगी . और यह मानसिकता इसी अंग्रजी भाषा के सह से उपजती है . वस्तुतः भारत का हिन्दीकरण किये बगैर पूर्ण स्वतंत्रता यानी संपूर्ण स्वराज्य हासिल नहीं हो सकता है .

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About जयराम "विप्लव"

जयराम "विप्लव" , मुंगेर (बिहार) के रहनेवाले हैं. अपनी प्रारंभिक शिक्षा भागलपुर से पूरी करने के बाद दिल्ली का रुख किया. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में स्नातक की उपाधि ग्रहण करने के बाद स्नातकोत्तर की पढाई कर रहे हैं .”जनोक्ति ” ब्लाग से अंतरजाल पर दस्तक देने के बाद आपने जनोक्ति डाट कॉम को स्थापित किया, जिसे आज वैचारिक जगत में अपने सुसंस्कृत और प्रभावी पाठ्य सामग्री के लिए जाना जाता है .आप अनेक सामाजिक संगठनो में उच्च पदों पर आसीन हैं और पथभ्रमित पत्रकारिता को प्रोफेसन से पैशन की ओर प्रवाहित करने के लिए निरंतर संघर्षरत हैं. आपसे संपर्क करने का पता है. ई-मेल – editor@janokti.com , janokti@gmail.com संपर्क सूत्र – +91-9555798502
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3 Responses

  1. ham log keval bhasha ki gulami ka rona rokar chup ho jate hai ,samasya bahut hi jatil hai jiski jar mein ashiksha hai .

  2. Aapke is blog ki jitni tarif ki jay wah kam hoga.Hindi KO SAMMAN DENA APNE DESH AUR SAMAJ KO SAMMAN DENE KE BARABAR HAI.Hindi main charsau bisi karna bahut hi muskil hota hai lekin english main bahut hi aasan.Isi wajah se desh hamara badhal hai.

  3.  
    इसे सभी जानते है करे कौन?

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