पंडिताईन बुढिया पगला गई है

सुभाषचंद्र बोस ने एक बार कहा था कि जीवन में कोई चीज़ इतनी हानिकारक और ख़तरनाक नहीं जितना डांवांडोल स्थिति में रहना । आज विभिन्न चैनलों पर जो धारावाहिक प्रसारित किये जा रहे , मूल रूप से इतने डांवांडोल स्थिति में है की आज समाज को उनसे एक बडा खतरा उत्पन्न होता दिखाई दे रहा है । अलग-अलग चैनल जो आज दर्शकों को मनोरंजन के नाम पर परोस रहे, उनमे मनोरंजन से ज्यादा सांस्कृतिक विकार नजर आने लगा है । आज हर बडा चैनल एक दूसरे की नकल उतारने पर आमदा है । एक ही तरह की कहानियों को ही हम अलग अलग रूपों मे देखते है ।

आज जितनें भी सीरियल आते है, आप एक बात इन सभी मे ये पाएंगे की यहां शादी-विवाह का जमकर माखोल उडाया जाता । हर सीरियल मे शादी की तैयारी बडे जोर शोर से होती दिखाई जाती है. मगर ऐन मौके पर सब गुड-गोबर होता दिखाया जाता है । और लगभग हर सीरियल में कमोबेश यही हाल होता दिखाया जाता है । आखिर ये सीरियल बनाने वाले इस तरह की कहानियों के द्वारा समाज को क्या सन्देश देने का प्रयास करते है ? आज टेलीविजन का प्रसार घर घर तक हो चुका है और ये भी कहना गलत नही होगा की इसका असर भी लोगों की सोच पर व्यापक तरीके से पड रहा है । तब ऐसे मे लोगों को मनोरंजन के नाम मे ऐसी नकारात्मक चीजों को एक लगातर परोसना कहां तक जायज है ?

मनुस्मॄति मे कहा गया है की जहां स्त्रियों को मान दिया जाता है तथा उनकी पूजा होती है वहां देवताओं का निवास रहता है | परन्तु जहां स्त्रियों की निंदा होती है तथा उनका सम्मान नही किया जाता वहां कोई भी कार्य सफल नही होता | इन सीरियलों मे नारी उत्थान की बातें तो बहुत बडी-बडी की जाती है, पर उसके ओट मे दिखाया क्या जाता है …. हर जगह नारी का शोषण और उसपर अत्याचार की पराकाष्ठा । अभी हाल ही मे एक चैनल पर दिखाए जा रहे सीरियल “न आना इस देश लाडो” मे तो हद ही कर दिया गया । सीरियल की प्रमुख पात्र अम्मा जी अपने छोटे बेटे को ये आदेश देती नजर आती है की वो अपनी बडी भाभी के साथ शारीरिक संबंध बनाकर उसे गर्भवती बनाए ताकि जो कमी उसके बडे बेटे मे है, वो समाज के सामने कभी खुल कर नही आ सके ।

रावण जब बलपूर्वक सीता माता को ले जा रहा था तभी सीता माता ने अपने कुछ आभरण इस आशा से गिराए थे कि श्रीराम उन्हे देखकर उन तक पहुंच सके | यही आभरण लक्ष्मण को श्रीराम ने पहचानने के लिए कहा | तब लक्ष्मण ने कहा “ मैं इन कुण्डलों तथा बाजूबंद को तो नही पहचान सकता | परन्तु नित्य उनके चरण स्पर्श करते रहने कारण यह नुपूर उनके ही है यह मैं निश्चय से कह सकता हूं | ये सोचने वाली बात हो जाती है की कहां हमारा भारतीय संस्कार हमें सीता-लक्षमण के मां-बेटे वाले पवित्र रिश्तों के विषय मे शिक्षा देता है और कहां आज उसी भारतीय संस्कार में इस तरह के ओछे विषय परोसे जा रहे है । अगर कोई चीज थोडी खराब हो रही है तो निश्चित तौर पर उसे बचाने का प्रयास करना चाहिए ना की उसे और ज्यादा विकृत कर अपने जेब भरने का प्रयास करना चाहिए ।

आज कल कुछ ऐसे सीरियल भी बनने की परम्परा चल पडी है जहां किसी जाति विशेष पर खुल कर कोई भी बात कही जा रही है । ये निश्चित रूप से एक विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकती है । कलर्स पर दिखाए जाने वाला सीरियल “ये प्यार ना होगा कम” और स्टार प्लस पर दिखाए जाने वाला सीरियल “प्रतिज्ञा” मे खुलकर जाति विशेष से सम्बंधित ऐसी बाते कही जा रही है जो कही ना कही समाज मे एक बडी जातिय खाई खोदने का काम कर देंगी । इस तरह की कहानियों को लिखने वाले क्या भारत की जातिय स्थिति से अनभिज्ञ है ? क्यूं वो इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को इतने घटिया तरीके से पेश करने पर उतारू रहते है ? आज कही इस सीरियल का असर दो जातियों के संबंध को बिगाड कर रख दे तो समाज से आप क्या कहेंगें ? आपके सीरियल के शुरूआत मे लिखे पचास शब्द क्या आपको किसी भी हद तक जाने की अनुमति प्रदान कर देते है ? आज जहाँ जातिवाद से मुक्त समाज की परिकल्प्ना की जा रही है वहां आप क्या संदेश देने का प्रयास कर रहे है ?

आपको अगर इनमे प्यार पैदा करने की इतनी ही चाहत है तो सकारात्मक तरीके को अपनाइये … क्यूं नकारात्मक तरीके ही आपको पसन्द आते है ? ऊल-जलूल प्रसंगो और निकृष्ट श्रेणी की जातिगत संवादों के जरिये क्या आपका सीरियल समाज को सही दिशा देने मे कारगर हो जाएगा ? आप जब तक नकारात्मक से सकारात्मक बनने का प्रयास करेंगे तब तक तो बहुत कुछ बिगड जाएगा । ऐसे मे आप अपने किस ध्येय को प्राप्त होता पाएंगे ? समझ मे नही आता की हमारे यहां सेंसर बोर्ड ऐसे गंभीर मुद्दों पर अभी तक कोई कडा रूख क्यों नही अपना रही है ?

कहते हैं की शुद्ध बुद्धि निश्चय ही उस कामधेनु जैसी है जो वह धन-धान्य पैदा करती है; आने वाली आफतों से बचाती है; यश और कीर्ति रूपी दूध से मलिनता को धो डालती है; और दूसरों को अपने पवित्र संस्कारों से पवित्र करती है। मगर आज के टेलीविजन सीरियल जिस तरह से लोगों की बुद्धि अशुद्ध करने पर तुली हुई है, आने वाले समय मे इसके प्रभाव अच्छे तो नजर बिलकुल भी नही आ रहे है । विश्व के सर्वोत्कॄष्ट कथनों और विचारों का ज्ञान ही संस्कृति है । और् संस्कृति को तहस नहस कर देने पर तुले ऐसेटेलीविजन सीरियल का आज जोर शोर से विरोध करने की आवश्यक्ता है । कहा जाता रहा है की शब्द विचारों के वाहक हैं । तो क्या आज-कल सीरियल लिखने वालों के विचार सभ्यता एवं संस्कृति को हिला कर रख देने वाले होते जा रहे है ?

आज जिस तरह की भाषा का प्रयोग टेलीविजन सीरियल मे दिखाया जाता है, वो भी कम निंदनीय नही है ? “ऊ ललवा की बेटी”, “बंगालियों ने हमारा धर्म-भष्ट कर दिया”, “पंडिताईन बुढिया पगला गई है”, “हम ठाकुर है ..लाला को रगड कर रख देंगे” जैसे संवाद आज आये दिन इन टेलीविजन सीरियल मे सुनने को मिलते रहते है । क्या इस तरह से किसी भी जाति को लक्ष्य करके संवाद लिखना ही आज का फैशन बन गया है ? कहते है की किसी राष्ट्र की संस्कृति और पहचान को नष्ट करने का सुनिश्चित तरीका है, उसकी भाषा को हीन बना देना । और साथ ही साथ ये भी है की यदि विचार भाषा को भ्रष्ट करते है तो भाषा भी विचारों को भ्रष्ट कर सकती है । आज के टेलीविजनसीरियल को देखकर तो यही लगता है की इस तरह के सीरियल के जो भी लेखक है वो भ्रष्ट विचार के साथ लेखन करते है और इसका नतीजा ये हो रहा है की इनकी भाषा भी भ्रष्ट होती जा रही है । आने वाले समय मे इनके भ्रष्ट भाषा का असर अगर समाज के विचारों को भ्रष्ट करता दिखाई देने लगे तो ये कोई बडी बात नही होगी ।

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