2012 का प्रलय : अंधविश्वास के चपेट में आधुनिकता

pralay

2012 में दुनिया में प्रलय होगा और धरती समुद्र में समा जाएगी। जबसे यह खबर चली है लोग सहमें हुए है। लोगों में मौत का डर इस कदर समा चुका है कि लोग पूजापाठ और कर्मकाण्डों के द्वारा अपने पाप मिटाने की जुगत में लगे रहते है। ताकि प्रलय के वक्त उनके प्राण छोड़ दिया जाए। देश के तमाम बड़े ज्योतिषाचार्य और भविष्यवक्ताओं ने भी इस खबर पर अपनी मुहर लगाकर लोगों के माथे पर चिंता की लकीरे और बढ़ा दी है। हालांकि वैज्ञानिकों और कुछ ज्योतिषाचार्यों ने भी इसे मनगढ़ंत करार दिया और अपने शोधों से प्रलय जैसी संभावनाओं से इंकार किया है। बावजूद हमारे भारतवासी कितने भी अपने को आधुनिक समझते हो लेकिन अंधविश्वास के पीछे भागने की उनकी आदत नहीं गई है। जिसका लाभ हमारे देश के चंद पोंगापंथी बाबाओं ने अवश्य उठा रखा है। माथे पर चंदन की लकीरे घीसकर प्राचीन ग्रंथों के चंद दोहे यादकर और उसके उदाहरणों को देकर लोगों के धन ऐठने के नए-नए तरकीब आजमाने लगे है। लोगों को धन-दौलत और परिवार को मोह-माया का जंजाल बताकर इसके पीछे ज्यादा न भागने की सलाह देते रहते है (जो अच्छी बात है।) परन्तु उन धनों को समाज सेवा और धर्म में लगाने के बजाय अपने आश्रमों की तिजोरियां भरने में लगे हुए है। कई बाबाओं ने तो इतनी धन की उगाही कर रखी है कि उनके ज्यादातर पैसे शेयर मार्केंट, टीवी चैनलों, ज्वैलर्स की दुकानों और बड़े-बड़े कारखानों में लगे होते है। कई बाबा तो काले धन को सफेद बनाने का रैकेट भी धड़ल्ले से चला रहे है। कई बार सिर-फिरे खबरियां चैनलों के स्टिंग ओपरेशन में ऐसे बाबाओं का खुलासा भी हुआ लेकिन उनकी राजनीतिक पहुंच और लोगों के अंधविश्वासी आस्था भी इस सच्चे कुकृत्य को झूठा साबित करने में मदद पहूँचा देती है।
कुछ पत्रकार भी प्रलय जैसी घटना को सच समझने लगे और इसके पीछे देश की बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण असंतुलन और उसके तापमान में आमूल चूल वृद्धि के अलावा साम्प्रदायिक उन्माद, भ्रष्टाचार, समाज में फैली अराजकता, इंसानों का वैचारिक ह्रास और असहिष्णुता, गगन चुंबी मंहगाई, जंगलो की अंधाधुंध कटाई और कांक्रीट के बनते जंगलों को आधार मानकर उससे होने वाली समस्याओं को देखकर प्रलय की संभावनाओं को सच मान बैठे है। और अपनी खबरों, लेखों आदि में 2012 की प्रलय के संशय  को बरकरार बनाए रखते है।
    2012 की प्रलय को ध्यान में रखकर तो अब हॉलीवुड एक फिल्म भी बना चुकी है, जो सिनेमाघरों और सीडी के माध्यम से घर-घर तक पहुंचाने लगी है। लगता है विदेशी लोगों में भी यह डर पूरी तरह घर कर चुका है। क्योंकि भारत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण में अन्य देशो के मुकाबले काफी आगे रहा है। इसलिए हॉलीवुड की ये 2012 नाम की फिल्म उनके डर और माथे पर चिंताओं की झलक अवश्य दर्शाती है। या फिर हो सकता है कि इस फिल्म को सिर्फ व्यवसायिक दृष्टिकोण से बनाया गया हो। जो भी हो 2012 के प्रलय के इस चक्कर ने सबको घनचक्कर अवश्य बना रखा है।
महाप्रलय के इस फ़ंतासी पटकथा पर बातचीत के दौरान मेरठ के वास्तु, ज्योतिष, एवं आध्यात्म के चिन्तक सचिन शिवानन्द जी ने बताया कि 2012 में प्रलय जैसी घटना की कोई संभावना नहीं है, इस खबर के पीछे चंद बाबाओं और चैनलों की सांठ-गांठ है। जिन्होंने लोगों को मुर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया है। ताकि उन बाबाओं के आश्रमों और मठों में पूण्य कमाने के नाम पर दानदाताओं और भक्तों की भीड़ लगी रहे। साथ ही इस प्रकार की उलजलूल खबरों से खबरियां चैनलों की टीआरपी बढ़ जाए। आजकल भविष्य बताने वालो की फ़ौज टीवी से लेकर मोबाइल और इन्टरनेट तक छाई हुई है. उन्होंने लोगों को सुझाव दिया है कि वे ज्यादा से ज्यादा ऐसे पाखण्डी बाबाओं से बचे। हालांकि एक चिंता बढ़ाने वाली बात अवश्य है कि लोग जनसंख्या को लेकर उदासीन रवैया अपनायें हुए है। जिसकी वजह से देश में विभिन्न प्रकार की समस्याएं जैसे वैचारिक खोखलापन(पाप, असहिष्णुता, असभ्यता, लालच), पर्यावरण असंतुलन, प्रदुषण, जंगल एवं जीव-जन्तुओं का विनाश, खाद्यान्न संकट, भ्रष्टाचार, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद एवं जातिवाद आदि का संकट मंडरा रहा है।

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