देश में मंहगाई आज सातवें आसमान पर पहुच गया है. लोगो के थाल से दाल तो सरकार ने पहले ही हटा दिए. अब सरकार का इरादा चावल और आटे को भी गरीब के थालिओं से हटाने का है. वजह एक मात्र दिखाई देता है, सरकार देश से गरीबी मिटाना चाहती है और शायद ही ऐसा संभव हो पाए. इसलिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है, गरीबी मिटाने के लिए नहीं, बल्कि गरीबों को मिटाने के लिए. क्योंकि भारत के नागरिक लाख समझाने पर भी अपनी आबादी घटाने पर विचार नहीं कर रहे है. खासतौर से गरीब और अशिक्षित लोग जनसँख्या को लेकर आज भी पूरी तरह उदासीन है, आज देश भर में महंगाई के खिलाफ विपक्ष ने धरना-प्रदर्शन कर देश में बंद तो सफल अवश्य कर दिया लेकिन क्या इससे महंगाई जैसी समस्या का हल हो जायेगा ऐसा शायद ही संभव हो पाए.
महंगाई से त्रस्त आम जनता भले ही विपक्ष की बात मानकर एक दिन के लिए सड़क पर गाड़ी चलाना बंद कर दे, अपनी दुकानों की किवाड़ लगा दे या नौकरियों और अपने कामकाज पर जाना छोड़ दे, फिर भी सरकार कुछ नहीं करेगी ये तय है. क्योकि सरकार जानती है कि आम आदमी आज पूरी तरह विचलित स्थिति में है, वो अपने जीवकोपार्जन और घरेलु परेशानियों से इस कदर जुझ रहे है कि उन्हें सही गलत समझने की फुरसत ही नहीं होती। वह हर बड़ी बात आसानी से कुछ ही दिनों में भूल जाते है। उन्हें तो बस वर्तमान की चीजे याद रहती है। और भूतकाल के कारनामों पर पर्दा डालना कांग्रेस आसानी से जानती है। इसलिए तो हर चुनाव से पूर्व जनहित में देश की तीजोरी को खोल दिया जाता है। अंतिम बजट सत्र के दौरान इतने उपहार लोगों को बांट दिए जाते है कि लोग सारे द्वेष, सरकार के कामकाजो के प्रति खटाश सब भूल जाएंगे। और ऐसा एक बार नहीं सरकार ने हर बार यहीं किया है। यहां लोगों को वर्तमान में झाकने की आदत पड़ गई है और लोग इंसानियत पूरी तरह भूलते जा रहे हैं। अगर सरकार ने पहले जितने कुछ अच्छे कार्य किए हो वो उसे आसानी से भूल जाते है लेकिन वर्तमान में थोड़ी सी गलती हो जाए तो सारे पुण्य पाप में बदल जाते है। एक आम आदमी की इस सोच का ही नतीजा है कि पिछली राजग सरकार बहुदल होने के बावजूद अच्छा कार्य किया सरकारी कर्ज तोड़े। लोगों के सिर पर जो विश्वस्तरिय कर्जा का काला बादल छाया हुआ था उसे साफ तो नहीं किया लेकिन कम अवश्य कर दिया। परमाणु परिक्षण कर देश को विश्व के बड़े देशों में ला खड़ा किया। वह भी स्वालंबी बनाते हुए। लेकिन आम आदमी ने उन्हें क्या दिया प्याज के आसू। करगील का करारा जवाब देकर पाकिस्तान को झुकने के साथ-साथ विश्व के बीच आतंकवाद फैलाने वाला दोषी देश साबित किया हालांकि उन्होंने दोस्ती की बस चलाकर खाई को पांटने का काम अवश्य किया था। लेकिन कुत्ते की पुंछ टेढ़ी की टेढी। देश के हर कोने में बड़े बड़े राज्य मार्गों का निर्माण कराया जिससे की आज व्यवसाय, औद्योगिक ईकाईयों से लेकर आम आदमी के लिए यातायात को लेकर काफी सुविधा बढ़ी है। वाजपई सरकार ने इतने बड़े गठबंधन को सिर्फ चलाया बल्कि अलग-अलग पार्टियों के हितों के साथ देश हितों का भी बखुबी ध्यान रखा।
आम आदमी के लिए वाजपई सरकार ने सब कुछ किया खासतौर से मंहगाई पर भी अंकुश लगाए रखा। और उस रफतार से भी मंहगाई को बढ़ने नहीं दिया जिस रफतार से आज बढ़ाई जा रही है यूपीए कम कांग्रेस सरकार द्वारा। हां एक बड़ी गलती हुई वाजपई सरकार से कि उन्होंने जिस मुद्दे की वजह से चुनाव जीती और सत्ता तक पहुंचे उसे उन्होंने पूरा नहीं किया। यहीं कारण है कि पहले से नाराज मुसलमान के बाद हिन्दू वर्ग भी उनसे नाराज हो गया। लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि किसी भी चीज का निर्माण करने से कही ज्यादा तोड़ना आसान है। मंदिर हो या मस्जिद मुश्किल से किसी भी समुदाय को तोड़ने में 2 से 3 दिन लग सकते है या कहे तो दो से तीन घंटे लेकिन इसे बनाने में कम से कम 2-3 महिने अवश्य लग जाएगे। ऐसे में भला उनके एक पक्षिय मंदिर निर्माण के निर्णय से सरकार गीर जाती तो क्या मंदिर का निर्माण हो सकता था, नहीं। तो उन्हें आज तक इस बात का दोषी क्यों माना जा रहा है। दूसरी चीज जब आज की कांग्रेस सरकार 4 साल मंहगे शाषण देने के बाद अंतिम वर्षों में सस्ता अनाज उपलब्ध करा दे। ऐसे में आप क्या समझ सकते है कि व्यापारी वर्ग पर पूरी तरह से कांग्रेसीयों का दवाब कायम है ऐसे में वाजपेई सरकार के अंतिम वर्षों में व्यापारियों पर दवाब डालकर आम आदमी की वस्तुओं के दामों को बढ़ाकर यह स्थिति पैदा की गई होगी। जिससे लोग पिछले कामों को भूल जाए और आज की महंगाई याद रखे जैसा की 2003 के चुनाव में हुआ था। आम आदमी को सोचना पड़ेगा की राजनीति में ऐसे हथकंडे अपनाए जाते है। कहां भी गया राजनीति कोई आसाना खेल नहीं है और जिसे खेलना आम आदमी के बस का नही है। खासतौर से शरीफ आदमी की तो इसमें ऐंट्री ही नहीं है। सच बोलने वाला व्यक्ति यहां उपहास का साधन बन जाता है और झूठे व्यक्ति के सर पर हमेशा ताज लग जाता है, क्योंकि शरीफ आदमी के पास धन खर्चने, लोगों को दारू के लिए रूपय बांटने और वोट दवाब में डालने के लिए गुंडे नहीं होते।
यहां तक की शरीफ आदमी जात-पात और धर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकता। वह काम के लिए मांगता है लेकिन आज सच्चाई है कि वोट सबसे ज्यादा काम को लेकर नहीं कौम को लेकर दी जाती है। और इस गुनाह को एक समुदाय सालों से करता आ रहा है। इसलिए आज देश में कोई पिछड़ा हुआ है तो बस वहीं लोग है। ऐसा नहीं है कि ये लोग पैसे के लिए बिक जाते है। ये आज भी इस भ्रम जाल में फंसे हुए है कि देश में इनका कोई हितैशी है तो वो कांग्रेस है। मैं नहीं कहता की बीजेपी ही अच्छी पार्टी है। हमारा मकसद है कि आप अपने क्षेत्र, मोहल्ले, समाज से खुद ऐसा प्रतिनिधि चुने जो गांव, समाज, परिवार, क्षेत्र में सबसे ईमानदार और कार्य के प्रति कर्मठ और विश्वासी हो। ऐसे लोगों को सामने लाकर उसे चुनाव में खड़ा कर हर प्रकार से मदद पहुंचाए फिर वो चाहे किसी भी जात या धर्म का हो। उसमें इंसानियत होनी चाहिए। पत्रकारिता जगत इस पहल में कुछ कर सकती है। लेकिन उसे फुरसत कहां वातानुकुलित जिंदगीयां जीने से उन्हें सरकार विज्ञापन के रूप में इतनी मदद पहुंचा देती है कि वह सरकार के खिलाफ बोलने से बचने के लिए अपने खबरियां चैनलों में नए-नए फिल्मी गोसिप और मनोरंजनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत करती रहती है। वहीं अखबार वाले विपक्ष को कमजोर बनाने में लगे हुए है कभी मोदी प्रकरण उठा लेते है। कभी बीजेपी के आंतरिक कलह को इस कदर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और लोगों को सुनाने लगते है कि विपक्ष बेहद कमजोर हो चुका है।
कभी अखबार या खबरियां चैनलों ने यह दिखाने की कभी कोशिश नहीं कि देश के 543 सांसदों और हजारों विधायक अपने अपने क्षेत्र में किस तरह का काम कर रहे है। किन किन सांसदों पे काले धन स्वीस खाते में पड़े है, किन-किन राजनेताओं के बच्चे विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे है। इन शासक वर्ग के लोग जो देश चलाने का, गरीबी मिटाने का, और भारत को विश्व शक्ति बनाने का झूठा ख्वाब दिखाते है, कितनी आसानी से यहा की जनता की गाढ़ी कमाई चुसकर अमेरिका में बसने की तैयारी कर लेते है। जो लोग आज देश की आर्थिक नीतियों का संचालन करते है। और जिनके उपर महंगाई बढ़ाने या घटाने का जिम्मा है उनका भविष्य उनके बच्चों के रूप में अमेरिका बस चुका है। और इनकी उर्जा भी अमेरिकन नागरिकता पाने में लगी रहती है। फिर यह देश कैसे चल सकता है। जब देश को चलाने वालों में देश प्रेम ही नहीं बचा है। इस तरह के अंदरूनी विश्वासघात के प्रति मीडिया आंख फेरे खड़ी है। देश में नक्सली बढ़ रहे है, सैनिक मारे जा रहे है। लेकिन कभी ये सोचने या दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती की नक्सलियों जिन्हें सरकारी कर्मचारी समझकर मार रहा है उनके भी परिवार में कोई हैं। उनके पीछे भी कोई रोने वाला है। कभी ये सोचने की जरूरत नहीं पड़ी की नक्सली कभी नेताओं को निशाना क्यो नहीं बनाता। अगर विकास को लेकर नक्सली हिंसा करते है तो उस क्षेत्र का सांसद जिम्मेवार है तो उस सांसद पर क्यों नहीं हमला होता। आखिर उनका फंनडींग का जरिया क्या है? इतने आधुनिक हथियार उन्हें कहा से प्राप्त हो रहे है और इसके लिए उन्हें धन कहा से मिल रहा है? लेकिन पत्रकार जोखिम उठाने तैयार नहीं है वो तो वातानुकुलित कक्ष में बैठकर होम प्रोडक्ट खबरे तैयार कर बेचना ज्यादा पसंद करता हैं। कुछ लोग करना भी चाहते है तो ऐसे लोग जानते है कि हर एक्सक्लूसिव खबर का जुड़ाव सरकार या राजनीति से होता है। जिसका प्रसारण करना बेहद जोखिम भरा होता है क्योंकि हर चैनल का मालिक या तो कोई राजनेता होता है या ऐसे चैनलों में अब राजनीतिक लोगों के पैसे खुले या छुपे तौर पर लगे होते है। लेकिन फिर भी सांसदों के क्षेत्रों में किस प्रकार का काम हो रहा है वहां के लोग कितने खुशहाल है और किस दिक्कतों से गुजर रहे है। कभी दिखाना नहीं चाहते। हां आज जब महंगाई की मार झेल रही जनता की आवाज विपक्षी सड़को पर उठा रहे तो तब इन मीडिया वालों को जनता की थोड़ी बहुत दिक्कतों का बड़ा ख्याल हो आया है। और इसी मीडिया का दोगला चरित्र तो देखिए जब पिछले दिनों बढ़ती महंगाई के दौरान विपक्ष चुप था तब भी ये विपक्ष को ही कोसते हुए उसे कमजोर और निकम्मा साबित करने में लगे हुए थे। ऐसा लगता है कि भारतीय मीडिया का चरित्र सत्ता समर्पित हो चुका है।


narendra ji bhut khub, aapne jo kuch in dinon chal rhaa he voh sach likhne kaa sahas kiya he iske liyen aapko bdhaayi. is ladai men hm aapke sath hai. zarurat samjho to pukar ke dekh lena sath khde milenge. akhtar kha akela, kota rajasthan