’3 Idiots’ … पर 3 Idiots कौन ?

उम्मीद थी यह फिल्म अच्छी होगी पर लोगों को उम्मीद से भी ज़्यादा अच्छी लगी. सवाल उठे आखिर ऐसा क्या है इसमें . शायद वो बात जो हर कोई महसूस तो करता है; पर कह नहीं पाता. सही मायनों में यहाँ वो IDIOTS नहीं हैं जो सामने है बल्कि यहाँ कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना है .

कटघरे में नायक-त्रय नहीं है … निशाने पर हैं एक-एक करके तीन ईडियट .

पहले पहल तीर चला है उन अभिभावकों पर जो अपने बच्चो को अपने सपनों के रूप में ही ढालना चाहते हैं . इसमें कोई बुराई भी नहीं है पर ये तब बुरा हो जाता है जब वो अपने बच्चों की सच्ची काबिलियत को नहीं पहचान पाते हैं और न ही उनके अंदरूनी रुझान को कि वो क्या बन सकते हैं और क्या करना चाहते हैं . ये सच है कि हमारा समाज अभी इतना विकसित नहीं हुआ है कि यह फैसला केवल बच्चों पर ही छोड़ दिया जाये कि वो क्या बनना चाहते हैं क्योंकि अक्सर युवा स्वप्न ज़िन्दगी की सच्चाइयों से दूर स्वप्न मात्र ही होते हैं . ऐसे में एक मध्य मार्ग अपनाना होगा . माँ-बाप को अपने बच्चों को उनकी मर्ज़ी के बगैर कोचिंग्स में झोंकने से रोकना होगा और ये स्वीकार करना होगा कि हर कोई हर किसी काम करने केलिए न तो बना है और न हीं बन सकता है. और यदि बन भी गया तो उस क्षेत्र सफलता और उत्कृष्टता प्राप्त नहीं कर पायेगा अतः हमें अपने बच्चों को ये सिखाना होगा कि जिस क्षेत्र को भी वो अपनाएं उसमें उत्कृष्टता को लक्ष्य बनाएं. वहीँ बच्चों और युवा को भी मानना होगा कि अभी उतना तजुर्बा उन्हें नहीं है कि वो अकेले ही अपने करियर का फैसला कर सके. आज दोनों को मिल कर बैठना होगा इसीलिए आज हर घर की चौकोर मेज को गोल बनाने कि आवश्यकता है .

दूसरा तीर चला है हमारी उस शिक्षा व्यवस्था और उन परम्परागत अध्यापकों पर जो जानने को ही ज्ञान समझ बैठते हैं . आज जब सूचना का विस्फोट हो चुका है…सूचना क्रांति की बात निबंधों का विषय बन गयी है तो फिर आखिर सूचना का मोल ही क्या रह गया है . अतः आवश्यकता इस बात को समझने की है कि हमें सूचना को छोड़ना होगा और सोचने को बढ़ावा देना होगा. शिक्षा के रुढ़िवादी रवैये की जगह ये मानना होगा कि हमें अब परतंत्रता कालीन यथास्थितिवादी मानसिकता से ग्रसित शिक्षा प्रणाली नहीं चाहिए वरन उन्मुक्त्त शिक्षा प्रणाली चाहिए . तभी आने वाले समय और युग में वो रचनात्मकता और सृजनात्मकता संभव होगी जिससे भविष्य का निर्माण हो सकेगा. आज हम विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक ज्ञान संपन्न जनसख्या के तो धनी है पर क्या वैज्ञानिक रूप से सबसे विकसित भी हैं? इसका उत्तर सब जानते हैं . ज्ञान को प्रयोग तक ले जाने में संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है जिसमें हम संभवतः साम्राज्यवादी शोषण के पश्चात् अब भले उतने धनी नहीं है पर ये सत्य भी है कि अब हमारी जनसख्या नकारात्मक तत्त्व नहीं है वरन हमारी शक्ति के रूप में देखी जा रही है. इसीलिए आज, अब एक ऐसी शिक्षा प्रणाली अपेक्षित है जो जनसँख्या को सही मायने में मानव संसाधन बनाने में एक सार्थक प्रक्रिया बन सके.

तीसरा तीर है शिक्षा के उद्देश्य पर . शिक्षा का मूल उद्देश्य यूं तो होता है व्यक्तिगत आंतरिक गुणों को विकसित करके वैसे ही पुष्पित कर देना जैसेकि एक फूल अपनी आंतरिक महक और रंग में खिल उठता है. परन्तु प्रश्न उठता है कि क्या तालीम की मंजिल नितांत इतनी ही होती है या इससे आगे भी . निसंदेह जब तक व्यक्तिगत स्तर पर विकास नहीं होता तब तक कोई भी व्यक्ति इतन विकसित नहीं हो सकता कि वो समाज और मानवता के लिए कुछ भी – कितना भी सार्थक अंशदान कर सके परन्तु यह भी सच है कि समाज में अकेले नहीं रहा जाता है …उसे साथ लेकर चला जाता है , जो तब ही संभव होता है जब हम अपने से ऊपर उठकर सोचें और मानवीय मूल्यों को भी आत्मसात करें . आज आवश्यकता ही नहीं अपरिहार्यता आन पड़ी है कि हम ये समझें कि शिक्षा जीवन के लिए होनी चाहिए जीविका मात्र के लिए नहीं और यदि व्यक्तिगत सफलताएं सामाजिक नहीं है तो हम एक मूलभूत गलती कर रहे हैं पड़ाव को मंजिल समझ लेने की.

इन अर्थों में यह फिल्म एक सार्थक प्रयास है और ये प्रयास तब और भी सार्थक होगा जब इसका ये निहितार्थ गहरे जाकर समझा जाए और याद भी रखा जाये … उम्मीद है सब अच्छा ही होगा और हम सब दिल से कह सकेंगें …. आल इज वेल !

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