आपरेशन ग्रीन हंट और किशनजी द्वारा वार्ता करो, नहीं तो शहरों पर धावा करेंगे जैसी खबरें मीडिया में भी छायी रही हैं। पहले भी नक्सली वारदातों या सशस्त्र बलों द्वारा उनके खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को मीडिया अच्छी तरजीह देती रही है। जब कहीं नरसंहार होते हैं या नक्सलवादियों की पकड़ धकड़, अखबारों या चैनलों पर प्रमुखता से खबरें नजर आती हैं। नहीं नजर आती हैं तो वह परिस्थितियां, स्थितियां या नक्सलियों के लिए सरकार द्वारा घोषित योजनाओं की रूपरेखा और उन तक इसे पहुंचाने के साधन या फिर नक्सलियों द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्यक्रम।
बिहार जैसे राज्य में जहां अरसे से नक्सलवाद एक प्रमुख समस्या रही है। संयुक्त बिहार में दक्षिण इसका गढ़ था। जो अब झारखंड में चला गया है। लेकिन अभी भी यहां का गया, औरंगाबाद, रोहतास, जहानाबाद, जमुई जैसे कई जिले नक्सलवाद से बुरी तरह प्रभावित हैं। बल्कि यह आज समूचे राज्य में पांव फैला चुका है।
जहां तक बिहार में मीडिया और नक्सलवाद का सवाल है। तो कभी कभी ऐसा लगता है कि जिस तरह से आज मीडिया बाजारवाद के गिरफ्त में आकर मूल कारणों या फिर अपने उद्देश्यों से भट गया है वहीं नक्सलवाद जैसे अतिगंभीर व संवेदनशील मसलों पर भी वह सचेत नहीं दिखता। नक्सलवाद के बढ़ते कारणों या फिर नक्सलवाद की ओर मुड़ रहे युवा वर्ग को मुख्यधारा में लाने के लिए चलाये जा रहे सरकारी कार्यक्रमों को व्यापकता के साथ मीडिया नहीं उठाती। हर खबर के पीछे आनन फानन में नक्सली हाथ बता देना मीडिया की जल्दबाजी और गैरजिम्मेदारी है। खगडिया नरसंहार इसका जीवंत उदाहरण है। घटना के पीछे मीडिया ने नक्सली हाथ बता डाला। संभावना तक व्यक्त नहीं की। जबकि सच्चाई यह थी कि घटना जातीय संघर्ष का परिणाम था, जिसमें कई लोगों की जान गई थी। स्थानीय प्रशासन भी इसमें नक्सलवाद का हाथ होने से इंकार करता रहा। बिहार सरकार ने मामले की जांच करवायी और यह साफ हुआ कि खगड़िया नरसंहार के पीछे नक्सली नहीं जातीय संषर्घ कारण था। मजेदार बात यह है कि मीडिया में कुछ ने तो अपनी गलती स्वीकारते हुए बाद में खबरों में सुधार कर दिया। जबकि कई ने नोटिस तक नहीं लिया। इसके अलावा हाल ही में नक्सल प्रभावित जहानाबाद जिले के शिवबिगहा से खबर आयी कि नक्सलियों ने एक भूपति के घर पर गोलाबारी कि जिससे उसके घर में आग लग गई। मीडिया ने भी इस खबर के पीछे नक्सली हाथ बता कर खबर चला दी। दूसरे दिन पुलिस प्रशासन ने खबर का खंडन किया और नक्सली हाथ से इंकार किया। दरअसल इस घटना के पीछे भी आपसी रंजिश का मामला था। कहने का तात्पर्य यह है कि बिना तहकीकात के खबर के पीछे नक्सली हाथ बता देने से नक्सली संगठन को ही कहीं न कहीं ‘‘प्रचार’’ के तहत फायदा होता है ? कई घटनाओं में देखा गया है कि नक्सली संगठन गांव या फिर सरकारी भवन आदि पर हमला करते हैं और वहां अपनी मांगों से संबंधित पोस्टर-पर्चा आदि छोड़ जाते हैं ताकि मीडिया में खबर बन सके। मंशा जाहिर है कि मीडिया का इस्तेमाल ?
ये तो हालिया उदाहरण हैं। आनन फानन में खबरें देने की ढेरों घटनाएं देखने को मिलती हैं। नरसंहार या आपसी संघर्ष में होने वाली वारदातों में मीडिया को सचेत रहने की जरूरत है। देखना होगा कि कोई भी बड़ी घटना को आनन फानन में मीडिया द्वारा नक्सली घटना करार देने से फायदा किसे हो रहा है ? नक्सल जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जल्दी में झूठी खबरें देने से मीडिया को परहेज करनी चाहिए।
दूसरी ओर नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने को लेकर केन्द्र व राज्य सरकार की ओर से कई जनोपयोगी कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। ताकि भटकाव को रोका जाये और खासकर युवा वर्ग को योजनाओं से जोड़ा जाये। इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर खबरें मीडिया में नहीं के बराबर दिखती है। हां, इसे लेकर सरकारी विज्ञापन भले ही मीडिया में दिख जाता है। जबकि इसके सकारात्मक पहलू को सामने लाना चाहिये ताकि दूसरों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़े।
सबसे अहम् मुद्दा है बिहार में या देश में कहीं भी कोई नक्सली क्यों बन जाता है ? इस पर गौर करें तो दो बातें सामने आती हैं। पहला कौन बनता है नक्सली ? कहीं भी धनाढ्य वर्ग का व्यक्ति नक्सली आंदोलनों में शामिल नहीं दिखता है। और इसी जवाब में इसके दूसरे सवाल कि कोई क्यों बन जाता है नक्सली का जवाब भी समाहित है। पिछड़े अविकसित क्षेत्र का वो इलाका जहां विकास तो क्या विकास की सरकारी योजनाओं की जानकारी तक लोगों से दूर है। जहां बेराजगारी, भूखमरी और मानसिक आर्थिक शोषण से जूझ रही लोगों के समस्याओं के समाधान का कोई विकल्प सामने नहीं दिखता है। ऐसे में ही नक्सली पैदा होते हैं। ऐसी परिस्थितियों को मीडिया द्वारा सामने लाने की जरूरत है। हालांकि अक्सर ही नक्सलियों द्वारा जबरन दूसरे को नक्सली गतिविधियों में शामिल करने की भी खबरें आती है। अगर ऐसा होता है तो क्यों? उसकी मजबूरी या उसको दी जा सकने वाली सरकारी मदद सामने नहीं आ पाते हैं।
और आखिर क्यों नहीं सफल हो पाते हैं इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं। वो कौन सी वजहें हैं कि विकास की धारा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने से पहले ही सूख जाती है। व्यवस्था के प्रति नक्सलियों के मन में पनप रहे विद्रोह को दबाने के लिए इन कारणों को बेहतर ढंग से सामने लाने की जरूरत है। जहां तक इन मुद्दों पर मीडिया का सवाल है तो वह तभी प्रभावी ढंग से सामने आता है जब नरसंहार जैसा कोई बड़ी वारदात होती है। यों तो मीडिया की टीम नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में घूमती रहती है। सषस्त्र बलों के साथ उनके अभियान की कवरिंग करने के लिए भी और माओवादी नेताओं के विषेष साक्षात्कार के लिए भी। उन्हें भी अपनी बात व्यवस्था तक पहुंचाने के लिए मीडिया की जरूरत रहती ही है। मीडिया और नक्सलियों द्वारा इस तरह एक दूसरे का इस्तेमाल करना पुराने समय से चलता आ रहा है।

