आज तक भारत केवल आतंकवाद, उग्रवाद और संप्रदायवाद जैसी समस्याओं से जूझता रहा। इससे निजात पाने की जुगत में लगा रहा। इससे निजात अभी मिली भी नहीं कि क्षेत्रावाद की आग ने देश को फिर से झुलसाना शुरू कर दिया। ये तो होना ही था। यह गंभीर अवस्था में तब और पहुंच जाएगा जब सारे वाद अपने देश में पाव पसारना प्रारम्भ कर देंगे। तब शायद सरकार को इसे संभाल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन हो जाएगा। हर तरफ अराजकता का माहौल होगा। राजनीतिज्ञ राजनीति जितनी चाहे कर ले पर उस वक्त सबकी सोच धरी की धरी रह जाएगी। देश टूटने की पूरी-पूरी संभावनाए नजर आने लगेगी। इसी को कहा जाता है विनाश काले विपरित बुद्धि। जब मनुष्य के सर्वनाश होने का वक्त आता है तो इस तरह की हलचलें होना आम बात है।जहां तक चर्चा की जाए वाद की तो यह सैकड़ो सालों से चला आ रहा है। प्रारम्भिक दिनों में साम्यवाद, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, फासीवाद, नाजीवाद जैसे वादों ने इंसानों की जान लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कितने राजाओं एवं शासकों ने अपने हितों को साधने के लिए इसका इस्तेमाल किया। वे सफल भी रहे। पर ज्यादा दिनों तक वह इस वाद के सहारे टिक नहीं पाए। यहां तक की कई राष्ट्रों ने भी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया और लोगों का हर प्रकार से शोषण किया। लेकिन वे अंत में किसी न किसी वाद के भेट ही चढ़ गए। अगर इतिहास को टटोले तो इसके कई उदाहरण मिल जाएंगे। फिर चाहे जर्मनी के हिटलर, इटली के मुसोलिनि, रूस के चार्ल्स की दासता हो या फिर साम्राज्यवादी देश ब्रिटेन ही क्यों न हो। इन तमाम वादों का असर इंसानों की जिंदगी पर ही पड़ा है।
आज से ७ से ८ दशक पूर्व विश्व में दो महाशक्तियां थी। जो एक दूसरे पर हर वक्त तलवारें तानी रखती थी। दोनों शक्तियों में भी वाद की ही लड़ाई थी। एक मार्क्सवाद तो दूसरा पूंजीवाद। हांलाकि मार्क्सवाद पूंजीवाद के आगे टिक नहीं पाया। लेकिन इस दौरान भी लाखों लोगों की जाने गई यानी यहां भी इंसानों की मौत का कारण यह वाद ही बना।
अगर हम अपने देश की बात करें तो यहां कोई खास एक वाद नहीं है बल्की यहां बहुसंख्यक वाद है जिसे मिश्रितवाद भी कहां जाता है। जो हमें विश्व के अन्य राष्ट्रों से बिल्कुल अलग रखता है। और देश को एक विशेष पहचान दिलाता है, जिस पर हम भारतीयों को गर्व है। भारत ने जिस विश्व बंधुत्व का नारा पूरे देश में पहुचाया, जिसे लेकर भारत की दुनिया में प्रसिद्धी भी बढ़ी, इतना ही नहीं, इस प्रकार की नीति न केवल आज है बल्कि यह युगों-युगों से चली आने वाली प्रथा के समान है जिसके अवशेष हमारे वैदिक गं्रथों में िमले हैं। त्रोता युग और द्वापर युग में जहां राम और कृष्ण ने केवल मानवतावाद और प्रेमवाद का संदेश दिया। वहीं इस कलयुग में लोगों ने वाद को खंडित कर सैकड़ों वाद तैयार कर दिए। आज भारत में कई तरह के वाद है, जिसमें कुछ हितकारी है तो कई अहितकारी। समाजवाद, पूंजीवाद और मार्क्सवाद जहां थोड़े बहुत हितकारी साबित हुए है वहीं आतंकवाद, उग्रवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रावाद, जातिवाद और भाषायीवाद आदि, कई गुणा अहितकारी साबित हो रहे हैं। दरअसल इतने वाद होने की मुख्य वजह है जनसंख्या में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी। वह भी तब, जब हर साल करोड़ो आबादी देश की जनसंख्या से जुड़ती जा रही हो। और समस्या तब बड़ी हो जाती है, जब राजनीति पूरी तरह दिशाहीन होकर इसका बेजा इस्तेमाल करने लगे।
कुछ यही हाल भारतीय राजनीति का हो रहा है। तमाम राजनीतिक दलों को केवल अब वोट की चिंता रह गई है। देश की चिंता करना वह पूरी तरह भूल चुके हैं। इतना ही नहीं लोग भी राजनीतिज्ञों की तरह अपना-अपना हित देखने लगे हैं। जिंदगी को अपने परिवार तक ही सीमित मानने लगे हैं। इसके लिए भी बढ़ती जनसंख्या और उससे पनपती परेशानियां ही खासतौर पर जिम्मेदार है।
आज राज ठाकरे राजनीति में अपनी पैंठ बनाने के लिए क्षेत्रावाद का सहारा ले रहे हैं। इधर तमाम छोटे-बड़े दल सम्प्रदायवाद की राजनीति कर अपना वोट बैंक बनाने में लगे हुए है। जरा सोचिये, अभी तक कई वादों का इस्तेमाल भी पूरी तरह से नहीं किया गया है। जैसे जातिवाद, भाई-भतीजावाद,उँचनीचवाद, अमीरगरीबवाद। पर राजनीतिज्ञों में बढ़ते ओछेपन से यह साफ हो चुका है कि आने वाले दिनों में यह तमाम अन्य प्रकार के वाद भी इस भारत के पटल पर दिखाई देने लगेंगे। हालांकि कहीं-कहीं इसका आंशिक असर भी दिखाई दे रहा है। अगर पूरी तरह से ऐसा हो गया तो भला सोचिए क्या होगा, हर इंसान दूसरे इंसान के खून का प्यासा हो जाएगा, गरीब अमीर को देखना पसंद नहीं करेगा और अमीर गरीब को खत्म करने की जुगत में लगा रहेगा। और ऐसा सोचना भी लाजमी है, क्योंकि जिस प्रकार से आबादी की रफतार बढ़ रही है और कोई भी संस्था और राजनीतिक दल इसके खिलाफ न आवाज उठा रही है और न ही जागरूकता फैलाने का काम। सरकार अपनी वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए इसे लगातार नजरअंदाज करती जा रही है। अगर वाकई राज ठाकरे और नीतिश, लालू, पासवान को महाराष्ट्रवासियों और बिहारवासियों की चिंता है तो इस क्षेत्रावाद के वाद-प्रतिवाद से बचते हुए कुछ ठोस कदम उठाये जाने की पहल करनी चाहिए ना कि क्षेत्रावाद को लेकर राजनीति करने की। क्योंकि इस राजनीति से न तो देश का भला है और न ही दोनों राज्यों के लोगों का। राज ठाकरे जो शायद आज भी १८ वीं. सदी में जी रहे हैं जहां राजतंत्र हुआ करता था और एक राज्य के लोगों को दूसरे राज्य में जाने की अनुमति नहीं थी। लेकिन आज प्रजातंत्रावाद है और भारतीय कानून के अनुसार कोई भी कही भी जा सकता है। अगर वे कानून का मजाक उड़ाते है और केन्द्र या राज्य सरकार कानून का डंडा उनपर चलाने से कतराती है तो इसके लिए खासतौर पर केन्द्र, और महाराष्ट्र सरकार जिम्मेदार है। जहां तक उत्तर भारतीय केन्द्रीय नेताओं की बात रही तो वे वाकई उत्तर भारतीयों की भलाई चाहते है तो फौरन अपने पद से इस्तिफा देकर सरकार से अपना समर्थन वापस लें। तब हो सकता है कि केन्द्र सरकार फौरन हरकत में आ जाए। और राज पर कानूनी डंडा भी चलना प्रारंभ हो जाए। नहीं तो धर्मवीर राय और राहुल राज जैसे बेगुनाह और गुमराह लोग क्षेत्रावाद की इस आग में जलते रहेंगे। जहां तक आबादी रोकने का सवाल है तो क्षेत्रावाद की राजनीति करने वाले दल कभी भी इस मसले पर अपनी ओर से पहल करते नहीं दिखाई देंगे। क्योंकि वे जानते है कि इस पहल के साथ ही उनका वर्चस्व सदा के लिए खत्म हो जाएगा। और देश की तमाम राजनीतिक दलों को सोचना होगा कि वे अब क्या चाहते है आने वाले सालों में देश का विभाजन या फिर ऐसा कड़ा कानून जो इन तमाम परेशानियों को एक ही झटके में खत्म कर दे।


आपका चिंतन मन को विचलित करने वाला है.
bahut achha aur saargarbhit aalekh !
aapko badhaai !