अंधेर नगरी|2010/07/24 6:47 pm

यूपी के जेलों में बह रही भ्रष्टाचार की गंगा

उत्तर प्रदेश को बारे में कोई कुछ जानता हो या ना जानता हो लेकिन हर किसी को इतना अवश्य ही मालूम है कि प्रदेश में की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचा अपराधियों के आगे पूरी तरह से पस्त हो चुका है। नियम कानून की धज्जियां उड़ाते अपराधियों को पकड़कर रखने के लिये बनाई गई जेलें भी अब भ्रष्टाचार के दलदल में धंस चुकी हैं। जेलों में पैर पसार चुके भ्रष्टाचार ने प्रशासनिक और पुलिसिया दोनो ही स्तरों पर खुद को इस कदर हावी कर लिया है कि डिप्टी जेलर द्वारा बार बार की जा रही निगरानी और दौरों के बावजूद यदा कदा किसी ना किसी जेल से कैदियों की फौज भागने में कामयाब हो ही जाती है।

दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के मेरठ जेल से फरार हुये 9 कैदियों ने प्रदेश में कानून का डंका पीट रहे हमारे सिपहसालारों के सभी दावों को जंमीदोज़ कर दिया। प्रदेश के इतिहास में एक साथ नौ कैदियों के भागने की घटना कभी नहीं हुई थी। लेकिन जेलों में बह रही भ्रष्टाचार की वैतरणी में नियम और कानून बुरी तरह डूब चुके हैं। इससे पहले 2002 में लखनऊ जिला जेल से 7 कैदी फरार हुये थे। दो महीने पहले लखनऊ की नई जेल से एक कैदी खिड़की तोड़ जेल के मुख्य द्वार तक पहुंच गया था। जिस घटना से जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया था।

कैदियों के भागने की घटनाओं की बड़ी वजह यह रही है कि हर बार जब भी इस तरह की घटनायें होती है उसके बाद संबधित जेल के जेलर के विरूद्ध कोई भी सख्त कार्यवाई नहीं होती है। कैदियों के बागने के बाद कुछ दिनों तक सिर्फ मामले की लीपापोती के प्रयास किये जाते हैं। जिसके बाद स्थिति फिर से पहले जैसी हो जाती है। हर रोज ही अखबारों में किसी ना किसी जेल में डाले गये छापे में हथियार व ऐशो-आराम के समान बरामद होने की खबरें दिखाई देती हैं। राज्य की सर्वाधिक भ्रष्ट जेलों में लखनऊ, मेरठ, गाजियाबाद, आगरा, अलीगढ़, बनारस, गोंडा, बुलंदशहर, सहारनपुर, जालौन, नैनी, गोरखपुर, सुल्तानपुर जैसी जिला जेल शामिल हैं।

मेरठ के डिप्टी जेलर डी के वाजपेयी इस मामले में कई बार आरोपों के घेरे में आ चुके हैं। इनके खिलाफ बरेली, मुजफ्फरपुर जैसी कई जिला जेलों में किये गये घोटाले की जांच चल रही है। वाजपेयी पर जेल के राशन बेचने जैसे कृत्यों का भी आरोप है। इसके अलावा प्रदेश की जेलों में बंद बडे़-बड़े माफियाओं ने जेलों को अपनी शरणस्थली बना लिया है। इसी क्रम में लखनऊ जेल का नाम बी शामिल रहा है जहां के जेलर रिजवी बी दागदार छवि के जेलर रहे हैं। इनपर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ जेल के राशन को काले तरीके से बेचे जाने का आरोप लग चुका है।

सवाल यह है कि व्यवस्था के दावों को लात मारकर आखिर कैसे कैदी इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे पाते हैं। जेल प्रशासन की मिली भगत के बिना इस तरह के मामले हो ही नही सकते। यदि व्यव्स्था वास्तव में सुदृढ़ होगी तभी सही मायने में कानून जीवित रह पायेगा अन्यथा जेलों में बढ़ रहे जंगलराज के आगे कानून के पास सिर्फ मुंह ताकने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा।

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