| लिमटी खरे,नई दिल्ली (साई) । अण्णा और बाबा से सिब्बल का गुप्त समझौता ! अहंकारी, घमंडी छवि वाले केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल इन दिनों खासे नरम दिखाई पड़ रहे हैं। उनके व्यवहार के कारण कांग्रेस में ही
करीब पांच दशकों में नौवीं बार लोकपाल विधेयक संसद में पेश है | १९६८ से अबतक लोकपाल की अतीव आवश्यकता के बावजूद संसद में इसका aपारित नहीं होना स्वयंस्पष्ट है | क्योंकि लोकपाल लोक के आपसी भ्रष्टाचार में नहीं, अपितु लोक पर तंत्र के भ्रष्टाचार के विषय में पड़नेवाला क़ानून है | और स्वतन्त्र भारत में तंत्र ने यह विचार लोक के मन में पैठा दिया है कि विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका की तिकड़ी सर्वोच्च है और लोक द्वितीय दर्जे का | यह झूठ इतने तगड़े ढंग से लगातार ६४ वर्षों से डंके की चोट पर दोहराया जा चुका है कि भारत की अधिकाँश जनता भी ईमानदारी से यह मान बैठी है कि लोकतंत्र का मतलब ही तंत्र का गुलाम लोक होता है | आज स्थिति यह आ गई है कि जनता भारत में प्रचलित संसदीय लोकतंत्र (निर्वाचित सावधि तानाशाही) को ही असली लोकतंत्र मान चुकी है | दुनियाभर के अन्य विकसित लोकतंत्र के सहभागी माडल, या गांधी के ग्राम-गणराज्य कि कल्पना तक से हम कतराने लगे हैं |
इसी गलतफहमी का फायदा उठाते हुए तंत्र ने अगस्त २०११ में ‘संसद की भावना’ के बावजूद आज एक ऐसा बिल संसद में पेश किया है जो कि राष्ट्र के विश्वास पर घात है | प्रस्तुत बिल तो अगस्त २०११ में पेश बिल से भी कमजोर है | इस बिल की कुछ प्रमुखाताएं हैं- * लोकपाल के चयन में सरकारी प्रतिनिधियों की बहुलता, जो केन्द्रीय सतर्कता आयोग के थामस जैसे प्रकरण की पुनरावृत्ति पुष्ट करेगा | * इस बिल के दायरे से जनप्रतिनिधियों का सदन में आचरण बाहर रहेगा, जो संसद नोट काण्ड जैसे प्रकरण को भविष्य में रोक नहीं पाएगा | * इस बिल में लोकपाल को केवल जांच का अधिकार है, दंड का नहीं, जो कि वर्तमान के कर्नाटक लोकायुक्त विधेयक से भी कमजोर है | * इस बिल से सी.बी.आई. बाहर है, जो कि झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे मामलों को अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचा पाएगा | * इस बिल में भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दे को भटकाकर आरक्षण पर ले जाने की साजिश तो साफ़ है ही | * यह बिल भारत के संघीय ढाँचे को भी कमजोर करेगा क्योंकि इसमें राज्यों में लोकायुक्त गठन के समर्थकारी प्रावधान के स्थान पर उसे अनिवार्य प्रावधान बनाया गया है | * इस बिल से सिटिजन चार्टर नदारद है, अलबत्ता यह एक अलग बिल के रूप में पेश है | लोकपाल का सिटिजन चार्टर भ्रष्टाचार विषयक राहत आम नागरिक को देता जो कि ज्वलंत समस्या है जबकि अनन्य सिटिजन चार्टर किसी सेवा प्रदाता के विषय में शिकायत पेटी मात्र है | * इस बिल में निचले सरकारी मुलाजिमों (ग्रुप सी,डी) का भ्रष्टाचार नहीं आता जिनसे सामान्य जनता त्रस्त है | * इस बिल में प्रधानमंत्री द्वारा जनहित में लिए गए निर्णय नहीं आते (यहाँ तो सरकारें शराबबंदी भी जनहित में कराती हैं और शराब के नए ठेके भी जनहित में ही देती हैं) | * इस बिल में राजनैतिक दल तो बिलकुल नहीं आते, ९५% राजनेता नहीं आते (विधायिका), ९०% नौकरशाही बाहर है (कार्यपालिका), और १००% न्यायपालिका तो बाहर है ही | * इस बिल के अनुसार जहां भ्रष्टाचार के आरोपी सरकारी व्यक्ति को बचाव के लिए सरकारी वकील मुहैया होगा वहीँ शिकायतकर्ता को दंड का प्रावधान है | * वहीँ इसके उलटे ”हम भारत के लोग” द्वारा संचालित स्कूल, कालेज, स्वयंसेवी संस्थाएं, अस्पताल आदि इस बिल के दायरे में आते हैं |
इन सब तथ्यों से स्पष्ट है कि यह लोकपाल बिल नहीं तंत्रपाल बिल पेश किया गया है | इसका प्रारम्भ तो हुआ लोक पर तंत्र द्वारा भ्रष्टाचार मिटाने के बिल के रूप में मगर संसद में यह पेश है तंत्र द्वारा लोक को नए क़ानून के नाम पर गुलामी की एक और बेडी पहनाने के रूप में |
आज मानव २१ वीं सदी मैं है और विज्ञान ने कथनी-करनी के भेद को नगण्य कर दिया है | इसी समाज के एक वर्ग को लोकतंत्र की परिभाषा में दुष्प्रचार का एहसास हुआ और वह “सिविल सोसाईटी” कहलाया | इसने तंत्र की इस साजिश को लोक के सामने पर्दाफ़ाश करने का मन बना लिया है | टीम अन्ना यह जानती है कि वर्तमान संसदीय प्रणाली में जनलोकपाल आने की संभावना क्षीण है पर २७ से २९ दिसंबर को पूरे देश के सामने निर्वाचित प्रतिनिधियों का रुख “लोक” में यह स्पष्ट कर देगा कि वर्त्तमान संसदीय लोकतंत्र अब नाकाफी है और “हम भारत के लोग” प्रतिनिधि लोकतंत्र की राह छोड़कर भविष्य में सहभागी लोकतंत्र की राह पकड़ने वाले हैं |
साहेबान,
जय हिन्द!
देखिये, असली मुद्दा है- भ्रष्टाचार. (‘लोकपाल’ गौण मामला है- कम-से-कम मेरी नजर में) यह दोनों स्तरों पर है- उच्च स्तर पर तथा निचले स्तर पर. दोनों स्तरों पर इसका खात्मा जरूरी है. मगर खात्मे की शुरुआर ऊपर से होनी चाहिए. नीचे से कभी बहुत बड़ा बदलाव नहीं लाया जा सकता. (भ्रष्टाचार की शुरुआत भी ऊपर से ही होती है- वर्ना क्या कारण है कि एक शेरशाह सूरी के शासक बनते ही भ्रष्टाचार समाप्त हो गया था? क्या उसने पूरे सरकारी अमले को बदल डाला होगा? बिलकुल नहीं! ज जहाँ था- वहीं ईमानदार बन गया था!)
खैर, मैंने अपने “घोषणापत्र” में (जो कि धारावाहिक रूप से “जनोक्ति” में प्रकाशित हो चुका है) ‘लोकपाल’ के बदले ‘पंच-परमेश्वर’ की अवधारणा प्रस्तुत की है.
इस अवधारणा को इस टिप्पणी में मैं उद्धृत कर रहा हूँ क्योंकि ‘जनोक्ति’ में प्रकाशित होते वक्त इसका जिक्र नहीं था-
“पंच-परमेश्वर”2.8 भविष्य में उच्च स्तर के भ्रष्टाचार/अपराध की रोक-थाम तथा उच्च एवं सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर नजर रखने के लिए “पंच-परमेश्वर” नामक एक शक्तिशाली स्वायत्त संस्था का गठन किया जायेगा, जिसकी निम्न विशेषतायें होंगी:* प्रारम्भ में पुलिस, प्रशासन, सेना/अर्द्धसैन्य बल, न्यायपालिका तथा विधायिका से बेदाग चरित्र वाले अवकाशप्राप्त नागरिकों को लेकर इस संस्था का गठन किया जायेगा।* “पंच-परमेश्वर” में ‘मुख्य पंचों’ की संख्या तो पाँच ही होगी, मगर उनके नीचे पूरी एक टीम होगी, जिसमें 21 से 101 तक सदस्य (व्यस्तता के आधार पर) हो सकेंगे।* पुलिस, प्रशासन, सेना/अर्द्धसैन्य बल, न्यायपालिका तथा विधायिका के सर्वोच्च एवं उच्च पदाधिकारियों के आचरण पर यह संस्था नजर रखेगी तथा उनके आचरण से सम्बन्धित तथ्यों, आँकड़ों, सबूतों का संकलन एवं विश्लेषण करेगी। (जरूरत पड़ने पर ‘जनमत-सर्वेक्षण’ भी करवायेगी।)* प्रत्येक राज्य में भी “पंच-परमेश्वर” की एक-एक इकाई होगी, जो राज्यों के सर्वोच्च एवं उच्च पदाधिकारियों के आचरण पर नजर रखेगी।* यह संस्था प्रतिवर्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी, जिसमें अच्छा आचरण रखने एवं नागरिकों/मातहतों की आकांक्षाओं पर खरे उतरने वाले पदाधिकारियों के नाम “सफेद सूची” में दर्शाये जायेंगे।* इसके विपरीत, खराब आचरण रखने एवं नागरिकों/मातहतों को तंग करने वालों के नाम “काली सूची” में दर्शाये जायेंगे।* बाकी बचे सर्वोच्च/उच्च पदाधिकारियों को अपने-आप “भूरी सूची” में दर्ज मान लिया जायेगा।* “सफेद सूची” में लगातार तीन बार, या कुल-मिलाकर पाँच बार दर्ज होने वालों को पाँच वर्षों के लिए “पंच-परमेश्वर” में शामिल किया जा सकेगा।* इसके विपरीत, “काली सूची” में लगातार तीन बार, या कुल-मिलाकर पाँच बार दर्ज होने वालों को तत्काल प्रभाव से पाँच वर्षों के लिए निलम्बित कर दिया जायेगा।* इस मामले में सिर्फ राष्ट्रपति महोदय, प्रधानमंत्री तथा सर्वोच्च न्यायाधीश को थोड़ी राहत दी जायेगी- कि एक के निलम्बन के लिए बाकी दोनों की सहमति अनिवार्य होगी- बाकी और किसी को भी, किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जायेगी!* किसी सर्वोच्च/उच्च पदाधिकारी के आपराधिक/भ्रष्टाचार-सम्बन्धी गतिविधियों में लिप्त होने की भनक मिलने पर “पंच-परमेश्वर” केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (इसे भी स्वायत्त बनाने की बात क्रमांक-43.2 में कही जा रही है) के माध्यम से जाँच करवायेगा और आरोप सही पाये जाने पर आरोपपत्र दाखिल करवायेगा। (इनकी सुनवाई अण्डमान की विशेष अदालतों में होगी, जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है।)
पूरे आलेख का लिंक- http://khushhalbharat.blogspot.com/2009/12/2.html
निचले स्तर पर भ्रष्टाचार निवारण के लिए व्यवस्था का जिक्र- http://khushhalbharat.blogspot.com/2009/12/3.html
ईति.
साहेबान,
जय हिन्द!
देखिये, असली मुद्दा है- भ्रष्टाचार. (‘लोकपाल’ गौण मामला है- कम-से-कम मेरी नजर में) यह दोनों स्तरों पर है- उच्च स्तर पर तथा निचले स्तर पर. दोनों स्तरों पर इसका खात्मा जरूरी है. मगर खात्मे की शुरुआर ऊपर से होनी चाहिए. नीचे से कभी बहुत बड़ा बदलाव नहीं लाया जा सकता. (भ्रष्टाचार की शुरुआत भी ऊपर से ही होती है- वर्ना क्या कारण है कि एक शेरशाह सूरी के शासक बनते ही भ्रष्टाचार समाप्त हो गया था? क्या उसने पूरे सरकारी अमले को बदल डाला होगा? बिलकुल नहीं! ज जहाँ था- वहीं ईमानदार बन गया था!)
खैर, मैंने अपने “घोषणापत्र” में (जो कि धारावाहिक रूप से “जनोक्ति” में प्रकाशित हो चुका है) ‘लोकपाल’ के बदले ‘पंच-परमेश्वर’ की अवधारणा प्रस्तुत की है.
इस अवधारणा को इस टिप्पणी में मैं उद्धृत कर रहा हूँ क्योंकि ‘जनोक्ति’ में प्रकाशित होते वक्त इसका जिक्र नहीं था-
“पंच-परमेश्वर”2.8 भविष्य में उच्च स्तर के भ्रष्टाचार/अपराध की रोक-थाम तथा उच्च एवं सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर नजर रखने के लिए “पंच-परमेश्वर” नामक एक शक्तिशाली स्वायत्त संस्था का गठन किया जायेगा, जिसकी निम्न विशेषतायें होंगी:* प्रारम्भ में पुलिस, प्रशासन, सेना/अर्द्धसैन्य बल, न्यायपालिका तथा विधायिका से बेदाग चरित्र वाले अवकाशप्राप्त नागरिकों को लेकर इस संस्था का गठन किया जायेगा।* “पंच-परमेश्वर” में ‘मुख्य पंचों’ की संख्या तो पाँच ही होगी, मगर उनके नीचे पूरी एक टीम होगी, जिसमें 21 से 101 तक सदस्य (व्यस्तता के आधार पर) हो सकेंगे।* पुलिस, प्रशासन, सेना/अर्द्धसैन्य बल, न्यायपालिका तथा विधायिका के सर्वोच्च एवं उच्च पदाधिकारियों के आचरण पर यह संस्था नजर रखेगी तथा उनके आचरण से सम्बन्धित तथ्यों, आँकड़ों, सबूतों का संकलन एवं विश्लेषण करेगी। (जरूरत पड़ने पर ‘जनमत-सर्वेक्षण’ भी करवायेगी।)* प्रत्येक राज्य में भी “पंच-परमेश्वर” की एक-एक इकाई होगी, जो राज्यों के सर्वोच्च एवं उच्च पदाधिकारियों के आचरण पर नजर रखेगी।* यह संस्था प्रतिवर्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी, जिसमें अच्छा आचरण रखने एवं नागरिकों/मातहतों की आकांक्षाओं पर खरे उतरने वाले पदाधिकारियों के नाम “सफेद सूची” में दर्शाये जायेंगे।* इसके विपरीत, खराब आचरण रखने एवं नागरिकों/मातहतों को तंग करने वालों के नाम “काली सूची” में दर्शाये जायेंगे।* बाकी बचे सर्वोच्च/उच्च पदाधिकारियों को अपने-आप “भूरी सूची” में दर्ज मान लिया जायेगा।* “सफेद सूची” में लगातार तीन बार, या कुल-मिलाकर पाँच बार दर्ज होने वालों को पाँच वर्षों के लिए “पंच-परमेश्वर” में शामिल किया जा सकेगा।* इसके विपरीत, “काली सूची” में लगातार तीन बार, या कुल-मिलाकर पाँच बार दर्ज होने वालों को तत्काल प्रभाव से पाँच वर्षों के लिए निलम्बित कर दिया जायेगा।* इस मामले में सिर्फ राष्ट्रपति महोदय, प्रधानमंत्री तथा सर्वोच्च न्यायाधीश को थोड़ी राहत दी जायेगी- कि एक के निलम्बन के लिए बाकी दोनों की सहमति अनिवार्य होगी- बाकी और किसी को भी, किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जायेगी!* किसी सर्वोच्च/उच्च पदाधिकारी के आपराधिक/भ्रष्टाचार-सम्बन्धी गतिविधियों में लिप्त होने की भनक मिलने पर “पंच-परमेश्वर” केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (इसे भी स्वायत्त बनाने की बात क्रमांक-43.2 में कही जा रही है) के माध्यम से जाँच करवायेगा और आरोप सही पाये जाने पर आरोपपत्र दाखिल करवायेगा। (इनकी सुनवाई अण्डमान की विशेष अदालतों में होगी, जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है।)
पूरे आलेख का लिंक- http://khushhalbharat.blogspot.com/2009/12/2.html
निचले स्तर पर भ्रष्टाचार निवारण के लिए व्यवस्था का जिक्र- http://khushhalbharat.blogspot.com/2009/12/3.html
ईति.