नीतीश कुमार आजकल ख़ुशी से कहते फ़िर रहे हैं कि उनके राज में गरीब -गुरवा की बेटियां सरकारी ड्रेस में सायकिल पर सवार होकर स्कूल जाती हैं . अब का चाहिए बिहारी जनता को बच्चा-बुच्ची को पाठशाला में दिन का भोजन ,पहनने का कपड़ा-लत्ता ,किताब-कापी मिल हीं जाता है भले हीं शिक्षा मिले ना मिले ! आप भी पढ़िये बिहार की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलता हुआ महेश जी का यह आलेख :
जैसा की पिछले पोस्ट में मैं बता चुका हूँ कि आरक्षण नीति के कारण अयोग्य को महत्त्वपूर्ण कार्य दे दिया जाता है और इस कारण देश विकास के राह पर न चलकर पतन की ओर जाता है। योग्य व्यक्ति को दरकिनार कर अयोग्य व्यक्ति को कार्य सौंपना व्यक्ति के प्रतिभा के साथ खिलवाड़ ही है। आरक्षण के अलावा अन्य सरकारी नीति में भी इस प्रकार होती है। इसी का एक अच्छा उदहारण बिहार में कुछ वर्षों से हो रहे शिक्षकों की बहाली है। बिहार में रहने वाले तो जान ही रहे होंगे कि किस प्रकार बहाली की गयी है पर बिहार के बाहर के लोगों की जानकारी के लिए मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि इस बहाली में मेधा को कोई स्थान ही नहीं दिया गया है। प्रतियोगिता / प्रतियोगी परीक्षा समाप्त कर दी गयी। बल्कि उम्मीदवार द्वारा मैट्रिक / इंटर में प्राप्त किये गए अंक के आधार पर बरीयता सूचि के आधार पर बहाली की गयी / की जा रही है। पिछले बार भी इसी तरह हुयी थी और इस बार भी इसी तरह हो रही है। बहाली के इस नीति के ओर से तर्क दिया जा सकता है कि जिसे मैट्रिक / इंटर में ज्यादा अंक मिला है, स्वाभाविक रूप से वह तेज है अतः बिना प्रतियोगी परीक्षा के ही बहाली की जा रही है तो यह गलत नहीं है।
कुछ पल के लिए यदि इस तर्क को मान लें तो इस तर्क के समर्थक को यह यह भी समझना चाहिए कि यदि वह तेज था तो वह तो उस समय तेज था जब वह मैट्रिक / इंटर पास किया था। पर आज की उसकी स्थिति क्या है इसकी जांच आपने कहाँ किया? आज आप उसके ज्ञान को परखे बिना, बिना कोई ट्रेनिंग दिए सीधे स्कूल में पढ़ाने के लिए भेज रहे है। — क्या जो व्यक्ति 30-40 वर्ष पहले मैट्रिक किया और उस समय यदि वह तेज था और फिर इधर वर्षों से पढाई-लिखाई से उसका कोई संबंध नहीं रहा है तो क्या आप यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वह अब भी पढ़ाने के योग्य है? फिर आपको यह भी समझना चाहिए कि कोई यदि पढने में तेज है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह सही ढंग से पढ़ाने के भी योग्य है। अपने तेज होने और दुसरे को पढ़ाना दोनों में बहुत ही अंतर है। फिर मैं पूछना चाहूँगा कि क्या परीक्षा में ज्यादा अंक लाने का मतलब तेज होना है? निःसंदेह इसका उत्तर लोग हाँ में देंगे। पर मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि किस प्रकार पहले परीक्षा में खुलकर कदाचार होता था और तेज विद्यार्थी अंक पाने में पीछे राह जाते थे व कमजोर व मुर्ख विद्यार्थी अच्छे अंक लाते थे। मेरे इस कथन से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह सर्वविदित है कि बिहार में परीक्षा में व मूल्यांकन में कदाचार पहले भी होता था और अब भी हो रहा है। पटना उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से 1996 में सुधार हुआ व परीक्षा में कड़ाई हुयी। पर फिर …….. फिर उसी तरह परीक्षा में चोरी / नक़ल व कदाचार जारी है। अंतर सिर्फ यही है कि पहले विद्यार्थी परीक्षा में बैग में किताब भरकर ले जाते थे और डेस्क पर किताब रखकर किताब खोलकर व देखकर उत्तरपुस्तिका में लिखते थे। पर अब डेस्क पर किताब रखकर चोरी / नक़ल नहीं की जाती है पर परीक्षा हॉल में किताब व चीट / पुर्जा जाता ही है और चोरी होती ही है, जो किसी से छिपी हुयी नहीं है। …… मैं यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि क्या आप यह भूल गए कि बिहार के शिक्षा में कुव्यवस्था के कारण ही बिहार के बाहर के एक राज्य (नाम मुझे याद नहीं है) ने बिहार इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद के प्रमाण पत्र की मान्यता समाप्त कर दी थी। फिर बहुत ही मुश्किल से बिहार इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद ने उस राज्य में अपने प्रमाण पत्र की मान्यता को पुनः प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी।
परीक्षा व मूल्यांकन में कदाचार के लिए जिम्मेवार कौन है? मैं जोर देकर कहता हूँ कि परीक्षा में कदाचार के लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि परीक्षार्थी के अभिभावक रहते है। जी हां अभिभावक, जो अपने बच्चे के विकास के लिए उसे स्कूल में पढ़ाते हैं पर मैट्रिक की परीक्षा में चोरी कराने में सबसे आगे उनका ही हाथ रहता है। और ऐसा करके वे अपने बच्चे का जीवन उज्जवल नहीं बल्कि अंधकारमय ही बनाते हैं। यह मेरी कोरी बहस नहीं बल्कि वास्तविकता है। जो बच्चा स्कूल के परीक्षा में चोरी नहीं करता था और मैट्रिक की परीक्षा में भी चोरी नहीं करना चाहता है उसे भी अभिभावक मैट्रिक के परीक्षा में चोरी करने के लिए चीट / पुर्जा देते हैं। यह बात सही है कि मैट्रिक के परीक्षा में चोरी / नक़ल करने के पक्ष में विद्यार्थी से ज्यादा उसके अभिभावक रहते हैं और अभिभावक खुद परीक्षा में अपने विद्यार्थी को नक़ल करने के लिए चीट (पुर्जी) पहुँचाते हैं / पहुँचवाते हैं। और ऐसा करके वे अपने बच्चे का भविष्य बनाने में सहयोग नहीं करते हैं बल्कि बच्चे के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर भविष्य बिगाड़ते हैं।
तो क्या यह कहना उचित होगा कि उच्च अंक प्राप्त करने वाला तेज है ही। और फिर इस प्रकार उच्च अंक प्राप्त करने वाले के बिना कोई ज्ञान के जांच किए ही शिक्षक के रूप में नियुक्त कर बिना ट्रेनिंग के ही सीधे स्कूल में पढ़ाने के लिए भेजना उचित है? क्या इस प्रकार के शिक्षक बच्चे को सही ढंग से पढ़ा सकेंगे? बिहार में यही हो रहा है। पिछले बार के बहाली में तो उम्मीदवार के ऊपरी आयु सीमा वही थी जो आयु सीमा सेवानिवृति के लिए है। अतः 50-55 वर्ष के व्यक्ति को भी शिक्षक का नौकरी लग गया और वे अपना business छोड़कर नौकरी पर आ गए। ऐसे कितने लोगों को शिक्षक का नौकरी लग गया जिसे खुद कुछ नहीं आता है। ताज्जुब तो तब होती है जब एक पचास-पचपन वर्ष के एक पैर वाले व्यक्ति को Drill Teacher (व्यायाम शिक्षक) के रूप में नियुक्त किया गया। नियुक्त ही नहीं किया गया बल्कि वर्षों से वे नौकरी कर भी रहे है। आप सोच सकते हैं के जिनका एक ही पर है (उनका दूसरा पैर घुटना के ऊपर से ही कटा हुआ है) वह व्यायाम शिक्षक के रूप में बच्चे को क्या सिखाएंगे? ……………………
तो इस प्रकार हो रही है शिक्षकों की बहाली और ऐसी है हमारी शिक्षा नीति। आप खुद सोच सकते हैं कि ऐसे शिक्षकों के भरोसे बच्चों का कितना विकास होगा? मेरे इस बात से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि बिहार में शिक्षकों की इस प्रकार के बहाली से लोगों को शिक्षक शब्द से ही शिक्षक के प्रति जो आदर व सम्मान की भावना थी वह अब नहीं रही। सच पूछिये तो शिक्षकों का कार्य अब अपने ज्ञान से सेवा भाव से बच्चों को सही राह पर लाकर विकास करना नहीं रहा बल्कि उनका कार्य अब सिर्फ बैठे-बैठे पैसा कमाना हो गया है।
शिक्षक = मास्टर = मास + टर
(यानी पढावें या न पढावें बस किसी तरह मास यानी महीना टरेगा यानी बीतेगा और पैसा मिलेगा)


सारे देश का यही हाल है . प्राइमरी एजुकेशन भाड़ में झोका जा चुका है . सरकारी स्कूल का इतना बुरा हाल है कि उसकी चर्चा ना ही की जाए . बिहार और यूपी में तो केवल मकान और मिड डे मिल खाने वाले बच्चे हीं बचे हैं
परीक्षा में नक़ल एक गंभीर मुद्दा है जो वर्तमान मानव संसाधन को खोखला बना रहा है . शिक्षा में जब भ्रष्टाचार व्याप्त हो जाए तब और क्या बाकि रहता है . इस देश का क्या होगा ?
आज शिक्षको की स्थिति कितनी खराब है इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी मासिक आय {वेतन} उसी विढ्यालय के चपरासी से कम है आज नियुक्त सम्बिदा शिक्षक को मातृ 2500/-मानदेय दिया जा रहा है | उसके भविश्य के लिए कुछ नही है | जो व्यक्ति देश का भविश्य बना रहा है उसका ख़ुद के भविश्य का ठोकाना नहीं है| शासन जितना पैसा एक बालक बालिका पर खर्च करता है उससे भी कम में एक सम्बिदा शिक्षक काम कर रहा है|