स्वास्थ्य|2010/09/10 2:53 pm

सरल जीवन यापन ही स्वस्थ रहने का सर्वोत्तम साधन है |

डॉ. माला मिश्र

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जन सामान्य यह सोचता और समझता था कि देश के स्वतंत्र होते ही सभी समस्याओं का संतोष जनक ढंग से समाधान हो जाएगा। उसे नहीं पता था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सत्ता जिन लोगों के पास पहुचेगी उनकी दिलचस्पी समस्याओं के समाधान में कम उनकी वृद्धि में अधिक होगी।

आज हमारे देश के कलेवर से समस्या रूपी कैंसर के कीड़े बुरी तरह से चिपके हुए है। जिसके कारण देश स्वतंत्र होने के 60 वर्ष से भी अधिक समय बाद भी विकास की संतोष जनक गति नहीं प्राप्त कर सका है। देश की ज्वलंत समस्याओं में स्वास्थ्य की समस्या भी प्रमुख रूप धारण किए हुए है। उसके लिए सरकार के साथ-साथ सामान्यजन भी जिम्मेदार है।

सर्वप्रथम हम शासकीय उत्तरदायित्व की चर्चा करेंगे। आजादी मिलने के बाद जिन लोगों के हाथ में शासन की बागडोर आई, उनके चिन्तन पर पाश्चात्य प्रभाव पूरी तरह से हावी था। उनकी नजर में हर मर्ज की दवा पश्चिम की पद्धति में निहित थी। स्वास्थ चिकित्सा के क्षेत्र में भी उन्होंने अपने शक्ति चिंतन के कारण ऐलोपैािी को तरजीह दी है। आयुर्वेद व अन्य देशी पद्धतियों को हिकारत की नजर से दखा गया। आज भी आयुर्वेद और अन्य देशी पद्धतियों में परंपरागत चिकित्सकों को झोला छाप डाॅक्टर मानकर हेय की दृष्टि से देखा करता है।

सरकार का दूसरा दोष यह था कि उसने विकास के नाम पर विज्ञान और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में अन्धाधुंध बजट आवंटित किया, जबकि देशी शिक्षा पद्धति और चिकित्सा पद्धति पर पर्याप्त धन आवंटित किया जाना चाहिए था।

सरकार की तीसरी बड़ी गलती यह थी कि उसने नगरों को ही अपने विकास कार्यक्रम का ग्रतिमान माना। ग्रामों की सर्वािा उपेक्षा की गई, जबकि देश की अधिकांश जनसंख्या गांवों निवास करती है। नगररों में अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या आबादी के अनुपात में नगण्य है। ये अस्पताल आबादी के अनुपात में नगण्य है। ये अस्पताल नगरीय आबादी के लिए ही अत्यन्त अल्प हैं तो ग्रामीण आबादी को किस प्रकार अटेंड कर सकते है।

अन्य क्षेत्रों के समाज, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सरकार का दृष्टिकोण दूराग्रहपूर्ण रहा। सरकार सब विदेशी बातों को वरीयता देती रही। परिणाम सबके सामने है। मांसाहर, ध््रुमपान, मद्यपान, फास्ट-फूड (जंक फूड) ने लोगों के जीवन में जहर घोल दिया है। सरकार ने इनपर नियंत्रन रखने की बात तो दूर उल्टे इन्हें प्रोत्साहन ही दिया है।

कृषि के क्षेत्र में तो पाश्चात्य पद्धति को सरकार द्वारा किए गए प्रोत्साहन ने घोर अनर्थ किया है। अधिक फसल उगाने के बहाने विदेशी रासायनिक खाद का आयात कर सरकार ने जन स्वास्थ के साथ अवश्य अपराध किया है।

दरअसल होना तो यह चाहिए था कि जो भी बाहरी चीज हमारे लोक-स्वास्थ्य के लिए हानिकर थी उसे इस देश में प्रविष्ट ही नहीं होने दिया जाना चाहिए था। किन्तु प्रगतिशीलता की पक्षधर और आधुनिकता के आडम्बर से प्राप्त सरकार ने सामान्य जन के स्वास्थ्य के लिए सर्वनाश के बीज स्वयं को दिए है।

दूसरी ओर, लोगों का भी दोष कुछ कम नहीं है। उन्होंने भी ठान लिया है कि जो होना हो, सो हो हमे तो विदेशी वस्तुओं को ही अपनाना है चाहे खन-पान की बात हो, वेश-भूषा की बात हो, चिकित्सा की बात हो या अन्य कोई बात हो। वे यह नहीं सोचते कि हम विदेशी वस्तुओं को अपना कर अपनी अपनी बर्बादी स्वयं मोल ले रहे है। मेरा स्वदेशवासियों से नम्र निवेछन है कि बहुत हो चुका, कृपया अब तो चेत जाइये वरना पश्चिम की यह पैशाचिक/शैतानी सभ्यता हमारा सर्वनाश कर के ही छोड़ेगी।

यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि पूर्व और पश्चिम की हर बात में बहुत अन्तर है। प्रथम महत्वपूर्ण अन्तर तो जलवायु का ही है। दूसरा प्रमुख अंतर दोनों के सोच में हैं। वे लोग घोर भौतिकतावादी। फिर वे लोग आर्थिक रूप् से सम्पन्न है, जबकि हम आर्थिक रूप से विपन्न। उनकी चिकित्सा पद्धति कृत्रिम उपायों पर आधारित है, जबकि हमारी चिकित्सा पद्धति प्राकृतिक उपायों पर आधारित है। उनके जीवन में ही कृतिमता है, जबकि हमारे जीवन में सहजता है। अतः देशबन्धुओं से विनती है कि वे अपने जीवनयापन की पद्धति में परिवर्तन कर स्वदेशी पद्धति अपनाए। फिर देखे परिणाम कितने सुखद होते है। कुछ सुझाव नीचे दिए जा रहे है।

व्यवस्थित जीवन पद्धति- हमारे पुरखों के दीर्घ जीवन का यही रहस्य था कि वे व्यवस्थित जीवन व्यतित करते थे। जिनके जीवन में व्यवस्थितता नहीं होती, वे विभिन्न व्याधियों से ग्रस्त रहते है।

हल्का व्यायाम और प्रातःकालीन भ्रमण- प्रातः भ्रमण से शरीर को शुद्ध वायु का लाभ प्राप्त होता हैं तािा व्यायाम प्राणायाम, योगासनों आदि से शरीर स्वस्थ रहता है।

स्नान-ध्यान- स्नान से तन-मन दोनों शुद्ध हो जाते है तथा हमारे शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। स्नान के पश्चात परमात्मा का ध्यान अवश्य करें। जिसने हमें इतनी सारी अच्छाइयां बख्शी है।

सात्विक आहार- स्वस्थ रहने के लिए शुद्ध सात्विक आहार (शाकाहार) अत्यन्त आवश्यक है।

तामसिक तत्वों का त्याग- काफी तम्बाकू, गुटखा, पान-मसाला आदि तामसिक पर्दााि जो विभिन्न घातक रोगों को जन्म देते है। अतः तामसिक तत्वों का त्याग करे और बुरे व्यसनों से बचें।

कलह व तनाव से मुक्ति- स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है कि हम कलह और तनाव से दूर रहे। व्यर्थ की चिन्ता से कोई हल नहीं निकलता।

संयमित जीवन- स्वास्थ जीवन चाहते है तो संयमित जीवन पद्धति अपनाईये। जीवन में यौन आवश्यक है किन्तु उसकी अति घातक है। अतः संयम बरते।

सहज और सरल जीवन- आज हमारे जीवन में अस्थिरता इसलिए बढ़ रही है कि हमारे जीवन में बनावट ही बनावट हैं। हमें सहज और सादगीपूर्ण जीवन की ओर प्रवृत होना होगा।

गुरूजनों का सम्मान व उनका आशीर्वाद- अभिवादनशील व्यक्ति के व्यक्तित्व में हर अच्छी चीज की वृद्धि होती है।

कितभाषी और मृदुभाषी- कम बोलने वाला और मीठा बोलने वाला व्यक्ति सदा सुखी रहता है जबकि वाचाल व्यक्ति व्यर्थ ही बेकार की बातों में उलझ कर परेशानी मोल ले लेता है।

आशावादी दृष्टिकोण- स्वस्थ रहने के लिए सदैव आशावादी दृष्टिकोण होना चाहिए। नकारात्मक विचारों को मन में न लाए और सदा प्रसन्नचित रहे। जो होना होगा, वह तो होगा ही। हम व्यर्थ ही उसके लिए परेशान क्यों हो?

(डॉ. माला मिश्र , दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी की प्रोफ़ेसर हैं )


Leave a Reply