कुछ ऐसा हो जो दिखे


आजकल टीवी की दुनिया में एक भूचाल आया हुआ है. कुछ समाचार चैनल के बड़े पत्रकार त्राहिमाम.त्राहिमाम कर रहे हैं. कोई अपनी खीज फेसबुक पर छोटे.छोटे टॉपिक डाल कर मिटा रहा है तो कुछ बड़े पत्रकार ब्लॉग पर पोस्ट लिखकर अपना दुख जाहिर कर रहे हैं .
ये भूचाल ये छटपटाहट इन पत्रकारों के एक बहुत छोटे से कुनबे में आया है. ऐसा नहीं है कि हर कोई त्रस्त है ,. कुछ लोग चिल्ला रहे हैं, चीख रहे हैं, लेकिन बाकी़ मज़े में हैं . जो जलज़ला आया हुआ है उसका नाम है टीआरपी. जी हां, यह वही साप्ताहिक रिपोर्ट हैं जिसके भरोसे हमारे टीवी वाले ज़िंदा हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से कुछेक पत्रकार को समाचार पर टीआरपी की मार अखरने लगी है. आज उन्हें इस बात का अफसोस हो रहा है कि वो समाचार के नाम पर नाटक दिखा रहे हैं और यह पत्रकारिता नहीं है . बिल्कुल सही कह रहे हैं पर एकाएक इस बात का अंदाजा कैसे हुआ ? इन लोगों की टीवी से तो समाचार बहुत पहले गायब हो गया था . लेकिन उस वक्त इनलोगों को न तो कोई ऐतराज था और न ही कोई अफसोस!
उस वक्त इन लोगों को टीआरपी से भी कोई एतराज नहीं था. इनकी खुमारी तो तब टूटी जब एक चैनल ने भूत.पिचास की खबरे दिखानी शुरु की . खबरों में से खबर निकालकर नाटक दिखाना शुरु किया तो उसकी टीआरपी बढ़ गई.इसके बाद तो सभी चैनल इसी ओर दौड़ने लगे. हर कोई दौड़ा टी आर पी की रेस में , तब किसी ने भी रुकने की और सोचने की जरुरत महसूस नहीं की. उस वक्त किसी को भी पत्रकारिता की सुध नहीं थी या कहें तो किसी ने भी इस ओर देखने की जरुरत नहीं समझी.
जब सब दौडते.दौड़ते थकने लगे, सांस फुलने लगी ,चेहरा गंदा होने लगा, आखों से गर्म हवाएं निकलने लगी , तो पत्रकारिता और खबर की याद आने लगी,
पिछले दिनों जिन पत्रकारों ने भी टीआरपी को कोसा है,पोस्ट या लेख लिखा है वो ऐसे टीवी चैनल के साथ जुड़े हैं जिसकी टीआरपी अच्छी नहीं है. इन बड़े पत्रकारों के चैनल्स ने वो सब कुछ किया जो टीआरपी बटोरने के लिए किया जाना चाहिए लेकिन फिर भी इनकी नैया हिचकोले खा रही है.

इस हालत में इन संपादकों को ऐसा लग रहा होगा कि ना इस पार के रहे न उस पार के ! तो ख्याल आया कि क्यों न टीआरपी को ही कोसा जाए ताकि लोगों की नजर में बेहतर पत्रकार की छवि बनी रहे . ये संपादक अपने लेख में लिख रहे हैं कि टीआरपी से नुकसान हो रहा है और इसे बंद किया जाना चाहिए तो ऐसी ही आवाज उन चैनलों के मालिकों की तरफ से भी आनी चाहिए जो अभी टीआरपी की मलाई खा रहे हैं. इस बारे में काम करने की जरुरत है. इन लिक्खाड़ समाचार संपादकों को चाहिए कि वो इस मसले पर अपनी बिरादरी में एक राय बनाएं और कुछ ठोस कदम उठाएं जो फेसबुकए ब्लॉग और अखबार के अलावा उनके चैनलों पर भी दिखे .

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