दलित सवालों को दबाती मीडिया

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  • डा ० पुरुषोत्तम मीणा

    श्री संजय कुमार जी आप-दलित-शब्द का क्या अर्थ समझते हैं, यह तो आप ही बता सकते हैं, लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार बडे-बडे मंचों और सभाओं में दलित का अर्थ बतलाया जाता है, अजा, अजजा एवं पिछडे वर्गों का समूह। जिन्हें स्वर्गीय कांसीरामजी ने बहुजन समाज कहा है। जबकि बहुजन एवं दलित दोनों ही विचारों का नेतृत्व केवल अनुसूचित जाति द्वारा किया जाता रहा है। अजा में भी एक जाति विशेष द्वारा समस्त दलित संगठनों पर दशकों से एकछत्र कब्जा किया हुआ है। यहाँ तक कि अजा की कम संख्याबल वाली जातियों को इनके द्वारा शोषित और प्रताडित किया जाता रहता है। आदिवासियों को तो यह दलित नेतृत्व सर्वाधिक आसान किशार मानता है।

    देश में दलित साहित्य के नाम पर जितनी भी पत्रिकाएँ या अखबार या पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं या हो रही हैं, उनमें आदिवासी का जिक्र सन्दर्भ के सिवाय कहीं भी प्रमुखता से नहीं किया जाता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि दलित आदिवासियों को इस बात के लिये विवश करना चाहते हैं कि वे अपने आपको दलित मानें और दलित कहना शुरू करें। ऐसे दलित नेतृत्व एवं साहित्यकारों द्वारा सवर्ण मीडिया पर भेदभाव का आरोप लगाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
    जो लोग अपने ही वर्ग अजा की कमजोर जातियों का अपने समकक्ष नहीं बिठाना चाहते और अपने वर्ग से कमजोर वर्ग अजजा (आदिवासियों) को मान्यता ही नहीं देना चाहते, वे अन्य किसी पर आरोप लगाने का कोई भी नैतिक हक नहीं रखते हैं। इसके अलावा यह कहना कि दलित मीडिया की स्थापना की जाये, यह इन्ही लोगों का स्वार्थपूर्ण विचार है। यदि कभी गलती से दलित मीडिया की स्थापना हो भी गयी तो वह दिन अजा वर्ग की कम संख्याबल वाली जातियों एवं आदिवासियों के लिये सबसे दुखद दिन होगा।

    जहाँ तक सवर्ण मीडिया द्वारा दलित सरोकारों के बारे में स्थान नहीं दिये जाने का सावल है तो एक सीमा तक इसमें सच्चाई है, लेकिन ऐसा केवल दलितों के मामले में ही नहीं है। अनेक ऐसे वर्ग और समाज हैं, जिनके बारे में व्यावसायिक मीडिया ऐसा ही बर्ताव करता आ रहा है, लेकिन जिन कौमों में अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा और समर्पण का भाव है, उनको महत्व प्रदान करने के लिये मीडिया स्वतः ही विवश हो जाता है। इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है, राजस्थान में गूजर जाति का आन्दोलन, जिन्हें मीडिया ने पिछले एक वर्ष में उतना महत्व और स्थान प्रदान किया है, जितना आजादी के बाद से आज तक कुल मिलाकर दलितों को नहीं दिया गया होगा।

    आज की गलाकाट प्रतियोगिता में किसी को भी आसानी से कुछ भी नहीं मिल सकता है। कुछ भी हासिल करने के लिये कीमत चुकानी पडती है।

    एक बात और दलित साहित्य ब्रह्मा को कामान्ध और अपनी पुत्री से सम्भोग करने वाला बतलाकर सवर्ण मीडिया से समर्थन मांगना चाहता है। यह असम्भव है। आप अपनी ताकत अपने बल पर बनाओ और दलित संगठनों पर वर्षों से काबिज भ्रष्ट नेतृत्व को उखाड फेंको तो कुछ कर भी सकोगे। अन्यथा तो इस प्रकार हीनभावना से ग्रस्थ विचारधारा के सहारे कुछ भी कर पाना सम्भव नहीं है। दूसरों को गाली देने या कोसने के बजाय अपने आपके अन्दर झांक कर देखना अधिक उपयोगी होता है।
    -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इसमें वर्तमान में ४२८० आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८)
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