दस टकिये पत्रकारों का दर्द

दूसरों के दुखःदर्द व जुल्म सितम के लिए रोजाना लड़ाई लड़ने वाले कलम के सिपाहियों के हक के लिए कोई खड़ा नहीं दिखता है। समाज में व्याप्त बराबरी-गैरबराबरी से पत्रकारों को भी दो-चार होना पड़ता है। खास तौर से उनकी माली स्थिति पर नजर डाले तो एक ऐसा बराबरी-गैरबराबरी सामने आता है जो चैंकाता तो है ही साथ ही सोचने के लिए मजबूर भी करता है। सवाल है मीडिया में काम करने वाले कस्बा से लेकर महानगर तक के पत्रकारों की माली स्थिति का ? और उनके साथ जो शोषण हो रहा है उसके पक्ष में खड़ा होने का ? जहां एक पत्रकार दस से बारह घण्टे काम करता है और एवज में एक सरकारी आदेशपाल से भी कम तनख्वाह पाता है।

मीडिया हाउसों में कार्यरत मीडियाकर्मी जहां एक ओर मीडिया के चकाचैंध ग्लैमर से प्रभावित हैं। वहीं एक ऐसा वर्ग भी है जो अखबार में काम करते हुए जीने के लिए संघर्ष कर रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि जहां एक ओर मीडियाकर्मियों को दस हजार से एक लाख तनख्वाह मिलती है तो वहीं ऐसे भी मीडियाकर्मी है जिन्हें 15 सौ रुपये महीने पर सुबह से देर शाम तक खबरों के पीछे भागना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि जैसा काम वैसा दाम की परिपाटी मीडिया हाउसों में कुलाचे मार रहा है। अनुभव और नाम के सहारे हजारों की तनख्वाह पाने वाला बड़ा पत्रकार भी उतना ही श्रम करता है जितना एक आम पत्रकार। बल्कि मुफ्सिल का पत्रकार तो और ही ज्यादा काम करता है। मुफ्सिल में घटने वाली सुबह की खबर पर वह लगातर बना रहता है। उसे डाक संस्करण से लेकर देर रात के संस्करण के लिए खबर को डेवलप कर लगातार भेजना पड़ता है।

पत्रकारों के बीच एक सामान वेतन नहीं हो सकता लेकिन जिंदगी जीने के लिए जितना चाहिये वह तो मिलनी ही चाहिये? श्रमजीवी पत्रकारों के वेतन को लेकर सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर प्रयास चले, लेकिन मीडिया हाउस के मालिकों ने नौकरी की परिभाषा ही बदल दी। संपादक हो या पत्रकार अमूमन सभी की बहाली अब अनुबंध के आधार पर हो रही है। जब इच्छा हुई रख लिया और निकाल दिया। वहीं बड़े नाम इसका फायदा भी उठा रहे हैं। जहां दूसरे मीडिया हाउस ने ज्यादा पैसे दिये, तुंरत पहले को छोड़, दूसरे को पकड़ लिया। वहीं सबसे बुरा हाल निचले स्तर के पत्रकारों का है वे हमेषा हासिये पर रहते हैं। मजेदार बात यह है कि अब मीडिया हाउस जब किसी को अपने यहाँ रखता है तो उससे एक बौंड भरवाता है जिसमें उसका पेशा पत्रकारिता नहीं बल्कि खेती बाड़ी, व्यवसाय आदि भरवाया जाता है।

दूसरों के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्वयं पत्रकार अपनी आवाज उठाने से वंचित रह जाते हैं ? देखा जाये तो पत्रकारों की जिंदगी रोज संघर्षों से भरी है। अमूमन हर मीडिया हाउसों द्वारा पत्रकारों का आर्थिक और शारीरिक शोषण जारी है। लेकिन विरोध की गुंज सुनाई नहीं पड़ती है। सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक शोषण का है। चैंकने वाला तथ्य यह है कि छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में 15 सौ रूपये के मासिक पर पत्रकारों से 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है। यहीं नहीं उन पत्रकारों के पास मीडिया हाउस द्वारा कोई अनुबंध पत्र / नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता है। प्रबंधन की मर्जी जब नौकरी पर रखे या जब चाहे नौकरी से निकाल दे। भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह मास्टर रौल जैसा है। महीने के आखिर में एक मास्टर रौल पर हस्ताक्षर करवाया जाता है और भुगतान के बाद उसे फाड़कर फेंक दिया जाता है। वेतन के मामले में पीड़ित कलम के सिपाहियों का हाल सरकारी आदेशपालों से भी बुरा है।

देश के राज्यों में अधिकांश युवा पत्रकार अपने कैरियर की शुरुआत मामूली सी तनख्वाह 1500 रुपये पर करते हैं। अगर देखा जाए तो दिहाड़ी मजदूरों को जितनी मजदूरी एक महीने में दी जाती है, उससे कम पत्रकारों को दी जाती है। बिहार से प्रकाशित कई अखबारों में कमोवेश स्थिति ऐसी ही है। वहीं कस्बाई पत्रकारों को अखबार मीडिया हाउस की ओर से अधिकतम 3000 रुपये प्रति माह दिये जाते हैं। जबकि बड़े पैमाने पर हजार 12 सौ रूपये मासिक पर रखा जाता है। उन्हें समाचार संकलन के अलावा अखबार के लिए विज्ञापन भी जुटाना होता है। पहले सेंटीमीटर या कालम के हिसाब से भुगतान दिया जाता था लेकिन अब प्रति खबर या मासिक भुगतान किया जाता है। बिहार के कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों ने बताया कि अखबार को आंदोलन, बदलाव आदि का नारा देने वाले बड़े समाचार पत्र समूह द्वारा एक स्ट्रींगर को प्रति समाचार 10 या 12 रु. दिये जाते हैं, चाहे खबर एक कालम की हो या चार कालम की। भुगतान तय रहता हैं वही 10 या 12 रूपये प्रति खबर। वहीं सुपर स्ट्रींगर को प्रति माह दो से तीन हजार दिया जाता है। जहां तक छोटे समाचार पत्र का सवाल है तो वे कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों को एक पैसा भुगतान नहीं करते हैं हां उनके समाचार जरूर छपते हैं। साथ ही उन्हें विज्ञापन लाने को कहा जाता है जिस पर कमीशन दिया जाता है। जबकि अखबार के मुख्य कार्यालयो में कार्यरत स्ट्रींगर और सुपर स्ट्रींगर को तीन हजार से 14 हजार रूपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। संपादक/प्रबंधक तनख्वाह तय करते हैं। वहीं चैंकाने वाला तथ्य यह है कि अमूमन हर अखबार कस्बा या छोटे शहरों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि रख लेते हैं उसे खबर के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। बल्कि वह जो विज्ञापन लाता है उस पर उसे कमीषन दिया जाता है। अखबार का संपादक/प्रबंधक जानते हैं कि वह बेगार पत्रकार अखबार के नाम पर अपनी दुकान चलायेगा ? जो उसकी मजबूरी बन जाती है आखिर दिन भर अखबार के लिये बेगार करेगा तो खायेगा क्या ? बिहार के सासाराम में एक छोटे समाचार पत्र के लिए रिपोर्टिंग करने वाला एक पत्रकार अपना नाम छुपाते हुए कहता हैं कि हालात यह है कि पैसा मिले या न मिले किसी मीडिया हाउस से जुड़ने के लिए पत्रकारों की लम्बी कतार है। बिना पैसे और विज्ञापन के कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार मौजूद है तो भला क्यों कोई मासिक वेतन पर किसी को रखे ? यही हाल देश के अन्य क्षेत्रों का है।

मजेदार बात यह है कि इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो पत्रकारों के हित के लिए लम्बी-चैड़ी बातें करते हैं। तर्क दिया जाता है कि पत्रकारिता के पेशे में ऐसे लोग आ गये है जो तिकड़मी, अनस्कील्ड और कहीं नौकरी नहीं लगी तो पत्रकार बन गये आदि आदि। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उन्हें रखता कौन है ? अखबार ही न ? और आज अखबार संपादक कम प्रबंधक अधिक चला रहा है।

प्रख्यात पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी ने भारतीय मीडिया द्वारा चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबर छापने की परिपाटी के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी थी, उसकी गुंज संसद और चुनाव आयोग में सुनाई दी है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान देशभर में ये गुंज सुनाई दी थी। अब संसद में भी इसकी गुंज सुनाई पड़ी है। राज्यसभा में सांसदों ने पैसे लेकर मीडिया द्वारा खबर छापने की खतरनाक बढ़ती प्रवृति के खिलाफ गंभीर चर्चा की। पैसे लेकर खबर छापने की मीडिया के सोच के खिलाफ केवल सांसद ही नहीं बल्कि पिछले ही दिनों पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने भी चिंता व्यक्त की और इसे गलत करार भी दिया। पैसे लेकर खबर छापने की प्रथा कोई नई नहीं है और इसपर हो-हल्ला तब मचा जब स्व. प्रभाष जोशी ने पूरे देश भर में मीडिया के इस सोच के प्रति जन आंदोलन चला दिया था। गत लोकसभा चुनाव और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान यह खुलकर सामने आ गया था। मीडिया ने पैसे लेकर खुलेआम खबर छापने का सिलसिला जारी रखा। यह हो-हल्ला लोकतंत्र के निर्माण में, लोकतंत्र के ही एक खंभे द्वारा किया गया। इस मसले पर पत्रकार भी दो खेमें में नजर आये।

मीडिया ने अपने को बाजारवाद के चंगुल में डालकर संभवतः मीडिया को व्यवसायिक नजरिये से परोस दिया। हो-हल्ला तो चुनाव के दरम्यिन नेताओं द्वारा अपने फेवर में पैसे देकर खबर को प्रकाशन प्रसारण से हुआ। लेकिन गुपचुप तरीके से नये-नये हथकंडों के जरिए खबर छापने/प्रसारित करने का सिलसिला जारी है। इसमें दस टकिया पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा है। यह चैंकाने वाला तथ्य है या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बिहार के कई जिलों में तैनात पत्रकारों से खबर छापने के बदले अखबारों की प्रतियां बिकवाई जाती है। इसमें बड़े मीडिया गु्रप शामिल हैं। बिहार के कई जिलों के अखबारों से जुड़े पत्रकारों ने बताया कि किसी भी कार्यक्रम या खबर को छापने के लिए संबंधित संस्था या व्यक्ति से पैसे न लेकर उससे खबर छापने के एवज में अखबार की प्रतियां खरीदने पर दवाब बनाया जाता है। अखबार द्वारा अपने संवाददाताओं पर विज्ञापन के लिए दबाव बनाने की बात पुरानी हो चुकी है लेकिन प्रतियां बिकवाने का नया फंडा निकाल लिया गया हैं। यानी खबर छपने के बदले अखबार की प्रतियां खरीदों ? बदले में अखबार मालिक अपनी तिजोरी भर रहे हैं और दस टकिया पत्रकार जहां था वहीं खड़ा हैं।

मीडिया में इस तरह की परिपाटी का जन्म लेना मीडिया के लिए भयावह है और जिस तरह की सोच मीडिया के अंदर बढ़ती जा रही है वह काफी खतरनाक है। पत्रकार को पत्रकार न रख, उसे सेल्स एजेंट के तौर पर मीडिया हाउस इस्तेमाल कर रहा है।

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