अंधेर नगरी|2010/05/07 10:05 am

विकास का स्याह सच

भारत में 90 के दशक में आर्थिक सुधारों का सिलसिला शुरू हुआ था . दो दशकों में इसने ऐसी रफ़्तार पकड़ी कि देश का स्वरुप बदलता गया . कब सपेरों के देश कहे जाने वाले भारत में नॉएडा और गुडगाँव जैसे विश्वस्तरीय आर्थिक शहर उभरे , भारत कब  इंडिया बन गया पता भी ना चला ! आर्थिक विकास की तेज गति ,भूमंडलीकरण और कामगारों के लिए नए मौकों की बाढ़ सी आ गयी जिसने देश में नया आत्मविश्वास भरा. दुनिया की उम्मीद भरी निगाहें हमारी तरफ उठने लगी . यही नहीं भारतीय समाज की बंधी-बंधाई मानसिकता में काफी-कुछ आ चुका है लेकिन, तूफानी गति से परिवर्तन के इस दौर में जो कुछ पीछे छूट गया है उसकी कीमत कोई नहीं चुका सकता है .

परिवर्तन की इस लहर का सबसे बड़ा प्रभाव देश के अनेक छोटे शहरों पर पड़ा .ये शहर रातोंरात आर्थिक महानगरों में बदल गये गए . आज गुडगाँव , नोएडा, पुणे, बेंगलुरू और हैदराबाद जैसे शहरों की वर्तमान स्थिति भारत के अन्य कई हिस्सों से सैकड़ों साल आगे की लगने लगी है . ऐसा लगता है मानो, कछुए की चाल से आगे बढ़ रहे इन शहरों को आर्थिक सुधार के दौरान उड़ने वाले पर लग गए हों ! बंगलौर सालाना ग्यारह फीसदी के विकास डर के साथ आगे बढ़ रहा है , नॉएडा विश्व के सबसे विकसित और महंगे शहरों में शुमार है , पुणे को भी वैश्विक शहरों का दर्जा मिल चुका है . दरअसल ये कुछ बातें हैं जिनपर सबको नाज है .

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं ” जब हम भारत के उदय की बात करते हैं तो हमें युवा पीढ़ी की ओर ध्यान देना चाहिए . यही हमें बना भी सकते हैं और डूबा भी सकते हैं तो हम इन्हें शिक्षित करें , रोजगार दें ताकि ये हमें आगे ले जाए . दक्षिण के राज्यों में विकास ज्यादा हुआ क्योंकि उन्होंने इस ओर पहले से ज्यादा ध्यान दिया . उत्तर की बात करें तो यहाँ नीतियों में भी कमजोरियां रही हैं . जो लाभ मिलना चाहिए था बिहार को , बंगाल को , मध्य प्रदेश को , उड़ीसा को वह नहीं मिला . वरना जैसे टाटा पहुंचे वैसे और लोगों को भी पहुंचना चाहिए था . गरीब कौन हैं इसको चिन्हित करना होगा . यह सोचना होगा कि हम उनके लिए क्या चाहते हैं ? गरीबों को महज कुछ किलो अनाज देकर ,कुछ केलोरी देकर कब तक उनको गरीब बनाये रखेंगे .? कितने दिनों तक इस प्रकार के कल्याण की योजना के सहारे गरीबी मिटाने का ढोंग चलता रहेगा ? नॉएडा और ग्रेटर नॉएडा पर सबको नाज होता है , सिर्फ यूपी को ही नहीं पूरे देश को नाज होता है . सबको अच्छा लगता है . वो सब ठीक है . लेकिन सोच लीजिये कि सिर्फ गुडगाँव और नॉएडा के भरोसे आप चीन की बराबरी कर पाएंगे . विकास यदि सामाजिक न्याय पर आधारित ना हो तो बस ऐसे हीं विकास के कुछ टापू बन कर रह जायेंगे , बाकी बचे लोगों का क्या होगा ? “

नीतीश कुमार की इन बातों में भारत की तल्ख़ हकीकत छुपी है . आज शहरों की आ॓र उठती नजर, आर्थिक सुधारों की चमकती -दमकती तस्वीर देखती हैं. लेकिन पीछे मुड़कर गांवों की तरफ देखने पर दृश्य ही पलट जाता है . भूमंडलीकरण और बाजारवाद की नीतियों ने खेती और उस पर निर्भर समाज के सामने जीने की समस्या खड़ी कर दी है . किसान आत्महत्या कर रहे हैं , ऐसे में देश के लिए यह बड़ी चुनौती हैं . जिस देश की 140 करोड़ आबादी में 65 फीसद लोगों का पेट खेती से चलता है . नॉएडा , गुडगाँव में आये विकास ने एक वर्ग को नौकरियां दीं तो एक बड़ा तबका आज भी बेरोजगार है. एक सरकारी सर्वेक्षण समिति के रिपोर्ट के अनुसार , 77 फीसद आबादी रोजाना 20 रूपए से कम पर गुजारा कर रही है. बहरहाल , विकास के इस खुबसूरत फ़साने के पीछे का स्याह सच जब सामने आता है तो आर्थिक सुधारों की तस्वीर मैली हो जाती है .

2 Comments

  • डा ० पुरुषोत्तम मीणा

    विप्लवजी आपने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि-गरीबों को महज कुछ किलो अनाज देकर, कुछ केलोरी देकर कब तक उनको गरीब बनाये रखेंगे .? कितने दिनों तक इस प्रकार के कल्याण की योजना के सहारे गरीबी मिटाने का ढोंग चलता रहेगा?
    आपने भारत के स्वर्णिम कहे जाने वाले इतिहास के लेखकों की एक बात तो अवश्य पढी या सुनी होगी कि दरिद्रनारायण की सेवा पूण्यदायी होती है और दरिद्र नारायण की सेवा से सारे पाप धुल जाते हैं। तो भाई जब तक लोग पाप करते रहेंगे, तब तक पापों को धोने के लिये और स्वर्ग का टिकिट कटाने के लिये दरिद्र की तो जरूरत रहेगी ही। दरिद्र नहीं होगा तो स्वर्ग की इतनी आसाान सीढी कहाँ ढँूढोगे।
    अतः हमारे देश में हजारों सालों से दरिद्रता को भी दरिद्रनारायण कहकर महिमामण्डित किया जाता रहा है। दरिद्र इससे खुश है कि कोई तो है जो उसे भगवान अर्थात्‌ नारायण की उपाधि से विभूषित कर रहा है। जिस देश में आम और दरिद्र कहे जाने वाले लोगों को पीने को शुद्ध पानी तक नसीब नहीं हो, उस देश का भविष्य कैसा होगा, इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। शुभकामनाओं सहित।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इसमें वर्तमान में ४२८० आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८)

  • एक अरब जनसंख्या को भूखा-प्यासा रखकर, उनकी खून-पसीने की कमाई का अब्शोषण करके किया जा रहा है यह सब विकास चंद महानगरों का. राष्ट्र स्तर पर देखा जाए तो यह विकास नहीं है, सरासर विनाश है. देश के नेताओं और प्रशासकों की बुद्धि भरष्ट है इसलिए वे निजी स्वार्थों के अतिरिक्त कोई कल्पना भी करने में असाक्षम हो गये हैं.
    आआइये मेरे गाँव और देखिए किस तरह लोग २४ घंटे परिश्रम करते हैं और पीने के पानी तक के लिए तरस रहे हैं. आज चार महीने हो गये एक सरकारी हेंडपम्प को खराब हुए जिस पर पीने के पानी के लिए ३० निर्धन परिवार निर्भर करते हैं. ग्राम प्रधान से लेकर मुख्या मंत्री तक लिखा जा चुका है इस बारे में. बस उत्तर मिलता है – अभी पैसा नहीं है सरकार के पास ऐसे कामों के लिए. जो सरकार हाथियों की मूर्तियों पर २३०० करोड़ खर्च कर रही है, उसके पास निर्धानों के लिए पीने का पानी देने के लिए पैसा नहीं है. वातावरण परिपक्व हो रहा है देश में रक्तरंजित क्रांति के लिए जब नक्सलवाद इन नेताओं को निगल जाएगा.

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