मीडिया ने जेसिका लाल, प्रियदर्शनी मट्टू, नीतीश कटारा मामले में न्याय दिलाने में जबरदस्त भूमिका अदा की और अब रुचिका-राठौर मामले को जिस तरह से उजागर किया है वह प्रयास अपने आप में सराहनीय है। यकीनन न्याय दिलाने की दिशा में मीडिया का यह प्रयास काबिले तारिफ है। वर्षो बाद समाज के दबंग व्यक्ति पर कानूनी शिकंजा कसा। इसके लिए मीडिया की दबिश को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। हालांकि रुचिका को न्याय मिले इसके लिए मीडिया ने जो गोलबंदी की, वह नयी बात नहीं है। इससे पहले भी जेसिका लाल हत्या, आरुषि कांड या फिर संजीव नंदा का मामला ही क्यों न हो मीडिया ने परत दर परत को पूरी ताकत लगा कर खोला। दोषी कानून के घेरे में आये। लेकिन वहीं मीडिया का दूसरा पक्ष छूट जाने से, सवाल उठना लाजमी है।
सवाल है, समाज के अंदर लो प्रोफाइल के लोगों या फिर दबे कुचले लोगों की आवाज में आवाज में मिलाकर मीडिया उस ताकत से सामने नहीं आता, जितना कि रुचिका, आरुषि जैसे हाई प्रोफाइल के मामले में आता है। देश भर में ऐसे सैकड़ों लो प्रोफाइल से जुड़े लोगों के मामले पड़े है। न्याय की आस में पीड़ितों की आंखें पथरा गई है। पिछले ही दिनों बिहार के सीवान जिले में एक दलित को कई दिनों तक पेड़ से बांध कर रखा गया और उस पर जुल्म ढाहे गये। मीडिया में खबर तब आयी जब महादलित आयोग के एक सदस्य ने खबर की ओर मीडिया का ध्यान आकर्षित कराया। मीडिया में लो प्रोफाइल की खबरे आती जरूर हैं लेकिन वह फ्लैश की तरह, यानी कब आती और कब चली जाती है, लोगों को पता भी नहीं चलता। सामंती समाज में रुचिका की तरह कई रुचिका छेड़छाड़ की शिकार होती रहती है। बलात्कार के बाद हत्या या फिर जुल्म सितम का अमानवीय कहर। समाज के दबंग खुलेआम आतंक मचा रहे है। यहां, एक महत्वपूर्ण बात यह कि आज मीडिया चाहे वह प्रिंट हो या खबरिया चैनल उन पर जिस तरह से बाजार हावी है, उससे खबरों को परोसने का मापदंड भी बदल चुका है। एक दूसरे को पछाड़ने और टीआरपी के खेल में चैके छक्के लगाने वाला मीडिया हाई प्रोफाइल की गिरफ्त में है। अंतिम कतार में खडे किसी सुदूरवर्ती गांव में भूख, कालाजार और डायरिया जैसी बीमारियों से हो रही मौत, आज मीडिया के लिए खबर नहीं है। ज्यादातर खबरिया चैनल ऐसी खबरों से परहेज करते हैं। जवाब साफ है मरने वाले लोग लो-प्रोफाइल के जो हैं? कमिशनर साहब का कुत्ता गुम हो जाये या फिर बिल्ली छज्जे पर चढ़ जाये तो चैनलों के लिए ब्रेकिंग खबर बनती है। स्वाईन फ्लू की चपेट में मंत्री या संतरी आ जाये तो फिर देखिये खबर को दिखाने के मामले में मीडिया का कमाल, वहीं एक गरीब इसकी चपेट में आ जाये तो उसे ऐसे दिखायेगे मानो उन लोगों ने कोई अपराध किया हो। ऐसा ही कुछ पिछले दिनों बिहार में देखने को मिला था। स्वाईन फ्लू के संभावित पांच मजदूर जब बक्सर ट्रेन से बक्सर आये तो उन्हें मीडिया ने ऐसे दिखाया जैसे कोई बड़ा अपराध कर वे आये हो वहीं, स्वाईन फ्लू से पीड़ित एक बड़े अधिकारी की खबर तो आयी लेकिन वह सामने नहीं आये। हाई व लो प्रोफाइल की गिरफ्त में मीडिया का चेहरा देखने को मिलता है। खासकर दलित, पिछड़ा और दबे कुचले लोगों के साथ मीडिया का नजरिया एक तरफा है। कालू राम की बेटी कजरी के साथ गांव के दबंगों द्वारा छेड़छाड़ और विरोध करने पर मार पीट कर उन्हें गांव से भगा देने की खबर कई दिनों के बाद अखबार के अंदर के पेज में कोने में कहीं खबर बन जाती है। जबकि खबरिया चैनल नोटिस तक नहीं लेते। वहीं किसी हाई प्रोफाइल के साथ हो तो देखिए मीडिया की तत्परता। जाहिर है मीडिया को गंदी और तंग बस्तियों में रहने वाले दबे कुचले लोगों का विजुअल दिखाने होंगे। ऐसे में मीडिया की टी आर पी का मीटर डाउन हो जायेगा। क्योंकि मापदण्ड बन चुका है कि यदि टी आर पी बेहतर लेनी है तो स्क्रीन पर हाई प्रोफाइल लोगों को दिखाओ। पोस कलोनी का कोई बच्चा बीमार हो जाये तो खबर टी.वी. चैनलों के लिए बड़ी खबर बन जाती है भले ही किसी सुदूर गांव या फिर मलीन बस्ती में कोई गरीब का बच्चा डायरिया से मर रहा हो तो वह खबर दब जाती है। हाई प्रोफाइल स्कूल में बच्चे के साथ कोई घटना घट जाये तो उसके पैरेंटस की चीखों से टी.वी. स्क्रीन हिल जाता है। बच्चों की खूबसूरत मम्मियों की रोते हुए बाइट लेने के लिए रिपोटर्स की भीड़ लग जाती है। वहीं लो प्रोफाइल के स्कूलों के बच्चों के साथ कुछ हो जाये या कभी कभार टीवी चैनलों पर मध्याह्नन् भोजन खाने से बीमार पड़े बच्चों की खबरें दिखती भी हैं तो उसके लिए खाने में छिपकिली या कीड़े-मकोड़े का गिरना जरूरी है। उन गरीब बच्चों की मम्मियों को रोते हुए या फिर अस्पताल पहुंचते बच्चों को नहीं दिखाया जाता है। पूरा मामला हाई लो पर अटक जाता है। टीआरपी खेल के महारथी मानते है कि टी.वी. स्क्रीन पर हाई प्रोफाइल लोगों को दिखाओ, तो बाजार बनेगा। धूल धूसरित, नाक से बहता पानी, चेहरे पर मखियों की भन भनाहट से लथपथ चेहरों को दिखाने से टीवी स्क्रीन शायद मलीन हो जाये ? सच तो यह है कि बाजारवाद है इसके पीछे। हाई प्रोफाइल के लोग देश-समाज की नीति व रणनीति तय करते हैं ? गरीब गुरबा तो सिर्फ अपने मत का प्रयोग ? बाजार-विचार उनसे नहीं चलता। अब बाबा साहेब डा. भीम राव अम्बेदकर को ही लें, कितने टीवी चैनल उनके विचार को प्रचारित करते हैं ? जबकि दूसरे बाबाओं से चैनल वाले पटे रहते है। जाहिर है बाबा साहेब के विचार में बाजार नहीं है जबकि अन्य दूसरे बाबाओं के विचार में बाजार ही सोच है। कुल मिला कर बाजारवाद ही सामने आता है ऐसे में मीडिया को उपर उठ कर सोचना होगा और समाज को एक ही आईने से देखना होगा।


satik our satya.aapne bahut acchi baat kahi hai.ऐसे में मीडिया को उपर उठ कर सोचना होगा और समाज को एक ही आईने से देखना होगा।
arvind jee ki baat se sahamat hu …media ko mission par chalana hoo ga