हर घर बागबान

मेरा उनसे कोई खून का रिश्ता नहीं था फिर भी मै उनसे बराबर मिलता था घंटो मै उनसे बातें करता था उनको भी अच्छा लगता था मझसे बातें करना। मेरा उनसे एक आत्मिक लगाव हो गया था, वो तक़रीबन ६५ या ६८ साल के होंगे। उनके दो लड़के थे एक विदेश में रहता था और एक भारत के ही महानगर में नौकरी करता था, बीच-बीच में लड़के आते थे अपने माता-पिता से मिलकर फिर वो चले जाते थे। जिस बुजुर्ग सज्जन से मुझे लगाव था उनको किडनी का प्राब्लम था वो महीने में चार या पांच बार डायलोसिश के लिए हस्पताल जाते थे उनकी पूरी जिंदगी करीब-करीब दवा पर ही टिकी थी, वो जब भी हस्पताल से आते थे तो मुझे जरुर फोन करते थे अपने परेशानियों को बताते थे कभी बहुत बेचैन होते तो मुझे बुला लेते थे। मुझसे घंटो बातें करते, उनके बातों में जिंदगी की सच्चाई नज़र आती थी, वो हमेशा यह बात कहते थे “अजय पहले हमारे बुजुर्ग अपनी बेटी का कन्यादान करते थे लेकिन आज हम अपने बेटे का ही दान कर देते हैं , हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाते है अच्छे से अच्छे कालेज में उच्च शिक्षा के लिए भेजते है पढने के बाद वो नौकरी में जाते है फिर उनकी हम शादी कराते है, शादी के बाद बच्चे पराये हो जाते है शायद उनकी खुद की जिंदगी अच्छी लगने लगती है और माता-पिता की जिंदगी से उनको कोई खास लगाव नहीं रह जाता है, आज-कल के बच्चे बस… एक रिश्ते को निभाते है।” उनकी बातों में दर्द था मै यह महशुस करता था, शायद उनके बच्चे अपनी जिम्मेवारी को सही तरीके से नहीं निभा पा रहे थे, तभी उनके दिल में ऐसी बाते थी। वो सज्जन अपनी परेशानियाँ तो नहीं बताते थे लेकिन बातों ही बातों में जीवन की सच्चाई से रूबरू जरुर करा देते थे। वो बराबर यह बात कहते थे …जिंदगी हाथो से धीरे-धीरे फिशलती जा रही है मुझमे इतनी शक्ति नहीं है की जाती हुई जिन्दगी को पकड़ संकू … शायद धीरे-धीरे मौत के आगोश में जा रहा हूँ । उनमे जीने की लालसा थी लेकिन स्वास्थ उनका साथ नहीं दे रहा था क्यों कि वो अक्सर यह कहते थे कि मै जीना चाहता हूँ।
उसी दरमियान मै अपने निजी कामो से बाहर चला गया था तक़रीबन दस दिनों बाद जब मै अपने घर लौटा तो दुसरे दिन उनसे मिलने के लिए उनके घर गया उनकी पत्नी से मुलाकात हुई ..वो रोते हुए बोली कि तुम कहाँ चला गया था वो बराबर तुमको याद करते रहे, लेकिन तुमसे बात नहीं हो पाई। वो तो अपनी अनंत-यात्रा पर अकेले ही चले गए मुझे साथ लेकर नहीं गए अब उनके बगैर यह जिंदगी कैसे काटूंगी। उनकी रुदन में जो दर्द था वो मुझे अन्दर तक झकझोर दिया। उनका बेटा जो भारत में था अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ आया था उनके दाह-संस्कार के बाद क्रिया-कर्म में भाग लेने के लिए।
कभी-कभी सोंचता हूँ जिंदगी इतनी बे-मानी क्यों है, अक्सर हम अपने बच्चों अपने परिवार के लिए जीते है जिनके लिए जिंदगी भर कि जमा-पूंजी उनके भविष्य को बनाने में लगा देते है लेकिन अंतिम समय में वही बच्चे हमारे साथ नहीं रहते हैं। आज के भौतिक-युग में पैसा सर्वोपरि हो गया है शायद अपने खून के रिश्ते से भी ऊपर .

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About अजय केशरी

अजय केशरी पश्चिमी बिहार के एक छोटे शहर, डुमरांव में फरवरी 1957 में जन्म और वहीँ स्नातक तक शिक्षा. पुस्तकीय पढ़ाई में विशेष रूचि कभी नहीं, बल्कि जीवन में धंसकर उसे पढ़ने-समझने और उसके हर पल को जीने की अधिक ललक. डुमरांव की मिट्टी, उसकी भोजपुरी बोली, उसकी हवा की गंध मेरी स्मृति और मेरे अस्तित्व में व्याप्त. वर्त्तमान में पटना में ज़मीन-जायदाद के क्रय-विक्रय के व्यवसाय में संलग्न. लेखन से एक पेशेवर लेखक की तरह जुड़ाव नहीं. आस-पास घट रही घटनाओं, देश की राजनितिक उथल-पुथल तथा चारो ओर फैली हुई ज़िन्दगी की घमासान के बीच, लेखन स्थितियों के प्रति मेरी एक प्रतिक्रिया है. ajaykeshari57@gmail.com, http://samaytimes.blogspot.com/
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One Response

  1. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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