एलोपैथी का एक आकलन…

एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिन्हें बारीकी से जानने और समझने की जरूरत है। अभी तक एलोपैथी की विशेषताओं अथवा दोषों को समग्र रूप से जानने-समझने का प्रयास शायद नहीं हुआ है। इसके विविध पक्ष, आयाम इस प्रकार रेखांकित किये जा सकते हैं–एलोपैथी वह पहली चिकित्सा पद्धति है जिसकी दवाएं निश्चित रूप से दुष्प्रभाव करती ही हैं, चाहे फिर वह कितनी भी कम मात्रा में क्यों न ली जाएं। ये दवाएं रोगाणुओं के साथ-साथ शरीर के स्वस्थ कोषों को भी नष्ट करती हैं, जबकि दर्जनों अन्य पद्धतियों में से और किसी में भी ऐसा नहीं होता। इसकी दवाएं हमारी जीवनी शक्ति, रोगनिरोधक शक्ति को क्षीण करती जाती हैं| एलोपैथी की दवाएं केवल रोग के लक्षणों को दबाती हैं, रोग को ठीक नहीं करती ; curative नहीं palliative हैं। तभी तो असाध्य माने जाने वाले रोगों में (मधुमेह, हृदय रोग आदि) आजीवन दवा लेनी पड़ती है। आजीवन दवा खानी पड़े तो वह इलाज कैसा? इन दवाओं से दबाए गए रोग बाद में और अधिक उग्र होकर एक या अनेक रोगों के रूप में प्रकट होते एलोपैथिक दवाओं के सभी साल्ट (अपवाद एक भी नहीं) चय-अपचय प्रक्रिया को हानि पहुंचाने के अलावा भीतर एक विजातीय पदार्थ के रूप में जमा होते जाते हैं। यह संग्रह अपना विनाशक प्रभाव निरन्तर करता रहता है। वास्तव में विषाक्त प्रभाव वाली इन दवाओं के अधिकांश साल्ट ऐसे हैं, जिन्हें हमारा शरीर बाहन नहीं निकाल पाता। मूलभूत, सैद्धान्तिक और सबसे महत्व की बात यह है कि विश्व की एकमात्र चिकित्सा पद्धति ‘एलोपैथी’ है, जिसमें मूल प्राकृतिक पदार्थों से ‘एकल तत्व पृथकीकरण’ किया जाता है। ‘एकल तत्व पृथकीकरण’ का सिद्धान्त और प्रक्रिया को संसार की किसी चिकित्सा पद्धति ने आज तक नहीं अपनाया। पृथकीकरण (Single Salt Sagrigation) के सिद्धान्त के कारण ही एलोपैथी की सभी दवाएं विषाक्त प्रभाव वाली होती हैं। वनस्पति, जीवों या खनिजों में अनेक तत्वों (Salt or Alkaloid) का एक अत्यन्त वैज्ञानिक संतुलन परमसत्ता द्वारा बनाया गया है। एलोपैथी में उस सन्तुलन को तोड़कर एक अकेले एक्टिव इनर्गेडिएण्ट को अलग किया जाता है। यही वह भयावह भूल है जो एकमात्र एलोपैथी में की गई है। एक कमाल की बात इस पद्धति को चलाने वाले वैज्ञानिक समूह की भी है। केवल यही पद्धति है जिसको चलाने वाले एक माफिया के रूप में इसे चला रहे हैं और इसके लिए ऐलोपैथी में प्रचलित जांच, निदान, टैस्ट तकनिकें तथा सर्जरी अत्यंत उपयोगी तथा लाभदायक हैं। इनका सभी पैथियों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए।

संसार भर की अधिकांश चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में यह अपेक्षाकृत एक नई चिकित्सा पद्धति है। इसके बाद प्रारम्भ और विकसित हुई उल्लेखनीय चिकित्सा पद्धतियां होम्योपैथी, बायोकैमिक और बैच (या बाख) फ्लावर रैमेडी हैं।

अनेकों प्राचीन और कुछ नवीन चिकित्सा पद्धतियों ‘वैकल्पिक चिकित्सा’ की श्रेणी में गिनने का तर्कहीन प्रयास एलोपैथी द्वारा किया गया। ऐसा कहने का कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधर होना चाहिये था जो कि नहीं है यह जबरन आरोपित करने या अपनी बात थोपने की प्रवृत्ति भी एलोपैथी की एक विशेषता है। अन्यथा सैकड़ों, हजारों साल की सुस्थापित चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में एलोपैथी को वैकल्पिक चिकित्सा कहना तर्कसंगत होना चाहिए था।

प्रयोग कर रहे हैं। सच तो यह है कि दाव-पेच और षड्यंत्रों के दम पर ही एलोपैथिक दवाएं बाजार में टिकी हुई हैं। -अब तक अनगिनत लोग इन दवाओं के दुष्प्रभावों से मर चुके हैं। करोड़ों इनके दुष्प्रभावों का शिकार बन चुके और आज भी बन रहे हैं। यह श्रेय (या अपश्रेय) संसार की और किसी चिकित्सा परम्परा को प्राप्त नहीं। ज्ञातव्य है कि अकेले अमेरिका में ही इस चिकित्सा के कारण 2,25,000 लोग हर साल मर रहे हैं। (देखें mercola.कॉम) इली लिल्ली जैसी अनेकों मैगा कंपनियां करोड़ों डालर जुर्माना अपनी दवाओं के दुष्प्रभावों के लिए भर चुकी हैं। यह सब निरन्त चल रहा है, आज भी रुका नहीं है। ऐसा एक भी अन्य चिकित्सा पद्धति के साथ नहीं हुआ। एलोपैथी की अनेकों दवाएं प्राणघातक प्रभावों के कारण बाजार से वापिस लेनी ( withdraw ) पड़ी हैं। कमाल तो यह है कि ‘आरएनडी’ पर करोड़ों खर्चने और एक दवा के शोध पर 10 साल लगाने का दावा करने के बाद ऐसा हो रहा है। इतने घातक दुष्प्रभाव और दवाएं बंद करने तक की स्थिति आ जाए? यह ‘आरएनडी’ एक झूठ या आडम्बर नहीं तो और क्या है?कैंसर की चिकित्सा का सच बम्बई के दो एलोपैथिक चिकित्सकों ने कैंसर की चिकित्सा पर वर्षों अध्ययन करके एक पुस्तक लिखी है। लोपा मेहता और मनुकोठारी नामक चिकित्सकों द्वारा लिखी तथा इंग्लैण्ड से छपी इस पुस्तक में वे कहते हैं कि-

कैंसर की एलोपैथिक चिकित्सा करवाने वाले जल्दी मर जाते हैं और उनकी मृत्यु बड़ी कष्टकारक होती है। इसके विपरीत जो एलोपैथिक इलाज नहीं करवाते वे अधिक समय तक कष्ट रहित जीवन जीते हैं और उनकी मृत्यु भी कष्ट रहित होती है।

संसार के अनेकों इमानदार एलोपैथिक (एम. डी.) चिकित्सकों ने स्पष्ट लिखा है कि एलोपैथिक दवाएं, कीमोथिरैपी, रेडिएशन आदि से कैंसर का इलाज करने में कोई सच्चाई नहीं है। केवल धन का अपव्यय होता है और रोगी का जीवन अधिक कष्टपूर्ण तथा मृत्यु भी कष्टपूर्ण हो जाती है।

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About डॉ राजेश कपूर

डा, राजेश कपूर, पारम्परिक चिकित्सक। अनेक वनौषधियों पर खोज और प्रयोग, राष्ट्रीय-प्रान्तीय स्तर पर शोध पात्र प्रकाशन व वार्ताएं ; आयुर्वेद पर अनेक असाध्य रोगों की सरल-स्वदेशी तकनीकों की खोज। विश्वविद्यालयों से ग्रामों तक जैविक खेती पर वार्ताएं।" गवाक्ष भारती " मासिक पत्रिका का संम्पादन-प्रकाशन। आपात्त काल में नौ मास की जेल यात्रा। पठन-पाठन के क्षेत्र : पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियां, जैविक खेती, भारत का सही गौरवपूर्ण इतिहास, चिकित्सा जगत के षड़यंत्र, भारत पर छद्म आक्रमण। आजकल - अध्ययन, लेखन और औषधालय संचालन ।

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