कभी गरीब आदमी का साक्षात्कार लिया क्या

आज तक कई साक्षात्कार पढ़-देख चुका। बड़े से बड़े पत्रकार द्वारा; छोटे से छोटे पत्रकार द्वारा लिए गए। बड़े से बड़े व्यक्तित्व का इंटरव्यू। पर एक आदमी का इंटरव्यू मैंने आज तक नहीं देखा। और वो है “गरीब आदमी” इसका कारण ? ‘हो सकता है “ये” (इंटरव्यू लेने वाले) “किसी गरीब” को आदमी ही न समझते हों’ इसीलिए आज तक उसका इंटरव्यू नहीं लिया। ये भी हो सकता है कि इन्हें गरीब आदमी का इंटरव्यू लेना सिखाया ही न गया हो….

साथियो मेरे मन में भी न जाने कैसे-कैसे विचार उठते रहते हैं, कभी-कभी व्यक्त करना मेरे लिए कठिन होता है । विचार भी ऐसे होते हैं कि उन्हें समझ कर बहुत से लोग भ्रमित हो जाते हैं । जैसे ; जो कम्युनिष्ट या नास्तिक हैं वह मुझे अपने जैसा ही समझने लगते हैं। और जो कम्युनिष्ट या नास्तिक नहीं हैं वह भी मुझे “यही” समझने लगते हैं। मेरे बहुत से कम्युनिष्ट मित्र कई बार कह चुके हैं कि भई तुम्हें तो हमारी पार्टी की सदस्यता लेनी चाहिए क्योंकि तुम्हारे विचार तो कम्युनिष्टों जैसे हैं ।

पर जब मैं उन्हें बताता हूँ कि मेरे ये विचार तो “अपने धर्म” के आधार पर बने हैं, अगर ये विचार तुम्हें कम्युनिष्टों के लगते हैं, तो; क्यों नहीं तुम भी विदेशी विचार धारा छोड़ कर स्वदेश की विचारधारा को अपनाते ? बस वहीँ वह लोग बगलें झाँकने लगते हैं । कई तो बेचारे जो “नए-नए मुल्ला”(कामरेड) बने हैं; ‘मुझे बदलने के चक्कर में बहस में उलझ जाते हैं और कुछ समय बाद धार्मिक बन जाते हैं’ या केवल नाम के लिए कम्युनिष्टों के साथ रह जाते हैं।

तो साहब मेरे मन में बहुत दिनों से एक बात घूम रही थी । सोचा सभी को बता दूँ । कि किसी गरीब आदमी का इंटरव्यू लिया जाये । तो जनाब हमने एक गरीब आदमी अपने स्तर पर ढूँढना शुरू किया । ढूँढना इसलिए पड़ा; कि ये भारत है कभी बेशक यहाँ अपने को गरीब कहना बुरा समझा जाता हो, पर आज तो हालात ये हैं कि सभी अपने गरीब कहते हैं। केवल कहते ही नहीं समझते भी हैं। अगर; पडोसी, ‘दोनों मिया-बीबी नौकरी करने वाले हों’ तो अड़ोसी अपने को गरीब समझता है। क्योंकि अकेला मिया ही कमाता है । इसी तरह जिसके पास एक कार है वह अपने को दो कार या बड़ी कार वाले से गरीब समझता है ….. अब मुझे वास्तविक गरीब चाहिए था इंटरव्यू के लिए । यहाँ पर मित्र का सुझाव काम आया कि जैसे सरकार ने गरीबी रेखा बना रखी है वैसे ही तुम अमीरी रेखा बना के उससे नीचे वालों को गरीब मान लो । तो साहब हमने दस हजार मासिक की आमदनी को अमीरी रेखा मान लिया तब कहीं गरीबों की छंटनी हुयी ।

लेकिन जिस गरीब को हम चाहते थे वह हमें फिर भी नहीं मिला। पर फिर हमें ध्यान आया कि सरकार ने जो सौ रुपल्ली रोज की दिहाड़ी तय कर रखी है; उससे ज्यादा गरीब और कौन होगा। हमने एक नरेगा-मंरेगा मजदूर ढूँढना शुरू किया, तो पाया; कि वह तो हमारे प्रश्नों को ही नहीं समझ पायेगा। क्या करें ? फिर हमारे मित्र ने सुझाया कि सब गरीबों को एक समझकर उनसे उनके समयानुकुल प्रश्न करो। और, जो उत्तर मिले उसे ही सब गरीबों का उत्तर समझो। ये विचार भी मुझे तो ठीक लगा ।

अब प्रश्नों की सूचि बनानी थी क्योंकि प्रश्न भी गरीबों के स्तर के होने चाहिए। उनसे फाईव स्टार होटलों, क्रिकेटरों, हीरो-हिरोईनों के सवाल तो कर नहीं सकते । हालाँकि; इन पर उनका अपना नजरिया होगा, पर फिर भी दुखी आदमी से दुःख के सम्बन्ध में ही सवाल किये जाते हैं, या सांत्वना दी जाती है। मैं समझता हूँ कि गरीब आदमी दुखी ही रहता है । तो जनाब सवालों की सूचि बनने लगी, क्योंकि सवाल तैयार होंगे तो जब जो गरीब मिलेगा उससे वह सवाल पूछ लेंगे।

दरअसल गरीबों के पास वास्तव में समय की कमी होती है। कई गरीबों को मैंने लालच भी दिया कि तुम्हारा साक्षात्कार लेकर कंप्यूटर में और पत्र-पत्रिकाओं में या टी.वी. में देंगे। पर वह अपने पास समय न होने का कारण बताकर चलते-चलते ही प्रश्नों का उत्तर दे देते हैं। इस लालच में भी नहीं आते कि टी.वी. या पत्र-पत्रिकाओं में दिखेंगे ।
पर साहब हमें सवालों की सूचि नहीं बनानी पड़ी क्योंकि पहले सवाल के बाद ही नए सवाल अपने आप बनते चले गए ।

पहला सवाल – उनकी जिंदगी कैसी चल रही है ? उत्तर- ‘अजी क्या जिंदगी हमारी ! जिंदगी तो उनकी होती है जो खाने-रहने की चिंता से मुक्त होते हैं। हम तो जब दिन भर रिक्शा खींचते हैं तब शाम की रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं। हैं ! हमारी क्या जिंदगी ? हमारे रिक्शे में बैठ कर लोग आईसक्रीम तो खायेंगे पचास रूपये की पर हमारा किराया देने में नंगापन दिखायेंगे हमसे तो अच्छे जानवर होते हैं’ हम तो एकदम झंड हो गए ! सोचा; कि कुछ ज्यादा ही गरीब मिल गया… खाते-पीते गरीब मिले तो उससे पूछेंगे ।

दूसरा सवाल -अपने नेता और सरकार से आपको क्या उम्मीद है ? (कुछ खाता-पिता गरीब था) उत्तर- सब स्साले अपना पूरा कर रहे हैं । देश की किसको पड़ी है, अपनी सुविधाएँ अपना वेतन तो जब मर्जी तब बढ़ा लेते है ऊपर से भ्रष्टाचार द्वारा अपनी दसियों पुश्तों के लिए जमा कर लेते हैं , जैसे इनकी आने वाली पीढियां अपाहिज पैदा होनी होंगी । भगवान् करे अपाहिज ही पैदा हों। ये ही स्साले गल-गलकर मरेंगे ।और… और ना जाने वह क्या-क्या बोलता चला गया। वैसे आप अंदाजा लगा सकते हैं ।
तीसरा सवाल – अब देश का भला कैसे हो सकता है ? उत्तर-अब भला नहीं हो सकता , कैसे हो सकता है ? अब तो भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, कार्यालयों में बैठे हरामगिरी, वेतन में एक सीमा से अधिक अंतर और इस तरह की बहुत सी अन्य बुराईयाँ हमारे नेताओं-अधिकारियों-कर्मचारियों के ही नहीं आम आदमी तक के खून में समा गयी है। अब कैसे सुधार हो सकता है ? (ये कुछ पढ़ा-लिखा बेरोजगार गरीब लग रहा था) हाँ ! सुधार का मौका था आजादी के समय , क्योंकि बहुत समय की गुलामी से आजाद हुए थे जो चाहते वह कर सकते थे पर हमारे उस समय के तथाकथित सर्वमान्य और आज तक पूजे जाने वाले नेताओं ने वह सब नहीं किया जो वास्तव में किया जाना चाहिए था।
अभी वह बोलना ही चाह रहा था कि मैंने टोक दिया और नया प्रश्न कर दिया, ये सोच कर कि ये कुछ पढ़ा लिखा गरीब लग रहा है ।प्रश्न- फिर भी कोई तो उपाय हो सकता है ? उत्तर – हाँ उपाय हो सकता है. अगर इतना बड़ा भूकंप आ जाये, कि; देश की बड़ी इमारतें, बड़े नेता, बड़े लोग, बड़े अधिकारी सभी का बीज भी न बचे । मतलब; प्रलय आ जाये । ऐसे में कुछ साधारण लोग भी मरेंगे पर भला तभी हो पायेगा। इन दुष्टों का संहार होना जरुरी है ।
सवाल और भी बहुत से थे पर एक विशेष बात पर दिल-दिमाग सब सुन्न हो गया, जब एक पढ़े लिखे गरीब ने एक बात समझाई उसने कहा; जितना “ये दुष्ट”देश से अपनी सेवाओं के बदले में वसूलते हैं ( दो सौ अट्ठावन लाख करोड़ रूपये विदेशी बैंकों में और साठ लाख करोड़ अपने देश में) शायद उससे कम में तो दाउद इब्राहीम अच्छी व्यवस्था चलाएगा । और उसका डर ! तो ऐसा कि हमारे कानून वालों को उससे प्रशिक्षण लेना चाहिए।
बस उसे यहाँ लाकर उसके सारे जुर्म माफ़ करके उसे व्यवस्था सोंप देनी चाहिए। यकीन मानो “वह” विदेशों में जमा सब धन दो महीने में ही वापस ला सकता है, वह यहाँ के भ्रष्टाचारियों का “मूत” निकाल सकता है। वह कोई खर्चा भी नहीं लेगा; क्योंकि अपना खर्चा वह इन दुष्टों से वसूल लेगा । बस उसका मन परिवर्तन करा दो । कोई उसे डाकू से वाल्मीकि बना दो ।

 

3 Comments

  • आप एक आम हिन्दुस्तानी का साक्षात्कार लेना चाहते थे। आपने कमोबेस उसीका ध्यान भी रखा। वैसे सच्चाई तो यही है कि हर पत्र को आम आदमी की तमाम बातो में अचित बात को वजन दे उसकी आवाज बनना चाहीए। कमी पत्रकारिता के मंद पेशे में कुदं कलम की है। आम आदमी तो आज भी मूक है। सब सहता है कल भी मूक ही है आरै आगे भी। dr a k 9313450055

  • आपसे शुरुआत की आशा करें ????????

  • bahut badhia likha aap ne, lagta hai khub mahent kiya hai iske liye, hane maja aaya, lekin agar a sach-much kisi aam admi ka interview hota to or bhi maja ata. padhne se lagta hai ki aap ne khud hi swal bane or khud hi jwab bhi, thodi sachai ki kami mahsus ho rahi hai

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