दलित सवालों को दबाती मीडिया

आरोप है कि दलित सवालों को मीडिया ने लगभग दरकिनार सा कर दिया है। सवाल दलित मुद्दों का हो या फिर साहित्य या फिर कोई अन्य मुद्दा। इसे लेकर दलित बुद्धिजीवियों के बीच सवाल उठने लगे है कि दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व मीडिया में नहीं मिल रहा है या नहीं। केवल दलित उत्पीड़न और बलात्कार को स्थान मिल रहा है। लेकिन वैचारिक सोच को दरकिनार करने की साजिश हो रही है। दलित विमर्श पर फोकस को लेकर अब कोई मीडिया पक्षधर नहीं दिखता है।

सीधी सी बात है उपभोक्तावादी संस्कृति में मीडिया का स्वरूप व्यापक हो चुका है। पत्रकारिता ‘‘मिशन है’’ शब्द का जमाना लद चुका है। साथ ही आज पत्रकारिता बाजारवाद की गिरफ्त में आकर एक खास वस्तु के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। खबर को मसालेदार बनाकर बेचने का सिलसिला जारी है। बाजारवाद से आम, खास होते मीडिया की मोह-माया से ‘‘कुछ’’ भी नहीं बच पाया है। हर खबर को ‘‘वस्तु’’ बना कर परोसने करने की होड़ के सामने दलित विमर्ष ही क्या मानवीय पहलू भी दूर हो चुके हैं।

जहां तक मीडिया में दलित मुद्दों को उचित प्रतिनिधित्व देने की बात है तो प्रश्न बाजारवाद का ही सामने आता है। जो दलित विचार से जुड़े हैं वही अलग से दलित विमर्श के नाम पर पत्र-पत्रिकाएं निकालकर दलित साहित्य, विमर्श आदि को जगह दे रहे हैं।

दलित साहित्यकार डा० पूरण सिंह मानते हैं कि मीडिया में दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना तो दूर उन्हें गिना तक नहीं जाता। मीडिया जिसे देश के विकास में चैथा स्तम्भ कहा जाता है उसके मालिक सवर्ण मानसिकता के लोग यह बिल्कुल स्वीकार नहीं करेंगे, जिन्होंने इस समाज का सदियों से शोषण, अपमान, तिरस्कार किया हो, उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जाये ? मैं तो यह कहूँगा कि मीडिया चाहे तो दलितों के यथार्थ को जनसामान्य तक पहुंचाने में सर्वोच्च भूमिका निभा सकती है। मीडिया के शीर्ष पर बैठे ये लोग जिस दिन मित्रता, शक्ति, विश्वमैत्री, पे्रम एवम् बन्धुत्व की भाषा बोलना सीख लेंगे उस दिन यह सवाल अप्रासंगिक हो जायेगा।

ज्यादातर दलित साहित्यकारों का मानना है कि देश की मीडिया राजनीति, अपराध, हीरो हीरोइन, सांप-बिल्ली-कुत्ते, अंधविश्वास आदि खबरों से पटे रहते हैं। अखबरों के रविवारीय व संपादकीय पृष्ठों में भी दलित सवालों और रचनाओं को कोई स्थान नहीं मिल रहा। विचार व साहित्य के नाम पर सवर्णों के साक्षात्कार, कहानियां, कविताएं ही आती हैं। और तो और रविवारी, परिशिष्टों में मीडिया ज्योतिष, वास्तुशास्त्र आदि की चर्चाओं से लबरेज रहती है। डा० .भीम राव अम्बेडकर, ज्योति बा फूले जैसे दलित विचारकों के विचार तो नहीं के बराबर आते हैं। अब तो अन्य महान व्यक्तियों को भी मीडिया तरजीह नहीं देती है। मीडिया के आकलन से साफ होता है कि इसने वैचारिक मुद्दों से मुंह मोड़ लिया है।

चर्चित दलित पत्रकार-साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय मानते है कि भारत की सवर्ण मीडिया आरम्भ से ही बेईमान और दोगले चरित्र की रही है। उसकी कथनी और करनी में अंतर है। सच तो यह है कि पिछले एक दशक से वे दलित सवालों को अपने हित के लिए उछालने में लगे हैं। ऐसा करते हुए वे दलित सवालों को प्रतिनिधित्व नहीं दे रहे हैं, बल्कि दलितों को राजनीतिज्ञों की तरह रिझाते हैं। वह मार्केट तलाश करते रहे हैं, जो उन्हें मिल भी रहा है। दलितों पर लिखते हुए उनका व्यापार खूब फल-फूल रहा है। दलित समाज के बुद्धिजीवियों को कम-से-कम यह समझना चाहिए। उन्हें अपने स्वतन्त्र मीडिया की स्थापना कर उसका विकास करना चाहिए।

वहीं कवि-पत्रकार कैलाश दहिया कहते हैं मीडिया दलित अत्याचारों को तो उठा रहा है, लेकिन दलितों का जो दृष्टिकोण है उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। दलित चाहता क्या है उस पर मीडिया बात नहीं करता। केवल आरक्षण के सवाल पर मीडिया को कोसने का काम करता रहता है। आरक्षण को सामाजिक स्तर पर नहीं देखता है बल्कि उसे आर्थिक आधार को ही सामने लाता है। दलितों के राजनीतिक सवाल को नहीं उठाता, बल्कि दलित नेतृत्व की बुराई ही करता रहता है। दलित राजनीति के सकारात्मक बातों को मीडिया निगल जाता है। कबीर व तुलसी के बीच में जो भेद है उसे मुद्दा नहीं बनाता। कबीर दलितों के सदगुरू है । जबकि तुलसी वर्ण व्यवस्था के पोषक। कहने का तात्पर्य यह है कि पूरी व्यवस्था ही सवर्णो के हाथ में है। ऐसे में मीडिया में दलितों और उनसे संबंधित मुद्दों की उपेक्षा कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे मीडिया में दलित सवाल नहीं उठ रहे हंै तो इसे कोसने की जरूरत नहीं है। क्योंकि मीडिया जो है वह सवर्णांे का है। अगर दलित मुद्दों को उठाने की बात है तो इसके लिए मानसिकता बदलने की जरूरत है। वैसे यह कहना जल्दबाजी होगी कि दलितों के लिए कोई अलग मीडिया बनायी जाए। हाँ , किसी भी मीडिया में दलितों का प्रतिनिधित्व साफ-साफ दिखाई देना चाहिए। जहां तक योग्यता की बात है तो यह कुतर्क के सिवाय कुछ नहीं है। जब अमेरिका में डायवर्सिटी का सिद्धांत लागू हो सकता है तो हमारे यहां क्यों नहीं? अंतर्मन में झांकने की जरूरत है। बस औपचारिकता पूरी करने के लिए दलित पर होते अत्याचारों को मीडिया में जगह दी जाती रही है वह भी मात्र व्यवसायिक नजरिये के तहत।

सच है, मीडिया पर एक सरसरी नजर डाली जाये या फिर हाल में मीडिया पर हुए शोध पर नजर टिकायी जाये तो साफ पता चलता है कि कब्जा सवर्णो का है। ऐसे मे न्याय की बात बेमानी लग सकती है, बल्कि आरक्षण या फिर दलित-पिछड़ो के मामले में मीडिया के दोगले चरित्र से लोग वाकिफ हो चुके है। ऐसे में मीडिया में दलित मुद्दों का केवल और केवल खबर ही बनता है। वहीं देखा जा सकता है कि दलितों पर अत्याचार से जुड़ी खबरों को जरूर स्थान दिया जा रहा है।

वहीं देश भर के जाने माने दलित चिंतक/लेखक-पत्रकारों ने मीडिया में दलित सवालों के उचित प्रतिनिधित्व पर नहीं होने पर नाखुश है। माताप्रसाद कहते है कि ‘‘प्रिन्ट मीडिया में दलित उत्पीड़न और बलात्कार को स्थान मिल रहा है यही स्थिति इलेक्ट्रानिक मीडिया की भी है, किन्तु दलित साहित्य को इनसे प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है ’’। वहीं जसवंत सिंह जनमेजय कहते हैं ‘‘कुछ समय पहले जैन टी.वी. दलित विमर्श पर फोकस दिखाती थी, अब कोई मीडिया पक्षधर नहीं है ’’। भरत सिंह बेचैन का मानना है कि ‘‘ मीडिया में भी दलित सवालों और दलित साहित्य को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता। मीडिया वाले तो दलित सवालों से और ज्यादा मुंह चुराते हैं, लेकिन मीडिया की यह मनमानी ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है दलित अब अपने अधिकारों के लिए सजग व आक्रामक होने लगे हैं ’’। जबकि जयप्रकाश वाल्मीकि कहते है ‘‘ राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर के समाचार-पत्र राजनीति, अपराध समाचारों, आदि से भरे रहते हैं। रविवारीय पृष्ठों में भी दलित सवालों और रचनाओं को कोई स्थान नहीं मिल रहा। साहित्य के नाम पर सवर्णों के साक्षात्कार, कहानियां, कविताएं ही आती हैं। इनके रविवारी, परिशिष्टों में बहुत से स्थानों पर ज्योतिष, वास्तुशास्त्र तथा स्वास्थ्य चचाएं ही होती है। महिला विमर्श भी न के बराबर हैं और जो दिया जाता है उसमें सौन्दर्य-निखार तथा रसोई के एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की विधियां देकर ही महिला-विमर्श की पूर्ति की जा रही है। कुल मिलाकर मीडिया में नारी और दलित विमर्श गायब हैं। वहीं डी.डी. राउत मानव कहते हैं‘‘ मीडिया में दलितों पर अत्याचार से जुड़ी खबरों को जरूर स्थान दिया जा रहा है लेकिन उनका फोलो-अप कभी नहीं किया जाता जो आवश्यक होना चाहिए ’’। गणेश रायबोले कहते है ‘‘मीडिया भी बाजार का ही एक अंग है और बाजार पैसा नाम के मिथ को एक पवित्र सत्य की तरह पेश करता है जहां एक बात जरा हटकर कहने की विनम्र इजाजत चाहता हूं ‘पैसा झूठ, हिंसा, अहंकार और सत्ता में पर्यायवाची शब्द है। हालांकि शब्दकोष ऐसा नहीं कहता। पैसा कोई धनात्मक शक्ति नहीं इसलिए इसका सृजन, रक्षण या पालन से कोई संबंध नहीं है। पैसे का संबंध भक्षण से है। दरअसल जीवन के साधनों से दूसरों को (इनमें पेड-पौधे, पशु-पक्षी बगैरह भी शामिल हो सकते हैं) वंचित करके कमजोर करना और इन वंचितों की कमजोरी को स्वयं के शक्तिशाली होने के प्रमाण के रूप में पेश कर सकना ही पैसा है। पहले इसको पहचानना मुश्किल था लेकिन यदि आज संचेत रूप से पर्यायवरण एवं प्रदूषण इसकी वजह से संकट में पड़ी धरती के कारणों को खोजेंगे तो पैसे के राज का पर्दाफाश को जायेगा और आप देखेंगे जिस शक्ति को पैसा कहा जा रहा है कही से भी धनात्मक नहीं है। वह विशुद्ध शत्रुत्व है। मीडिया चूंकि बाजार का ही एक अंग है इसलिए पैसा ही उसका लक्ष्य है। बाकी सब चीजें साधन मात्र हैं। ऐसे में उचित-अनुचित के आधार पर मीडिया में दलित साहित्य के प्रतिनिधित्व की बात बेमानी है। हां, मीडिया दलित साहित्य को कुछ स्पेस दे रहा है, क्योंकि वह उसकी मार्किट वेल्यू को पहचान रहा है ’’। श्रीमती देवी नागरानी मानती है कि ‘‘ अभिव्यक्ति की आजादी है इस आजाद देश में, जहां पर एक मुक्त समाज में, प्रेस का कर्तव्य है बिहना किसी भय, प्रभाव के लोगों को जानकारी देना। अब कौन अपना दायित्व पूरी निष्ठा के साथ निभाता है इसका कोई मापदंड तो नहीं है, हां अगर ऐसा ईमानदारी से किया जाये तो फिर मसअले कम होते जायंेगे और उनके बार-बार उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। पर प्रेस पर भी कई अंकुश होते होंगे। यही मानकर जो छापा जा रहा है उसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी भी एक मुद्दे को लेकर हम उसके विकास की ओर जाती दिशा में कितना आगे बढ़ रहे हैं ’’। मूलचंद सोनकर इसे खरिज करते हुए कहते है कि बिल्कुल नहीं। मीडिया दलित संबंधी किसी भी सवाल को कोई अहमियत नहीं देता। उल्टे रवैया हमेशा नकारात्मक रहता है’’। तेजपाल सिंह तेज इसे स्वीकारते है उनका मानना है कि मीडिया सरकारी हो या निजी पूरी तरह व्यावसायिक हो गया है उसे कल्याणकारी कार्यों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। मीडिया द्वारा दलित सवालों को उचित तो क्या, स्थान तक न दिये जाने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। मीडिया एक व्यावसायिक संस्था बनकर रह गयी है। उत्तरप्रदेश के पिछले चुनावों में मीडिया के अनुमान का हश्र हम देख चुके हैं। उसे दलित तो क्या आम जनता की समस्याओं से भी कोई सरोकार नहीं है। कर्मशील भारती मीडिया को निजी हाथों का खिलौना मानते है। रवि शंकर कहते है‘‘ ऐसा प्रतीत होता है कि न तो मीडिया ने ही दलित समस्याओं को उजागर करने में अधिक रूचि दिखाई और न ही दलित साहित्यकारों ने मीडिया का लाभ उठाने में अधिक रूचि दिखायी। दलित साहित्य आमतौर पर दलित समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं तक सिमटा पड़ा है। यही कारण है कि मीडिया में दलित सवालों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।

हालांकि कई दलित साहित्यकार-पत्रकार मानते हैं कि इन सब के पीछे बाजारवाद महत्वपूर्ण है। मीडिया चूंकि बाजार का ही एक अंग है इसलिए पैसा ही उसका लक्ष्य है। ऐसे में उचित-अनुचित के आधार पर मीडिया में दलित सवालों के प्रतिनिधित्व की बात बेमानी लगती है। इधर तेजी से यह बात उठने लगी है कि दलितों को अपनी बात आम-खास जनता तक पहुंचाने के लिए एक अदद मीडिया की अलग से जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो इस दिशा में एक सकारात्मक पहलू होगा, क्योंकि मीडिया के चरित्र से हर कोई वाकिफ है। कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

1 Comment

  • डा ० पुरुषोत्तम मीणा

    श्री संजय कुमार जी आप-दलित-शब्द का क्या अर्थ समझते हैं, यह तो आप ही बता सकते हैं, लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार बडे-बडे मंचों और सभाओं में दलित का अर्थ बतलाया जाता है, अजा, अजजा एवं पिछडे वर्गों का समूह। जिन्हें स्वर्गीय कांसीरामजी ने बहुजन समाज कहा है। जबकि बहुजन एवं दलित दोनों ही विचारों का नेतृत्व केवल अनुसूचित जाति द्वारा किया जाता रहा है। अजा में भी एक जाति विशेष द्वारा समस्त दलित संगठनों पर दशकों से एकछत्र कब्जा किया हुआ है। यहाँ तक कि अजा की कम संख्याबल वाली जातियों को इनके द्वारा शोषित और प्रताडित किया जाता रहता है। आदिवासियों को तो यह दलित नेतृत्व सर्वाधिक आसान किशार मानता है।

    देश में दलित साहित्य के नाम पर जितनी भी पत्रिकाएँ या अखबार या पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं या हो रही हैं, उनमें आदिवासी का जिक्र सन्दर्भ के सिवाय कहीं भी प्रमुखता से नहीं किया जाता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि दलित आदिवासियों को इस बात के लिये विवश करना चाहते हैं कि वे अपने आपको दलित मानें और दलित कहना शुरू करें। ऐसे दलित नेतृत्व एवं साहित्यकारों द्वारा सवर्ण मीडिया पर भेदभाव का आरोप लगाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
    जो लोग अपने ही वर्ग अजा की कमजोर जातियों का अपने समकक्ष नहीं बिठाना चाहते और अपने वर्ग से कमजोर वर्ग अजजा (आदिवासियों) को मान्यता ही नहीं देना चाहते, वे अन्य किसी पर आरोप लगाने का कोई भी नैतिक हक नहीं रखते हैं। इसके अलावा यह कहना कि दलित मीडिया की स्थापना की जाये, यह इन्ही लोगों का स्वार्थपूर्ण विचार है। यदि कभी गलती से दलित मीडिया की स्थापना हो भी गयी तो वह दिन अजा वर्ग की कम संख्याबल वाली जातियों एवं आदिवासियों के लिये सबसे दुखद दिन होगा।

    जहाँ तक सवर्ण मीडिया द्वारा दलित सरोकारों के बारे में स्थान नहीं दिये जाने का सावल है तो एक सीमा तक इसमें सच्चाई है, लेकिन ऐसा केवल दलितों के मामले में ही नहीं है। अनेक ऐसे वर्ग और समाज हैं, जिनके बारे में व्यावसायिक मीडिया ऐसा ही बर्ताव करता आ रहा है, लेकिन जिन कौमों में अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा और समर्पण का भाव है, उनको महत्व प्रदान करने के लिये मीडिया स्वतः ही विवश हो जाता है। इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है, राजस्थान में गूजर जाति का आन्दोलन, जिन्हें मीडिया ने पिछले एक वर्ष में उतना महत्व और स्थान प्रदान किया है, जितना आजादी के बाद से आज तक कुल मिलाकर दलितों को नहीं दिया गया होगा।

    आज की गलाकाट प्रतियोगिता में किसी को भी आसानी से कुछ भी नहीं मिल सकता है। कुछ भी हासिल करने के लिये कीमत चुकानी पडती है।

    एक बात और दलित साहित्य ब्रह्मा को कामान्ध और अपनी पुत्री से सम्भोग करने वाला बतलाकर सवर्ण मीडिया से समर्थन मांगना चाहता है। यह असम्भव है। आप अपनी ताकत अपने बल पर बनाओ और दलित संगठनों पर वर्षों से काबिज भ्रष्ट नेतृत्व को उखाड फेंको तो कुछ कर भी सकोगे। अन्यथा तो इस प्रकार हीनभावना से ग्रस्थ विचारधारा के सहारे कुछ भी कर पाना सम्भव नहीं है। दूसरों को गाली देने या कोसने के बजाय अपने आपके अन्दर झांक कर देखना अधिक उपयोगी होता है।
    -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इसमें वर्तमान में ४२८० आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८)
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