बातें कामरेड प्रदुम्मन सिंह की

बहुत ऊंचा और अमीर घराना पर मन में जाग उठी क्रान्ति की जवाला. देखते ही देखते एक छलांग लगा दी देश को आज़ाद कराने के लिए चल रहे आन्दोलन में. आजादी आ गयी पर इस आजादी के साथ ही शुरू हुआ लम्बे संघर्षों का एक नया सिलसिला. देश का आम आदमी पिस रहा था गरीबी में, बेरोज़गारी में, कदम कदम पर हो रहे शोषण से…उसे भी इस सारे जंजाल से मुक्त करना था. उस समय उनका वेतन केवल 20 रुपये महीना था. उसमें अपना गुज़ारा भी करना और इन्कलाब की जंग को भी आगे बढ़ाना. पर फिर भी इस करिश्में को कर दिखाया प्रदुम्मन सिंह ने. वही प्रदुम्मन सिंह जिसे आज देश और विदेश में भारत की पेंशन स्कीम का पितामह कह कर भी याद किया जाता है. उनका जन्म जेहलम में हुआ. आज कल यह इलाका पाकिस्तान में है. जब देश आज़ाद हुआ तो शुरू हो गयी क्रान्ति की दूसरी लडाई. यह संघर्ष था आम आदमी को इस बात का अहसास कराने का कि अब वह आज़ाद है और उस देश का नागरिक है जहां उसके सभी दुखों का अंत होने को है. आजादी का तकाजा भी यही था और सभी की उमीदें भी पर अजीब इत्तफाक है कि आम आदमी के दुःख कम होने की बजाये लगातार तेज़ी से बढ़ते चले गए. इसी दौरान प्रदुम्मन सिंह और उनके एक मित्र को उच्च पद पर नियुक्त किये जाने की एक विशेष पेशकश सरकार की तरफ से हुई जिसे मित्र ने तुरंत मान लिया और बाद में बहुत ऊंचे पद पर जा कर रिटायर हुआ. लेकिन प्रदुम्मन सिंह ने इस पेशकश को ठुकराते हुए एक बार फिर चुना आन्दोलन और संघर्ष का रास्ता. एक तरफ बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों और कारखानों  के मालिक और दूसरी तरफ बेबस मजदूर. पर जोश और होश का संयुक्त मार्गदर्शन जब इन कमज़ोर और लाचार मजदूरों को मिला तो फिर अमृतसर की भूमि गूँज उठी..हर जोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है…. इस संघर्ष के दौरान मजदूरों पर लाठीयां भी चलीं और गोलियां भी पर जीत का सेहरा हर बार बंधा मजदूर जमात के माथे पर. एक और ख़ास बात इस दौरान यह हुई कि मजदूर पूरी तरह से एक होने लगे. यह प्रदुम्मन सिंह और पदम भूषण जैसा अवार्ड लौटने वाले कामरेड सत्य पल डांग के संयुक्त प्रयासों का ही परिणाम था के मजदूरों का एक ऐसा संगठन अस्तित्व में आया जो कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी या किसी भी और दल या दलगत राजनीती से कहीं ऊपर था. पर यह अमृतसर की पावन भूमि थी जहां लव कुश के रणकौशल के साथ साथ बाबा दीप सिंह शहीद की अदभुत बहादुरी और जलियाँ वाला बाग़ की उस धरती पर देश की आज़ादी की जंग के दौरान महान क़ुरबानी आज भी लोगों के दिलों में ताज़ा है. जब मजदूर संघर्ष के दौरान ही देश पर पाकिस्तान का हमला हुआ तो प्रदुम्मन सिंह और उनके साथी सभी मतभेदों और दूसरे मामलों को दरकिनार करके सेना की सहायता के लिए भी आगे आये. इन सभी बातों का ज़िक्र उन्हों ने अपनी पहली पुस्तक में भी किया है. जब अमृतसर में अलगाववाद की लहर ने जोर पकड़ा तो उसका सामना करने के लिए भी प्रदुम्मन सिंह और उनके साथी बढ़-चढ़ कर आगे आये. आज वह जिस्मानी तौर पर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हिंदी और पंजाबी के साथ साथ अंग्रेजी में लिखी उनकी 13 पुस्तकें आज भी हमारा मार्गदर्शन करती हैं और याद दिलाती हैं कि सब के लिए खुशहाली का सपना अभी पूरा नहीं हुआ उसे हम सभी को एक साथ कंधे से कंधा मिला कर पूरा करना होगा.       –रैक्टर कथूरिया        

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