अंधेर नगरी|Shortlink: 2010/08/21 2:02 pm

स्वतंत्रता बेमानी है !

63 साल बाद भी तिरंगा शान से लाल किले कि प्राचीर पर लहर रहा है.तिरंगे के लहरने का कारण वादियों में चलने वाली हवा है न कि हमारा जोश.वो निरंतर लहरता रहेगा जब तक फिजाओं में हवाऐं चलती रहेंगी.लेकिन आजादी के 63 साल बाद एक प्रश्न उभर कर सामने आ रहा है कि क्या राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में वो शान बची है जो 63 साल पहले हुआ करती थी.आज हम एक गणतंत्र राष्ट्र में जी रहे हैं.लोकतांत्रिक देश होने के नाते यहाँ संविधान सर्वोच्च है. राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को उस परिस्थिति में पहुँचाया जब देश का प्रत्येक नागरिक ये कह सकता कि मैं पूर्ण स्वतंत्र हूँ.लेकिन क्या आज ऐसा  है? कुंठाओं ने मन में घर बना लिया है.15 अगस्त या 26 जनवरी हमारे लिए राष्ट्रीय पर्व  न रहकर महज छुट्टी का एक दिन बन गए हैं.दरअसल हमें आजादी तो मिली मगर हमें उसे संजोना नही आया.राष्ट्रवादियों और महापुरुषों द्वारा बताई गई बातें हमारे लिए महज किताबी हो गई है.लोकतंत्र को लोकधर्म होना चाहिए था मगर लोगों ने लोकतंत्र को अपने निजी धर्मों के अनुसार बदलना शुरु कर दिया.

15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के प्रथम संबोधन में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जय हिंद का नारा लगाते हुए कहा था कि देश में स्थिरता आएगी और गरीबी दूर होगी.लेकिन आज 63 साल की जवान आजादी के बाद भी गरीबी में मामूली कमी ही आ पाई है.इन 63 सालों के बीच देश में अस्थिरता भी बढी है.सांप्रदायिकता,आतंकवाद, नक्सलवाद,रंगभेद, वंशवाद, दलित उत्पीडन के रुप में भारत में अस्थिरता बढी है.गरीबी खत्म हो या न हो गरीब निश्चित रुप से खत्म हो रहा है.जय हिंद का मतलब होता है विजय या जीत.अब सवाल ये उठता है कि क्या जय हिंद का नारा अपनी प्रासंगिकता नही खो रहा है? सुभाष चंद्र बोस ने देश को स्वतंत्रता की सुबह का दर्शन कराने के लिए आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी. तब ये नारा सभी देशवासियों की जुबाँ पर चढ गया था. नारा आज भी हमारे देश के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से लगाते हैं मगर सिर्फ क्षणिक जोश जगाने के लिए.भारत की विजय अब सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है.भ्रष्टाचार, असमानता,अशिक्षा ये सभी वो विषय हैं जिन पर चर्चा तो खूब हो रही है मगर समाधान कुछ नही निकल पा रहा.

दरअसल समस्या ये भी रही है कि देश के नागरिकों ने अपनी आजादी को गलत ढंग से अपनाया है.हमें अपने अधिकारों की तो चिंता है मगर अपने उत्तरदायित्वों को हमने पूर्णत भूला दिया है. हमें ये याद है कि हम सड़क पर चलने के लिए आजाद है लेकिन जब हम उस सडक पर कूडा फेंकते है या थूकते हैं तो हमें अपना कर्तव्य याद नही आता कि ये गलत है.स्वतंत्रता में हमारे अधिकारों का तो समावेश होता है उसके साथ हमारे कर्तव्य भी जुडे़ होते हैं.15 अगस्त पर  देशभक्ति के गीत सुने जाते है मगर जब बात आती है देश की रक्षा में बलिदान होने की तो हम पड़ोसी की तरफ नज़र उठाकर देखते हैं.वो कहते हैं न कि  “भगत सिंह पैदा तो हो मगर पड़ोसी के घर में” हमने अपने अंदर के भगत सिंह की हत्या कर दी है और दुर्भाग्य है कि हमें उस हत्या का पता भी नही है पश्चाताप तो दूर की बात है.

आज देश दो भागों में विभाजित हो गया है एक तरफ तो इंडिया है जिसमें देश का संभ्रांत तबका निवास करता है और दूसरी तरफ है भारत, जिसकी आत्मा गाँवों में बसती है. दुख इस बात का है कि इंडिया को तो आजादी मिल गई मगर भारत अब भी अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है.तकनीक का निरंतर विकास तो हो रहा है लेकिन उस तकनीक का फायदा देश के प्रत्येक तबके तक नही पहुँच पा रहा है. देश के ग्रामीण वर्ग के मन में शहरी क्षेत्रों के लोगों के प्रति हीन भावना भर गई है. राजनीतिक प्रयास भी गाँवों को वो तरक्की नही दिला सके जिनकी उन्हें सख्त दरकार थी.करोड़ों के हेर-फेर से हमारे देश के नेता देश को चलाने की कोशिश करने लगे हैं.गाँधी टोपी पहनना कभी शान हुआ करता था लेकिन अब बच्चे कहते हैं कि बेईमान नेता आ रहा है.हमारे देश के कई ऐसे राज्य हैं जो गंभीर आर्थिक और सामाजिक असमानताओं से गुजर रहे हैं. गाँवों तक विकास की गाड़ी पहुँच पाए इसके लिए पंचायतों का गठन किया गया मगर पंचायतों के क्रूर फैसलों ने इन्सान की आजादी को छीनने में भी कोई कसर नही छोडी.

हमारे देश में समय-समय पर सरकारें बदलती रही मगर किसी भी सरकार ने निचले तबके के विकास के लिए पहल की हो ऐसा कहना मुश्किल है.देश के नेताओं ने सबसे पहले उन लोगों के घरों को खुशहाल करने की कोशिश की जो उन्हें चुनावों में फायदा पहुँचा पाएं.स्वतंत्र भारत में राजनीतिज्ञों और उच्च तबके के लोगों ने स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से प्रयोग किया.मतदान के समय नोटों का खेल भी हमें देखने को मिल जाता है.लोकतंत्र हमें हमारी सरकार को स्वयं चुनने का विवेक प्रदान करता है मगर होता इसके ठीक विपरीत है. सत्ता तक वही लोग पहुँचते हैं जो चापलूसों की दुनिया में गहरी पकड़ रखते हैं.

आजादी के 6 दशकों के बाद भी हमारे संकल्प संसद के गलियारों से निकलकर देश की सड़कों तक नही आ पाए.इसमें हमारी भी कमियाँ रही कि हम अपने अधिकारों का सही प्रयोग नही कर पाए और कर्तव्यों को भूल गए.देश के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना सर्वस्व न्यौछावर करना चाहिए,ऐसी भावना हमारे मन में होनी आवश्यक है. हमारा देश विश्व का सबसे युवा देश है और ये सभी को पता है कि विश्व में जितनी भी क्रांति हुई है वो युवाओं के कंधों पर ही हुई है.हम चाहे तो राष्ट्र को एक नई दिशा दे सकते हैं। अपने गौरवमयी इतिहास के आसरे हम अपने वर्तमान और भविष्य को उज्जवल होता हुआ देख सकते हैं। बस आवश्यकता है एक प्रयास की। एक आंदोलन की। देश में एक समान नितियाँ सभी के लिए लागू हो, विकास का पैमाना सभी के लिए एक हो इसके लिए निश्चित तौर पर हमें संघर्ष की आवश्यकता होगी। हमें एक और आजादी की जरुरत है वो है आर्थिक आजादी.सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के प्रत्येक व्यक्ति का पेट भरा हो एक छोटे से लाभ के लिए लोगों के घरों को न उजाडा जाए.ये सब तभी संभव है जब हम अपने उत्तरदायित्वों को प्राथमिकता दें और अधिकार के साथ सवाल करना सीखें.ये सच्ची आजादी का पहला कदम है और ये निश्चित है कि हम जरुर आज़ाद होंगे.

1 Comment

  • yeh bilkul sahi baat hi hai ki swatantrata aek manmani hoti ja rahi hai kyoki yadi kisi ke maa-baap bachche ko aazadi de bhi de to use buri aadat lene mein samay nahi lagata.

Leave a Reply